अध्याय-१८
भार्गवी अपने ससुर की माला पूरी होने के इंतज़ार में विचारों में डूब गई थी। भार्गवी को अचानक महसूस हुआ कि, अपूर्व सुबह तो बहुत गुस्से में ऑफिस गया था, और घर आया तो एकदम शांत होकर समझदारी से व्यवहार करने लगा है। यह ज़रूर पापा की प्रार्थना का ही फल है। ऐसा सोचकर भार्गवी खुद भी मंदिर में एक दिया जलाकर भगवान को नमन करती है, और मन ही मन कहती है, 'भगवान हमारी तो अभी बहुत ज़िंदगी बाकी होगी, लेकिन मेरे ससुर को तो अब ढलती उम्र में शांति दीजिए।'
भार्गवी की आँखें आँसुओं से धुँधली हो गईं। उसकी आँखें नम हो गईं। भार्गवी अपनी आँखों के उन आँसुओं को पोंछ ही रही थी कि तभी रमेशभाई की माला समाप्त हुई और उन्होंने आँखें खोलीं तो घर के मंदिर में दिया जलता हुआ देखा। उनकी नज़र भार्गवी पर पड़ी। भार्गवी पर नज़र पड़ते ही वे समझ गए कि भार्गवी बहुत दुःखी थी। उसके चेहरे पर बिल्कुल चमक नहीं थी और चेहरे पर उदासी छाई हुई थी।
भार्गवी को इस हालत में देखकर रमेशभाई ने उससे पूछा, "भार्गवी! क्या हुआ बेटा? क्यों इस तरह इतनी उदास होकर बैठी हो?"
भार्गवी ने अपने ससुर की बात को टालने का प्रयास करते हुए कहा, "चलिए पापा! मैं तो आपको खाना खाने के लिए बुलाने आई थी। बहुत देर हो गई फिर भी आप अभी तक नहीं आए, इसलिए मैं आपको बुलाने आई।"
रमेशभाई समझ गए कि भार्गवी सच बात छुपा गई। उन्होंने कहा, "चलो बेटा, खाना खा लेते हैं।"
भार्गवी और रमेशभाई जैसे ही डायनिंग टेबल के पास पहुँचे, अपूर्व और शोभाबहन के चेहरे के हाव-भाव देखकर समझ गए कि ज़रूर दोनों के बीच कोई गंभीर चर्चा हुई है। लेकिन दोनों ने इस बात को तवज्जो नहीं दी और खाना खाने बैठ गए।
रमेशभाई खाना खाने के बाद अपने कमरे में चले गए। अपूर्व लैपटॉप में अपने ईमेल चेक कर रहा था। भार्गवी और शोभाबहन डायनिंग टेबल समेट रही थीं। तभी राजेशभाई बाहर आए और बोले, "पापा कहाँ हैं? अमृता के पेट में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है। उसने थोड़ी देर पहले एक अतिरिक्त दवा भी खाई, फिर भी दर्द बढ़ता ही जा रहा है। मुझे लगता है कि उसे लेकर अभी ही अस्पताल जाना पड़ेगा।"
राजेशभाई की बात सुनकर घर के सभी लोग तुरंत अमृता के पास भागे। अमृता के चेहरे पर दर्द की तड़प साफ़ दिख रही थी। वह दर्द से छटपटा रही थी। राजेशभाई ने एक पल का भी विलंब किए बिना तुरंत डॉक्टर को फोन किया और कहा, "हम अभी अस्पताल आ रहे हैं। आप प्लीज जल्दी अस्पताल पहुँचिए न।"
डॉक्टर ने हाँ कहा, तो तुरंत अपूर्व से गाड़ी पार्किंग से निकालकर गेट के पास लाने को कहा गया।
अमृता ने राजेश के हाथ के सहारे गाड़ी की तरफ कदम बढ़ाए। साथ ही उसने भार्गवी से कहा कि भव्या सो रही है इसलिए वह घर पर ही रहे। और रमेशभाई से कहा कि गायत्रीबहन को अभी कुछ मत बताइएगा, वे बेवजह चिंता करेंगी।
राजेश अमृता की बात सुनकर उसे देखता ही रह गया। वह सोच रहा था कि, 'अमृता इतनी तकलीफ में भी सबके बारे में कितना सोचती है और मैंने हमेशा उसकी अनदेखी ही की। सचमुच मैं ही अमृता का गुनहगार हूँ... अगर मैंने उसका थोड़ा-बहुत भी ख्याल रखा होता तो आज जो स्थिति पैदा हुई है, वह कभी न होती। उसकी इस हालत का ज़िम्मेदार मैं ही हूँ। मैंने अगर सही समय पर उसका ध्यान रखा होता तो उसकी बीमारी इतनी बढ़ने से पहले ही उसका इलाज शुरू हो गया होता। हे ईश्वर! मुझे मेरे इस व्यवहार के लिए माफ कर देना और मेरी अमृता को बचा लेना।' वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। राजेश की जान इस समय जैसे कुदरत की मुट्ठी में कैद हो गई थी, ऐसा वह अनुभव कर रहा था।
अपूर्व गाड़ी लेकर आया कि तुरंत गाड़ी अस्पताल की तरफ फुल स्पीड में दौड़ पड़ी। कुछ ही समय में वे लोग अस्पताल पहुँच गए।
डॉक्टर ने अमृता की जाँच की और बताया कि, "अभी तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा; क्योंकि अमृता की हालत बहुत नाज़ुक है। उसके कैंसर की गाँठ फट गई है।" राजेश को रिसेप्शन पर ऑपरेशन की अनुमति की औपचारिकताएँ (फॉर्मेलिटी) पूरी करने को कहा गया।
राजेश रिसेप्शन पर आया। रिसेप्शन पर बैठी महिला ने उससे कंसेंट फॉर्म भरकर हस्ताक्षर करने को कहा। राजेश ने फॉर्म हाथ में लिया। उसने कांपते हाथों से फॉर्म भरा। आखिरकार जब उसने फॉर्म पर दस्तखत किए तो वह पूरी तरह टूट गया और फूट-फूटकर रोने लगा। वह मन से बहुत हताश हो चुका था। तब रमेशभाई ने उसे हिम्मत दी। रमेशभाई ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "तू चिंता मत कर, राजेश! अमृता बहुत बहादुर है। उसे कुछ नहीं होगा। ईश्वर किसी भी इंसान को सिर्फ उतना ही दर्द देता है जितना सहने की उसकी क्षमता होती है। और जिसे-जिसे ईश्वर दर्द देता है, उसे वह दर्द सहने की शक्ति भी देता है। अमृता को भी ईश्वर ने वह शक्ति दी है। इसलिए तू अब उसकी चिंता मत कर। तू बस उसके लिए प्रार्थना कर। मुझे पूरा यकीन है कि वह बिल्कुल ठीक हो जाएगी।"
पापा के मुँह से ऐसा सुनकर राजेश अपने पिता से लिपट गया और गद्गद आवाज़ में बोला, "पापा! मैं अमृता के बिना नहीं जी पाऊँगा।" इतना बोलते ही जैसे बाकी का दर्द राजेश के बहते आँसुओं ने ही बयाँ कर दिया कि राजेश के मन में अमृता के लिए जो गुस्सा था, वह अब पूरी तरह प्रेम में बदल चुका है।
रमेशभाई ने राजेश से कहा, "हाँ बेटा, अमृता बहुत जल्दी घर आ जाएगी। सब अच्छा ही होगा।"
कहीं छल झलकता है तो कहीं बहता है छलोछल प्यार,
दोस्त! क्या इस अधूरेपन को मिटाने में सक्षम बनेगा प्यार?