Incompleteness - 14 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 14

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अधूरापन - 14

अध्याय - १४

शोभाबहन अपने पति की आंखों का गुस्सा देखकर पूरी तरह सन्न रह गईं। इतने सालों में रमेशभाई ने कभी गुस्से में पलटकर जवाब तक नहीं दिया था, और आज सारे सालों का हिसाब रमेशभाई के शोभाबहन के गाल पर पड़े एक थप्पड़ ने चुकता कर दिया। यह जरूरी नहीं कि हर बात शांति से कहने पर सुनने वाला समझ ही जाए, लेकिन जब सही समय पर कड़ा विरोध होता है, तो व्यक्ति दोबारा अनाप-शनाप बोलने से पहले सोचता जरूर है।

राजेश ने अपनी चिंता जताते हुए कहा, "अमृता को गर्भाशय के मुख का कैंसर है, तुरंत ऑपरेशन कराना पड़ेगा और इस ऑपरेशन में अमृता का गर्भाशय भी निकालना पड़ेगा... इस वजह से अमृता अब कभी मां नहीं बन पाएगी।"

शोभाबहन अपनी बेइज्जती अमृता की वजह से पूरे परिवार के सामने हुई समझकर, अभी भी अपने झूठे घमंड में बोलीं, "तो तुम दोनों के शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी तुम्हें कोई संतान क्यों नहीं हुई? मुझे तुम्हारे बच्चे को देखना है या इस घर को कोई वारिस नहीं चाहिए??"

आज मानो शोभाबहन को उनके कर्मों का फल मिल रहा था या फिर अमृता के निस्वार्थ प्रेम का हिसाब हो रहा था, क्योंकि इतने सालों से जो सच शोभाबहन और गायत्री के बीच दफन था, उसका खुलासा यूं सबके सामने तो न होता! लेकिन शोभाबहन ने जान-बूझकर अपने बेटे को मुंह खोलने पर मजबूर कर दिया...

गलतफहमी पल भर के लिए पैदा हो सकती है,
दोस्त! सच की तस्वीर यूं ही छुपी थोड़ी रह सकती है?

शोभाबहन की बात को अनदेखा करना राजेश के लिए नामुमकिन था, उसने गुस्से में कह ही दिया, "मम्मी! आप घर को अपने कब्जे में रखने के लिए जो भी साजिशें करती थीं, वह सब अब मैं जान चुका हूं। और यह बात अमृता ने मुझे नहीं बताई है, यह भी आपको बता दूं ताकि आपके मन में कोई वहम न रहे। और साथ ही यह भी बता दूं कि मेरी गैरहाजिरी में उस पर गुस्सा मत निकालना। १२ साल पहले हमारी शादी के शुरुआती दिनों में जिस तरह से आपने अमृता पर लांछन लगाया था, उसकी एकमात्र जानकार गायत्री खुद अमृता से माफी मांगते समय सब बोल पड़ी और मैं उनकी सारी बातें सुन गया। गायत्री ने यह बात छुपाई ही थी, लेकिन उसकी आंखें तब खुलीं जब मानसकुमार ने उस पर शक किया और अमृता ने ही उसे उस दर्द से स्वाभिमान के साथ बाहर निकाला। इसलिए उसने अपनी गलती कबूल की और सच सबको बताने को कहा, लेकिन जिसके प्रति आपके मन में नफरत है, उसी अमृता ने गायत्री को कसम देकर चुप रखा। वह नहीं चाहती थी कि आपकी इस उम्र में आपको परिवार के सामने नीचा देखना पड़े, इसलिए उसने गायत्री से चुप रहने को कहा। आपके झूठ ने मेरे दिमाग पर ऐसा असर किया कि मैं अमृता को पूरी तरह से स्वीकार ही नहीं कर पाया। इसका नतीजा मैंने तो भोगा ही, लेकिन बिना किसी कसूर के अमृता भी भुगत रही थी, वह भी बिना किसी से शिकायत किए... और आप कहती हैं कि अमृता पेट में पाप दबाकर बैठी है... आज आपने मुझे बोलने पर मजबूर किया, वरना मैं भी मुंह न खोलता..."

राजेश का एक-एक शब्द मानो सबके दिल को आरी से चीरता हुआ दर्द दे रहा था।

रमेशभाई दोनों हाथ जोड़कर अमृता से माफी मांगते हुए बोले, "बेटा, माफ कर देना, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हम तुम्हारे गुनहगार हैं।"

अमृता ने तुरंत उनके हाथ पकड़कर कहा, "पापा, ऐसा मत कहिए... जो मेरी किस्मत में था, वही मैंने भोगा... सब भूल जाइए। जो होना था, वह हो गया।"

रमेशभाई तुरंत शोभाबहन से बोले, "देखा शोभा! यह है असल में हमारे घर की लक्ष्मी... अन्नपूर्णा... तुम किस्मत वाली हो कि तुम्हें इतनी समझदार और प्यारी बहू मिली है... अमृता और भार्गवी सचमुच गृहलक्ष्मी बनकर हमारे घर को पावन कर रही हैं। इस परदेस में वरना कौन इतने सलीके और समझदारी से रहता है.. मुझे तुम दोनों पर बहुत गर्व है।"

आज पहली बार शोभाबहन चुप रह गईं, वह भी अफसोस के साथ, हालांकि माफी मांगने जैसा पछतावा उन्हें अभी भी महसूस नहीं हुआ था। वह अपना मुंह नीचा करके बैठी रहीं।

भार्गवी ने बात को संभालते हुए कहा, "मैं सबके लिए बढ़िया नाश्ता और चाय बनाकर लाती हूं।"

आज का पूरा दिन यूं ही बीत गया। रात को भार्गवी अपने कमरे में बिस्तर पर बैठे-बैठे काफी देर से कुछ सोच रही थी, ऐसा अपूर्व को लगा। उसने पूछा, "भार्गवी, इतनी देर से किस सोच में डूबी हुई हो?"

भार्गवी बोली, "अपूर्व! मैं अमृता भाभी के बारे में सोच रही हूं। हम उनकी तकलीफ तो दूर नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें अपने मातृत्व को महसूस करने का रास्ता तो दिखा ही सकते हैं ना?"

अपूर्व ने अचरज से पूछा, "कौन सा रास्ता भार्गवी? यानी तुम क्या कहना चाहती हो? ज़रा मुझे खुलकर समझाओगी तब तो पता चलेगा।"

भार्गवी झिझकते हुए बोली, "क्या हम अमृता भाभी और राजेश भाई को कोई बच्चा गोद लेने के लिए कहें तो?" भार्गवी बोल तो गई, लेकिन अपूर्व में उस बात को गहराई से समझने की अक्ल कहां थी?

भार्गवी की यह बात सुनकर अपूर्व एकदम खड़ा हो गया और चिल्ला उठा, "भार्गवी! तुम क्या बोल रही हो, इसका कुछ होश है तुम्हें या नहीं? यानी मेरा भाई गैरों के बच्चे पालेगा? हमारा खून तो हमारा ही होना चाहिए। जिसकी रगों में दूसरों का खून हो, वह कभी हमारे घर का सदस्य नहीं बन सकता, समझी? यह बात तुमने मुझसे कही है, आगे खबरदार जो घर में किसी से भी ऐसी बात की तो... और तुम जो बच्चा गोद लेने की बात कर रही हो, तुम्हें इतनी भी अक्ल नहीं है कि बच्चे को संभालने के लिए मां का खुद सेहतमंद होना जरूरी है? तुम्हें लगता है कि अमृता भाभी उस बच्चे को संभाल पाएंगी? अरे! जो खुद को नहीं संभाल सकतीं, वह बच्चे को क्या संभालेंगी? कभी तो अपनी अक्ल का इस्तेमाल किया करो... हुंह..." इतना बोलते-बोलते अपूर्व गुस्से से तिलमिला गया।

लेकिन भार्गवी ने बेहद शांति से जवाब देते हुए कहा, "अमृता भाभी भले ही पूरी तरह ठीक न हों, लेकिन मैं तो ठीक हूं ना? मैं संभाल लूंगी उसे। पर मैं यह बात घर में जरूर उठाऊंगी।"

"तुम क्या संभालोगी? आज तक तुमने मुझे इस घर का वारिस तो दिया नहीं। तुममें इतनी काबिलियत होती तो आज तुम बेटी के बजाय बेटे की मां होतीं, समझी! और जो बात आज कर रही हो, वह कभी न करतीं..."

"वह तो आप सबने मिलकर मेरी औलाद को दुनिया में आने ही नहीं दिया, यह उसी की सजा है, इतना समझ लीजिए।" भार्गवी को अपना अतीत याद आ गया।

"ओह, तो तुम्हें पेट में उस बात का दर्द है! मैं समझ गया, हमने जो तुम्हारा अबॉर्शन करवाया था, तुम उसी का बदला ले रही हो, है ना? लेकिन एक बात अच्छी तरह समझ लो, मेरे घर में अगर कोई दूसरी संतान जन्म लेगी तो वह बेटा ही होगा। मुझे इस घर का वारिस चाहिए, समझी!" इतना कहकर अपूर्व गुस्से में वहां से चला गया।

देखो ना दोस्त! यह तो रिश्तों की अपरिपक्वता ही कहलाएगी,
हर कसूर का ढिकरा सिर्फ गृहिणी के सिर ही फोड़ा जाएगा!!

आज अनपढ़ भार्गवी पढ़ी-लिखी और पढ़ा-लिखा अपूर्व अनपढ़ नजर आ रहा था।