Words and Truth - Part 14 in Hindi Poems by Shivraj Bhokare books and stories PDF | शब्द और सत्य - भाग 14

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शब्द और सत्य - भाग 14

40. चमड़ी का मोह

जिसे तुम प्रेम कहते हो, वह बस एक बीमारी है,
खाल के रंग-रूप पर, ये कैसी दीवानगी भारी है!
जिसे देखकर पिघल रहे, वो पिंजर मांस का ढांचा है,
अहंकार ने अपने ही मन में, यह कैसा खेल रचा है?

चमड़ी आज जो कसी हुई, कल ढीली पड़ जाएगी,
यह मिट्टी की पुतली आखिर, मिट्टी में मिल जाएगी।
जो बदल रहा प्रतिपल-छिन, उससे कैसा नाता जोड़ रहे?
सच्चे अमृत को छोड़कर तुम, क्यों विष की नदियां मोड़ रहे?

आकर्षण तो बस प्रकृति का, एक छोटा सा षड्यंत्र है,
जीव को जीव से बांधने का, यह मायावी मन्त्र है।
तुम फंसे रहे बस अंगों में, और समझ बैठे उसे आत्मज्ञान,
वासना की इस अंधी दौड़ को, दे डाला 'प्रेम' का नाम!

प्रेम कोई शारीरिक भूख नहीं, वो तो मन का मौन है,
जब तक तुम 'तुम' बनकर चाहोगे, तब तक बताओ प्रेमी कौन है?
खाल के पार जो सत्ता है, जरा उस पर दृष्टि टिकाओ तो,
इस झूठे मोह को त्याग कर, तुम शून्य में डूब जाओ तो।

जागो! इस देह के पिंजरे से, अब अपनी सुरति हटाओ तुम,
चमड़ी के इस मोह को तजकर, सच्चे प्रेम में समाओ तुम।
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41. दीवानगी या बीमारी?

जिसे तुम एकतरफा आशिकी कहते हो, वो बस मन का एक वहम है,
अहंकार की ज़िद्दी चोट है वो, जिसे तुम समझ रहे रहम है!
सामने वाले से मतलब कहाँ तुम्हें, तुम तो अपनी ही छवि के दीवाने हो,
एक परछाई के पीछे भागते हुए, तुम खुद से ही अनजाने हो।

वह तुम्हें नहीं चाहता, फिर भी तुम उसके पीछे दीवाने हो,
यह कोई महान त्याग नहीं पगले, तुम खुद ही खुद के निशाने हो!
"वह सिर्फ मेरा है" - यह चाहत ही सबसे बड़ा रोग है,
सच्चा प्रेम तो मुक्ति है भाई, यह तो बस भोग का वियोग है।

जिसे तुम दीवानगी का नाम देकर, अपनी पीठ थपथपाते हो,
सच तो यह है कि तुम अपनी ही हीनता से डरकर भागते हो!
मन खाली है, जीवन सूना है, इसलिए एक खूँटा ढूँढ लिया,
और उस खूँटे से अपनी ही ज़िद का, एक गहरा फँदा बुन लिया।

प्रेम कभी ज़बरदस्ती नहीं होता, वह तो स्वतंत्रता का नाम है,
जहाँ तुम सामने वाले को बाँधना चाहो, वो तो वासना का गुलाम है।
परछाई का पीछा छोड़ो, जो कभी तुम्हारी हो नहीं सकती,
मूर्ख मन की इस बीमारी में, आत्मा कभी सो नहीं सकती।

जागो! इस आत्मघाती पागलपन से, और खुद को ज़रा पहचानो तुम,
यह कोई आशिकी नहीं है मेरे भाई, यह केवल एक मानसिक बीमारी है, इसे जानो तुम!
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42. मृग की दौड़

तुम जिसे ढूँढ रहे हो दुनिया में, वह बस एक ख्याली महबूब है,
अपने ही भीतर के खालीपन को छुपाने का, यह तरीका खूब है!
जैसे हिरण अपनी ही नाभि की कस्तूरी को, जंगलों में खोजता फिरे,
वैसे ही तुम अपनी अधूरी चाहत लिए, इंसानों की बस्ती में गिरे।

कोई 'परफेक्ट' नहीं है यहाँ, सब प्रकृति के हाथों की कठपुतली हैं,
गुण-दोष के धागों से बुनी हुई, हर हाड़-मांस की पुतली है।
तुम खुद अधूरे हो भीतर से, और ढूँढ रहे कोई पूरा मिले,
इस अंधी दौड़ का अंत यही है कि बस दर्द, शिकायत और गिला मिले।

यह 'परफेक्ट' का पैमाना तुमने, सिनेमा और उपन्यासों से सीखा है,
तभी तो असल ज़िन्दगी का सच, तुम्हें इतना कड़वा और फीका है!
तुम अपनी ही शर्तों का बोझ, किसी और के कंधों पर डालना चाहते हो,
प्रेम के नाम पर दरअसल, तुम एक गुलाम पालना चाहते हो।

जो आज परफेक्ट लगता है, कल उसकी कमियाँ भी सामने आएँगी,
जब उम्मीदों के महल टूटेंगे, तब यह झूठी मोहब्बत बिखर जाएगी।
दूसरों में संपूर्णता खोजना छोड़ो, यह मृगतृष्णा की अंतहीन दौड़ है,
सच्चा साथी वह नहीं जो तुम्हें पूरा करे, वह तो बस अहंकार की होड़ है।

शांति बाहर के किसी चेहरे में नहीं, अपने ही बोध में मिलेगी,
जब तुम खुद से ही जुड़ जाओगे, तब यह अधूरी खोज थमेगी।
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अगला पृष्ठ पलटने से पहले, एक बार स्वयं को पढ़िए...

फिर मिलेंगे... कुछ नए शब्दों और कुछ अटल सत्यों के साथ।..