अध्याय-२०
रमेशभाई ने भार्गवी और गायत्री दोनों को फोन पर ही अमृता के समाचार दे दिए थे। अमृता के ऑपरेशन की बात सुनकर गायत्री तो एकदम अवाक् ही रह गई। वह एक साथ न जाने कितने सवाल अपने पापा से कर रही थी। पापा ने उसे शांत करते हुए कहा, "बेटा! तू चिंता मत कर। मानसकुमार को बात बता दे और फिर रोशनी उठ जाए तो शांति से अस्पताल आ जाना। तेरे सारे सवालों के जवाब तुझे वहीं मिलेंगे।"
रमेशभाई अस्पताल में आज अपने परिवार के बीच हुए संवादों से अभी तक बाहर नहीं निकल पा रहे थे। बार-बार शोभा के वे शब्द उनके कानों में गूँज रहे थे। आज पहली बार उन्हें अफ़सोस हुआ कि, मैंने अपनी अर्धांगिनी का स्थान शोभा को क्यों दिया? क्यों? ऐसा सोचते-सोचते रमेशभाई ४५ साल पहले के अपने अतीत में चले गए।
**45 साल पहले—**
रमेशभाई शुरू से ही बहुत अमीर परिवार के बेटे थे। उनके पिता के पास धन की कोई कमी नहीं थी। इसलिए उनका पालन-पोषण भी बहुत अच्छी तरह हुआ था। उन्हें जो चाहिए होता, वह सब बहुत आसानी से मिल जाता था।
जीवन में बच्चों की परवरिश का बहुत बड़ा महत्त्व होता है। जो माता-पिता अपने बच्चों से संवाद बनाए रखते हैं और उन्हें समझने का प्रयास करते हैं, उनके बच्चों की परवरिश बहुत अच्छी होती है। और ऐसे बच्चे जीवन में कभी भी कोई मुश्किल परिस्थिति आए, तो उसका बहुत हिम्मत से सामना करते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि मुसीबत की घड़ी में उनके माता-पिता उनका साथ देंगे। ऐसे बच्चों को अपने माता-पिता पर गर्व होता है। रमेशभाई को भी अपने पिता पर गर्व था।
रमेशभाई के पापा के खास दोस्त की बेटी थी—शोभा। रमेशभाई के पापा ने मृत्युशय्या पर पड़े अपने दोस्त को वचन दिया था कि, "तू अपनी बेटी शोभा की चिंता मत कर। वह माँ-बाप के बिना की बेटी मेरे घर की गृहलक्ष्मी बनेगी और तेरे घर का नाम रोशन करेगी।"
रमेशभाई ने अपने पिता के वचन का मान रखते हुए शोभाबहन से शादी कर ली थी। लेकिन शोभाबहन को कभी न तो अच्छी परवरिश मिल सकी और न ही वे एक अच्छे परिवार की गृहलक्ष्मी के रूप में अपना फर्ज़ निभा सकीं। रमेशभाई को लगा था कि समय के साथ उनमें परिपक्वता आ जाएगी। लेकिन आज रमेशभाई को अपने बेटों और बहुओं की हालत देखकर बहुत दुःख हो रहा था।
रमेशभाई के मुँह से एक गहरी ठंडी सांस निकल गई। आज उनके मन में अपनी बहुओं के प्रति सम्मान बहुत बढ़ गया था। राजेश के इस प्रेम विवाह और अपूर्व के अपने रिश्तेदार की बेटी से किए विवाह से वे दिल से बहुत खुश थे।
रमेशभाई के विचारों का सिलसिला लगातार जारी था। सचमुच औरतें ही घर को आबाद कर सकती हैं। पुरुष तो सिर्फ घर चलाना जानता है। लेकिन संस्कारों की असली नींव स्त्री की विचारधारा पर ही टिकी होती है। स्त्री जितनी समझदार होगी, परिवार उतना ही सुखी होगा। और स्त्री जितनी संतोषी होगी, उसका परिवार उतना ही आनंदित रहेगा।
एक नर्स के ये शब्द कि, 'अमृता को थोड़ा होश आ गया है।'—जैसे ही रमेशभाई के कानों में गूँजे, वे तुरंत वर्तमान में लौट आए। उनका मन आनंद से भर गया। मानो सारी उलझनें एक ही पल में दूर हो गई हों। रमेशभाई ने मन ही मन माताजी का आभार व्यक्त किया। और साथ ही खुद से भी वादा किया कि ज़रूरत पड़ने पर मेरे घर को रोशन करने वाली मेरी बेटी और बहुओं के साथ अब मैं अन्याय बिल्कुल नहीं होने दूँगा। आज तक मैंने घर शोभा के भरोसे छोड़ रखा था, लेकिन अपने घर को अपनी आँखों के सामने बिखरते देखकर मेरा दिल अब बैठा जा रहा है। अब बस! बहुत हुआ। बहुत सालों तक मैंने मौन धारण किया। अब समय आ गया है मेरी चुप्पी तोड़ने का। कहते हैं कि मौन में बहुत ताकत होती है, लेकिन कुछ समय पर उस मौन को तोड़ना भी ज़रूरी होता है। मेरा चुप रहना अब घर के लिए खतरा पैदा करे, ऐसी परिस्थिति मैं कभी नहीं बनने दूँगा।
राजेश और अपूर्व ने पापा से कहा, "अमृता को होश आ गया है। आप चिंता मत कीजिए।" रमेशभाई ने आँसू भरी आँखों से और गद्गद आवाज़ में कहा, "माताजी ने हमारी गृहलक्ष्मी को ठीक कर दिया, यह माताजी की हम पर बहुत-बहुत कृपा है। वरना अमृता के बिना इस घर की मिठास ही छीन जाती।"
राजेश अपने पापा की हालत देखकर इतना तो समझ ही गया कि अमृता ने घर के हर सदस्य का दिल जीत लिया है। एक वही अपनी अर्धांगिनी को नहीं समझ सका था।
एक नर्स आकर बोली, "अमृता राजेश से मिलना चाहती है।" ऐसा कहकर उसने आईसीयू (ICU) रूम में राजेश को जाने को कहा। राजेश तुरंत उस तरफ बढ़ा।
अमृता आईसीयू में बिस्तर पर लेटी राजेश का इंतज़ार कर रही थी। उसकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं और राजेश को ढूँढ रही थीं। जैसे ही राजेश कमरे में आता दिखा, अमृता के चेहरे पर खुशी की हल्की गुलाबी लाली खिल उठी। राजेश भी बहुत खुश होता हुआ तेज़ी से कदम बढ़ाता अमृता के करीब आ रहा था।
राजेश ने अमृता के माथे पर फिर वैसा ही चूमा और कहा, "स्वागत है हमारी आज से शुरू होने वाली नई ज़िंदगी में..."
अमृता थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली, "थैंक यू राजेश! और आई लव यू।" बस अब मानो दोनों के दिल बिना संवाद के ही बातें कर रहे थे।
भले ही रहा अतीत दर्द से भरा,
बनेगा भविष्य सुख से हरा-भरा,
परीक्षारूपी काँटों से भरा था रास्ता पूरा,
दोस्त! तेरे प्यारभरे साथ से जीवन की नैया पार कर सका!
राजेश मानो आज अमृता को देखते ही रहना चाहता था। वह अमृता की नज़र से जैसे अपने जीवन में आज तक घुली कड़वाहट को अमृत में बदल रहा था। दोनों बहुत खुश नज़र आ रहे थे।
भार्गवी और गायत्री भी अब अस्पताल पहुँच चुकी थीं। अमृता को मिली इस नई ज़िंदगी का स्वागत और अभिनंदन करने के लिए जैसे सब तत्पर थे।