Kalvachi-Pretni Rahashy - 41 in Hindi Horror Stories by Saroj Verma books and stories PDF | कलवाची--प्रेतनी रहस्य - भाग(४१)

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कलवाची--प्रेतनी रहस्य - भाग(४१)

उस दिन वें सभी अपनी यात्रा समाप्त नहीं कर पाएं क्योंकि रात्रि अधिक हो चुकी थी ,इसलिए उन्होंने एक वृक्ष के तले शरण ली,तब भैरवी बोली...
"कालवाची!आज रात्रि तो तुम्हें अपना भोजन ग्रहण करने नहीं जाना,यदि जाना चाहती हो तो मैं अपना स्थान बदलकर कहीं और अपना बिछौना बिछा लूँ,क्योंकि अब मैं तुम्हारा वो बीभत्स रूप नहीं देख सकती",
"नहीं!भैरवी!अभी मुझे भोजन की आवश्यकता नहीं है,इतनी शीघ्र मुझे भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती",कालवाची बोली...
"तब ठीक है,अब मैं निश्चिन्त होकर सो सकती हूँ",भैरवी बोली...
"हाँ! तुम निश्चिन्त होकर सो जाओ सखी! तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है",कालवाची बोली...
तब उस रात्रि सभी निश्चिन्त होकर सो गए और प्रातःकाल से ही उन्होंने अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी क्योंकि सभी शीघ्रता से रानी कुमुदिनी के पास पहुँचना चाहते,उन सभी ने पूरे दिन यात्रा की और सभी सायंकाल के समय उस नगर की ओर पहुँच गए जहाँ भूतेश्वर और उसकी बहन त्रिलोचना रहते थे,तब कालवाची बोली...
"आज रात्रि हम सभी इसी नगर में विश्राम करेगें"
"तो चलो किसी ऐसे वृक्ष को खोज लेते हैं जिसके तले हम शरण ले सकें,",भैरवी बोली...
"नहीं! वृक्ष खोजने की आवश्यकता नहीं है सखी! आज रात्रि हम किसी के घर में शरण लेगें",कालवाची बोली...
"कहीं तुम्हारा तात्पर्य भूतेश्वर और त्रिलोचना के घर से तो नहीं है",कौत्रेय बोला...
"हाँ! मैं वही कहना चाह रही थी",कालवाची बोली...
"तो बिलम्ब किस बात का,शीघ्रता से हम सभी उनके घर चलते हैं",कौत्रेय बोला....
"किन्तु! हम इतने लोग हैं,क्या उन दोनों के घर में,हम सभी को शरण मिल जाएगी",अचलराज ने पूछा...
"हाँ...हाँ...क्यों नहीं,वें दोनों भाई बहन बहुत ही अच्छे हैं",कालवाची बोली....
"तो चलो उनके घर ,मुझे कोई आपत्ति नहीं",व्योमकेश जी बोले...
और सभी त्रिलोचना और भूतेश्वर के घर पहुँचे,भूतेश्वर ने कालवाची को देखा तो बोला....
"कालवाची! तुम चामुण्डा पर्वत से वापस आ गई,मेरा मित्र तंत्रेश्वर कैसा है?उसने तुम्हारी सहायता की ना! कदाचित अब तुम पूर्णतः मानवी बन गई होगी और कौत्रेय भी कठफोड़वे से मानव बन गया होगा और ये सभी कौन हैं तुम्हारे संग"?
"अब सारे प्रश्न यहीं पूछ लोगे क्या? घर के भीतर आने को नहीं कहोगे",कालवाची बोली...
"अरे! मैं तो भूल ही गया,हाँ...हाँ....सभी जन घर के भीतर आइए,आप सभी का स्वागत है",भूतेश्वर बोला....
"तभी भूतेश्वर का स्वर सुनकर त्रिलोचना भी भीतर से आ गई ,उसने कालवाची और कौत्रेय के संग इतने जनों को देखा तो भूतेश्वर से बोलीं....
"भ्राता भूतेश्वर! कालवाची और कौत्रेय के संग ये सभी कौन हैं ?
"कालवाची के अतिथि हैं तो ये हमारे भी अतिथि हुए",भूतेश्वर बोला...
"हाँ!सभी का स्वागत है इस घर में, किन्तु मैं सभी के भोजन का प्रबन्ध नहीं करने वाली,जिसके अतिथि हैं वो ही सत्कार भी करे इन सभी का",त्रिलोचना बोली...
"सखी!तुम्हें हमारे भोजन के प्रबन्ध हेतु चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं,हम स्वयं ही अपने भोजन का प्रबन्ध कर लेगें,केवल हमें पाकशाला दिखा दो कि कहाँ है?,भैरवी बोली...
"तब ठीक है,अब मुझे कोई आपत्ति नहीं,कितने भी अतिथि बुला लो",त्रिलोचना बोली....
त्रिलोचना की ऐसी बात पर सभी हँस पड़े,अँन्धेरा गहराने लगा था और सभी थक भी चुके थे,इसलिए सबने सर्वप्रथम भोजन का प्रबन्ध करना उचित समझा,इसलिए भैरवी,अचलराज और त्रिलोचना तीनों पाकशाला में भोजन पकाने लगे,भोजन करने के पश्चात सभी विश्राम करने के लिए लेट गए और लेटे लेटे ही वार्तालाप करने लगे,तभी त्रिलोचना को ज्ञात हुआ कि कालवाची मानवी नहीं प्रेतनी है तो वो अपने भाई भूतेश्वर से बोली.....
"भूतेश्वर भ्राता! मुझे तुमने ये बात पहले क्यों नहीं बताई कि कालवाची प्रेतनी है",
"कालवाची नहीं चाहती थी कि तुम्हें ये बात ज्ञात हो,"भूतेश्वर बोला...
"वो क्यों भला?",त्रिलोचना ने पूछा...
"वो इसलिए कि तुम्हें ये सुनकर अच्छा ना लगता",भूतेश्वर बोला...
"भला मुझे क्यों अच्छा ना लगता",त्रिलोचना ने पूछा...
"वो इसलिए कि वो भी एक प्रेतनी है और तुम भी एक प्रेतनी हो,उसे देखकर तुम्हारे मन में में प्रतिस्पर्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है",भूतेश्वर बोला...
भूतेश्वर की बात सुनकर सभी हँस पड़े तो त्रिलोचना बोली...
"भूतेश्वर भ्राता! तुम मेरा परिहास उड़ाने का कोई भी अवसर नहीं चूकते,जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती",
"रुठती क्यों हैं बावरी! यही तो भाई बहन का प्रेम है,भाई बहन के मध्य ये सब ना हो तो जीवन में आनन्द कैसें आएगा"?,भूतेश्वर बोला...
"सच कहते हो भ्राता",त्रिलोचना मुस्कुराकर बोली...
"तो अब अगली योजना क्या है"?,कौत्रेय ने पूछा...
"बस,रानी कुमुदिनी को लेकर हम सभी वैतालिक राज्य की ओर प्रस्थान करेगें",अचलराज बोला...
"नहीं!",हम सभी ऐसा नहीं करेगें",कालवाची बोली...
"तो तुम्ही अगली योजना के विषय में कोई सुझाव दो",भैरवी बोली...
"रानी कुमुदिनी को लेकर हम सभी चामुण्डा पर्वत जाऐगें",कालवाची बोली...
"वो किसलिए भला"?,अचलराज ने पूछा...
"वो इसलिए कि चामुण्डा पर्वत जाकर हम भूतेश्वर के मित्र तंत्रेश्वर से मिलेंगें,वो मुझे और कौत्रेय को मानव रुप देगा एवं उससे विनती करके हम सभी रानी कुमुदिनी के नेत्रों की ज्योति भी माँग लेगें,जिससे वें पुनः देख पाऐगीं",कालवाची बोली...
"तुम्हारा और कौत्रेय का मानव रूप लेना अत्यधिक आवश्यक है क्या"?,अचलराज ने पूछा...
"हाँ! आवश्यक है क्योंकि मैं अब और मानव हृदयों को अपना भोजन नहीं बना सकती,अत्यधिक निर्दयी बन चुकी हूँ मैं ,इसलिए इस रूप से शीघ्र ही मुक्ति पाना चाहती हूँ",कालवाची बोली...
"किन्तु!कालवाची! मैं कुछ और ही सोच रहा था",व्योमकेश जी बोले...
"क्या सोच रहे थे आप सेनापति व्योमकेश जी"?,कालवाची ने पूछा...
"मैं कहना चाहता हूँ कालवाची कि हमें रानी कुमुदिनी को लेकर चामुण्डा पर्वत ना जाकर वैतालिक राज्य की ओर ही प्रस्थान करना चाहिए,क्योंकि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अभी हमें तुम्हारी इन मायावी शक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी",सेनापति व्योमकेश बोलें...
"मेरी मायावी शक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी...वो भला क्यों?",कालवाची ने पूछा...
"वैतालिक राज्य के वर्तमान राजा से प्रतिशोध लेने हेतु,तुम रुप बदलकर गुप्तचर बनकर वहाँ जा सकती हो,वहाँ के सारे भेद लाकर हमें बता सकती हो,तुम्हारी मायावी शक्तियों के बिना वैतालिक राज्य पुनः प्राप्त करना असम्भव है कालवाची!",सेनापति व्योमकेश बोले...
"हाँ! ये तो मैनें सोचा ही नहीं ",कालवाची बोली...
"तो पुनः इस पर विचार करके देखो,यदि मेरा सुझाव तुम्हें सही लगता है तो मान लो,वर्ना जैसी तुम्हारी इच्छा",सेनापति व्योमकेश जी बोले...
"पिताश्री का कथन सत्य है कालवाची",अचलराज बोला...
"मैं भी सहमत हूँ उनके विचारों से",भैरवी बोली...
"हाँ! मैं भी सहमत हूँ",कौत्रेय बोला...
जब सभी ने अपने अपने मत रख दिए तो कालवाची बोली...
"तो ठीक है अब मैनें चामुण्डा पर्वत पर जाने का विचार त्याग दिया है,अब हम रानी कुमुदिनी को लेकर वैतालिक राज्य की ओर ही प्रस्थान करेगें"
और सभी यूँ ही वार्तालाप करते करते सो गए....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....