Nani ji namste in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | नानी जी नमस्ते

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नानी जी नमस्ते

संस्मरण डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 

नानी जी नमस्ते 🙏 

संसस्मरण नानी जी नमस्ते 🙏 *लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*मेरी नानी का घर अब सिर्फ यादों में ही है। बरसो बीत गए वहां गए। आखिरी बार जब छठी कक्षा में थी, तब गई थी। नानी का घर तो अभी भी वहीं है उसी रूप में कोई बदलाव नहीं। बस अब वो घर नाना का नहीं है। मेरे नाना और नानी दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं। नाना और नानी अपने अंतिम वर्षों में मामा जी के घर शहर आ गए थे। जिस घर की यादें आज भी जिंदा है मेरे मन में अब वहां कोई ओर रहता है। कभी कभी मन करता है बस एक बार उसी घर में जाने को, ।काश मैं वहाँ जा पाती! बचपन की कुछ यादें हैं जो आज भी जिंदा हैं। अभी भी जब मैं कलम उठाती हूँ तो नानी का घर आँखों के सामने आ जाता है—वैसा ही, बिना किसी बदलाव के। बस अब वो दरवाज़ा नानी का नहीं रहा। सोचती हूँ घर के मालिक से प्रार्थना करूँगी—बस एक बार उस घर में देखने दे, एक वीडियो बनाने दे। पर बस सोचती ही रह जाती हूँ। जब भी मम्मी से कहती हूँ, "चलो ना मम्मी, एक बार चलते हैं ना बस पाँच मिनट के लिए ही चलो," तो मम्मी उदास हो जाती हैं। अपने आँसू छुपाते हुए गुस्से में कहती हैं, "अब वहाँ कोई नहीं रहता। क्या करोगी वहाँ जाकर?" मैं पूछती हूँ, "मम्मी, क्या आपको याद नहीं आती? वहाँ आपका बचपन बीता था। कितना सुंदर और बड़ा घर था नानी का। बहुत बड़ा आँगन था। रसोई भी बहुत बड़ी थी, लेकिन नानी खाना बाहर आँगन में ही बनाती थीं। हम सब बच्चे वहीं चूल्हे के चारों ओर बैठ जाते और नानी के हाथ से बने खाने का स्वाद लेते।"नानी के घर की मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती थी वो यादें जब नानी हम बच्चों के लिए पहले से ही नमक पारे, मठरी, गुझिया, आचार आदि बहुत सी चीजें बनाकर रखती थीं। नानी हम बच्चों के लिए बरामदे में एक बड़ा सा झूला टाँगतीं, उसमें छोटी सी चारपाई फंसा देतीं। जिसमें हम चारों भाई-बहन एक साथ बैठकर झूलते। नानी के घर के हर कोने में नानी के प्यार की महक आती थी। मेरी नानी बहुत अच्छी थीं। मुझपर बहुत ज्यादा भरोसा करती थीं। मेरी नानी को कम सुनाई देता था। बिलकुल कान के पास जाकर बोलना पड़ता था, वो भी चिल्लाकर। कोई भी उनसे बात करता तो इशारों में। नानी को कोई बात पूछनी होती तो मुझसे ही पूछतीं, क्योंकि मैं उनके पास जाकर जोर से बोलकर बता देती। सब उन्हें दूर से ही हाथ जोड़कर नमस्ते करते, लेकिन मैं उनके कान के पास जाकर जोर से बोलती, "नानी जी नमस्ते!" तो वो बहुत सारा आशीर्वाद देतीं। मेरी नानी ने ही मुझे आटा गूँथना, फॉल लगाना सिखाया। नानी अक्सर कहती थीं, "एक तू है जो बस मुझे जोर से नानी बोलती है, तो अच्छा लगता है।"जिस इंसान को सुनाई आना बंद हो जाता है, इंसान तरसता है बाहर के शोर को सुनने के लिए, आवाज़ सुनने के लिए।नानी की खबरची थी मैं। सब बातें बताती थी उनको। मम्मी इतने ध्यान से मेरी बात सुन रही थीं कि उनकी आँखों में आँसू आ गए अपनी माँ को याद कर। उन्होंने बात बदलते हुए कहा, "बस कर बेटी रानी, बातों में सांझ हो गई। जा दो कप चाय बनाकर ला।"---*डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 6/6/26