37. जलती धरती, सोता इंसान
धरती की छाती सुलग रही,
नदियों का पानी सूख रहा,
तेरी वासना की भट्ठी में,
हर जीव तड़पकर कूक रहा।
पर तू अपनी ही बेहोशी में,
सुख के झूठे सपने बुनता,
गुरु पुकार कर हार गए,
तू एक शब्द भी नहीं सुनता!
जाग! ओ सोने वाले इंसान!
तेरा यह कैसा मरण-विश्राम?
भौतिकता की इस अंधी दौड़ में,
तूने प्रकृति को बाज़ार किया,
भोग लिया इस वसुंधरा को,
हर कतरे को लाचार किया।
महल खड़े हैं कंक्रीट के,
चेतना पर गहरी धूल जमी,
सांसें बिकती हैं सिलेंडरों में,
पर तुझमें ना कोई तड़प जगी!
तू सोता है कलयुग के पालने में,
धरती जलती है महाविनाश की आग में।
यह कैसी तेरी मायावी निद्रा,
यह कैसा तेरा अहंकार?
जब तक तू खुद को ना बदलेगा,
कैसे थमेगा यह हाहाकार?
बाहर की अग्नि तो बस प्रतीक है,
तेरे भीतर की अज्ञान-ज्वाला का,
अहं मिटा, अहंकार गिरा,
तोड़ ये बंधन मोह-झाला का!
उठ, देख! राख होती इस धरा को,
बचाना है तो पहले खुद को जगाना होगा!
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38.पानी की आख़िरी बूंद
सूख गई नदियां सारी, अब मरुस्थल सा विस्तार है,
तेरी अंतहीन तृष्णा का देखो, यह अंतिम उपहार है।
घड़े फूट चुके हैं सारे, सूखी धरती की छाती है,
तू अब भी सोया है मानव? तेरी अंतिम घड़ी आती है!
टकटकी लगाए बैठा है तू, उस अंतिम चमकते मोती पर,
जो ठहर गई है कांपती हुई, एक सूखी पत्ती की गोटी पर।
वह पानी की आख़िरी बूंद नहीं, तेरी सभ्यता का जनाज़ा है,
तेरी अंधी खोखली तरक्की का, यह बिलकुल ताज़ा ताज़ा है!
देख उसे! ओ भोग के भूखे इंसान!
वह बूंद मांग रही है तुझसे तेरा संज्ञान!
तूने नदियों को बाज़ार किया, तूने सागर को भी मैला किया,
अपनी वासना की खातिर, तूने कुदरत को अकेला किया।
अब सोने के सिक्कों को चबा, या कंक्रीट के महलों को पी,
जब कंठ रुकेगा प्राणों का, तब पूछना खुद से—कैसे जी?
वह आख़िरी बूंद चिल्लाकर कहती: "मैं तेरा ही अहंकार हूँ,
तूने जो बोया था कल तक, मैं वही संहार हूँ।"
मिटाना है तो अपनी प्यास मिटा, इस बाहर की अंधी दौड़ को रोक,
चेतना की अग्नि को सुलगा, और वासना की इस भट्ठी को झोंक!
उठ! उस बूंद के गिरने से पहले खुद को थाम ले,
अहंकार का विसर्जन कर, और आत्म-ज्ञान का नाम ले!
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39. पेड़ों की पुकार
काट दिया तूने हमको, अब अपनी ही सांसें गिनता है,
कागज के उन चंद नोटों में, तू अपना जीवन बुनता है।
हम तो केवल खड़े रहे, तुझे छांव और जीवन देने को,
पर तू कुल्हाड़ी लेकर आया, हमारी ही बलि लेने को!
हम चीख रहे थे चिल्लाकर, पर तेरी खोपड़ी में शोर था,
भौतिकता की उस अंधी दौड़ का, तुझ पर अजीब ही ज़ोर था।
अब तड़प रहा है धूप में, और ढूंढ रहा है साया तू,
भूल गया कि मिट्टी से ही, यह हाड़-मांस की काया तू!
सुन ओ कंक्रीट के जंगलों के राजा!
हमारी मौत के साथ ही, बजेगा तेरा भी जनाज़ा!
हम केवल लकड़ी नहीं थे रे, हम धरती के फेफड़े थे,
तेरी वासना ने नोच लिए, जो जीवन के टुकड़े थे।
अब रोता है तू बाढ़ में, कभी सूखे का हाहाकार है,
यह प्रकृति का प्रकोप नहीं, तेरे ही कर्मों का उपहार है!
हम जड़ जमाकर बैठे थे, ताकि यह धरती बची रहे,
तेरी आने वाली नस्लों की, सांसों की डोरी सजी रहे।
पर तूने कुल्हाड़ी नहीं चलाई, अपने ही पैर को काटा है,
अहंकार के इस अंधेपन में, तूने खुद को ही डांटा है!
उठ! थाम ले बची हुई टहनियों को, अभी थोड़ा वक़्त बाकी है,
अपनी अज्ञानता को भस्म कर, तेरी चेतना ही अब साखी है!
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मेरी कविताएँ कठोर अवश्य हैं, पर उनका उद्देश्य केवल एक है—सत्य को बिना किसी आवरण के प्रस्तुत करना।