Incompleteness - 23 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 23

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अधूरापन - 23

अध्याय-२३

अमृता और हनी इन चार दिनों में मानो उस खुशी को समेटने और जीने में ही मग्न थीं, जो उन्हें अब तक नहीं मिली थी। भार्गवी भी यह ध्यान रख रही थी कि उन दोनों को एक-दूसरे के साथ बिताने के लिए पूरा समय मिले, इसलिए घर की ज़्यादातर ज़िम्मेदारियाँ वह खुद ही संभाल रही थी। घर का माहौल हनी और भव्या की चहल-पहल और किलकारियों से गूँजने लगा था। रमेशभाई भी बड़े लाड़-प्यार से दोनों बच्चियों को कहानियाँ सुनाते, और उन्हें बारी-बारी से अपनी पीठ पर बिठाकर, घुटनों के बल चलकर घोड़ा-घोड़ा का खेल खिलाते थे। और जब थक जाते, तो थोड़ी देर बैठकर "चिड़िया उड़ी..." और "चक्की पीसे धान..." जैसे खेल खिलाने लगते थे। 

अपूर्व और राजेश घर में गूँजती हँसी की वजह से बेहद खुश रहते थे। घर का माहौल इतना खुशनुमा होने के कारण वे दोनों भी शाम को जल्दी घर पहुँचने की कोशिश करते थे। सबसे अलग स्वभाव वाली शोभाबहन अपने घमंड और दिखावे में रहकर घर के इस अलौकिक आनंद से वंचित ही रहीं। कहते हैं न कि जिसके भाग्य में न हो, उसे कुदरत दे भी दे तो भी उनका स्वभाव उन्हें उस सुख का आनंद नहीं लेने देता...

भाग्य में नहीं था, फिर भी कुछ मिला है आज!
दोस्त! अधूरेपन की कमी पूरी हुई है आज!

पूरा परिवार इतना खुश था कि अपूर्व को लगा, अगर उसकी इच्छा पूरी हो जाए तो पूरे घर में हमेशा ऐसा ही आनंद और चहल-पहल बनी रहेगी!

हनी को आए हुए आज ४ दिन पूरे होने वाले थे। शाम को घर वापस जाना था, इसलिए दोपहर से ही हनी का मूड ठीक नहीं था। उसका अपने घर जाने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था। ऐसा नहीं था कि उसे विनय, नीला या अपने भाइयों की याद नहीं आ रही थी। वह फ़ोन पर रोज़ उनसे बात करती थी, लेकिन अमृता के पास उसे जो प्यार और लगाव चाहिए था, वह पूरा मिल रहा था। "अगर अमृता आंटी के पास थोड़ा और रहने को मिलता तो कितनी मज़ा आती न?" वह बार-बार ऐसा बोल भी रही थी।

अचानक ही सब कुछ ठीक होने लगता है,
दोस्त! जब कुदरत अपनी कृपा बरसाने लगती है।

शाम को विनय अपने परिवार के साथ अपूर्व के घर डिनर करने और हनी को लेने आता है। हनी सबको देखकर बहुत खुश होती है। उनके आने से लेकर खाना खत्म होने तक हनी ने जो भी मज़ा किया था, बस उन्हीं बातों का बखान करती रही। खाते-खाते भी उसका मुँह बातें करने के लिए चालू ही था। उसकी छलकती खुशी को देखकर साफ़ समझा जा सकता था कि वह बहुत ज़्यादा प्रसन्न है। विनय और नीला दोनों यह बात अच्छी तरह समझ गए कि हनी के लिए अपूर्व द्वारा की गई इस पहल पर हाँ कहने में अब कोई परेशानी नहीं है।

अब काफी देर हो चुकी थी, इसलिए विनय ने हनी से कहा, "चलो हनी, अब घर चलते हैं। बहुत देर हो गई है।"

हनी ने सवालिया लहज़े में पूछा, "थोड़ी देर और रुक जाएँ तो?"

विनय ने कहा, "कल सुबह जल्दी ऑफिस जाना है। बेटा, फिर कभी वापस आ जाना।"

हनी "ओके" कहकर खड़ी तो हो गई, लेकिन उसका मन अभी राजी नहीं था। सब लोग उन्हें छोड़ने बाहर गेट तक गए। गाड़ी पार्किंग से बाहर आई। हनी उसमें बैठने ही जा रही थी कि अचानक वापस मुड़ी और जाकर अमृता से लिपट गई। ढलती हुई, भावुक आवाज़ में वह बोली, "क्या मैं आपको मम्मी बुलाऊँ?"

हनी के इस सवाल से अमृता बेहद खुश हो गई। उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। उसने दोबारा पूछ ही लिया, "क्या कहा तुमने बेटा!?"

हनी ने ज़ोर से और दृढ़ आवाज़ में कहा, "क्या मैं आपको मम्मी बुलाऊँ?"

अमृता ने उसे गोद में उठा लिया और उसके चेहरे पर ढेर सारा प्यार लुटाने लगी।

आँखें छलक रही थीं खुशियों से!
पूरा हुआ था जीवन का अधूरापन इससे!
माँ की ममता से भर रही थी जीवन की किताब।'
दोस्त! माँ-बेटी का जीवन भर गया खुशियों से।

अमृता ने बड़े प्यार से हनी को अपने सीने से लगा लिया। अमृता जिस शब्द को सुनने के लिए तरस रही थी, आज अचानक वही शब्द गूँज उठा था।

थोड़ी देर बाद हनी फिर बोली, "कहूँ न आपको मम्मी?"

अमृता हनी की आवाज़ से सुध संभालते हुए बोली, "हाँ बेटा! क्यों नहीं?"

हनी तुरंत बोल उठी, "तो अब मैं यही रहूँ? आपके पास?"

हनी के शब्द अमृता की भावनाओं को झकझोर रहे थे। वह क्या जवाब दे, यही सोच रही थी कि तभी राजेश बोला, "लेकिन तुम्हें एक प्रॉमिस (वादा) करना पड़ेगा। बोलो, करोगी ना?"

हनी तुरंत बोली, "कैसा प्रॉमिस?"

राजेश बोला, "तुम्हें मुझे पापा कहना पड़ेगा।"

हनी हँसते हुए मुँह से तुरंत बोली, "ओके पापा..."

राजेश भी अमृता और हनी के पास गया और उन दोनों को गले लगा लिया। उन तीनों के चेहरों पर खुशी की लालिमा छा गई। तीनों का परिवार आज सही मायनों में पूरा हो गया था।

इन तीनों का यह मिलन देखकर बाकी सब बहुत खुश हो गए और तालियाँ बजाने लगे—सिवाय शोभाबहन के।

शोभाबहन गंभीर चेहरे और गुस्से भरी आवाज़ में बोलीं, "ऐसे मुझसे पूछे बिना फैसला ले लिया? इतनी बड़ी बात यूँ ही निपटा दी? तुम सब एक दिन पछताओगे। दूसरों के बच्चे चार दिन अच्छे लगते हैं, बाद में नहीं। एक दिन ऐसा आएगा जब यही लड़की तुम सबको आँख की किरकिरी की तरह चुभने लगेगी। तब मेरी यह बात याद रखना। अपने अपने होते हैं और पराये हमेशा पराये ही रहते हैं। पराये कभी अपने नहीं होते, समझे? यह लड़की अभी तुम लोगों को कितनी भी अच्छी लग रही हो, लेकिन एक दिन अपना असली रंग दिखाए बिना नहीं रहेगी।"

शोभाबहन ने हमेशा की तरह अपनी आदत के मुताबिक बड़बड़ाना शुरू कर दिया, लेकिन अब इस घर में उनके बड़बड़ाने का कोई असर नहीं होता था। उनकी बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सबने ऐसे रिएक्ट किया मानो उनकी बातें सुनी ही न हों। घर वालों का ऐसा व्यवहार देखकर वह अंदर ही अंदर बुरी तरह झल्ला गईं और गुस्से में तिलमिलाती हुई घर से बाहर निकल गईं।