Kahani Satrah secound ki in Hindi Short Stories by Ajay Oza books and stories PDF | कहानी सत्रह सेकन्ड की

कहानी सत्रह सेकन्ड की

कहानी सत्रह सेकन्ड की

लेखक :–

अजय ओझा


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कहानी सत्रह सेकन्ड की

पहले सेकन्ड में कुछ खयाल नहीं आया । स्वाभाविक है,क्युं कि मैं दूसरे विचारों में गुम था । जी नहीं, पुरानी प्रेयसी केखयालों में बिलकुल नहीं था । सोचता था कि आज के बाद कभीहनुमानजी के मंदिर चलकर जाने की प्रतिज्ञा नहीं करूुंगा । चला नहींजाता, थक जाता हूँ । जब पैर टूटा और फ्रेक्चर हुआ तब मन में प्रणठान लिया था कि जब चल सकूँगा तब सब से पहले चलकरहनुमानजी के दर्शन करने जाऊँगा । तभी तो सहारे के लिए ये लाठीहाथ में थाम ली है ।

दूसरे सेकन्ड में कुछ खयाल आया । दूर से बाइक आ रहीथी । कुछ खास गति नहीं थी । बाइकचालक युवक शायद हनुमानजीके दर्शन करके लौट रहा होगा । मैं भी कितना भोला हूँ, हनुमानजीके मंदिर कोई 'समरस ग्रामपंचायतों' का निरीक्षण करने थोडे हीआता है ?

तीन सेकन्ड तो पलभर में बीत गये । चौथे सेकन्ड मैंनेलाठी सँभालकर चलने का काम चालू रखा । पर मेरी गति शायद कुछधीमी हुई थी । मेरी चीकनी नजर अब भी उस बाइकचालक पर टिकीथी । बाइक की पिछली सीट पर भी कोई बैठा था ऐसा अंदाजा लगानेमें पाँचवाँ सेकन्ड तो आ ही गया होगा । पुरूषसहज एक स्वाभाविककौतुहल हुआ ़ ़ , पीछे कोई लडकी बैठी होगी । नजरें और तीक्ष्णबनाकर चश्मे से बाहर निकाली और वहाँ पर केन्द्रित की । वहाँमतलब ? कहाँ ? बाइकसवार युवक के कंधे और गरदन के बीचएकसौ दस औंस का कोना बना था, बस वहाँ ़ ़ , जी, बिलकुल, येछठे सेकन्ड की ही बात है । सातवें सेकन्ड में वहाँ एक रेशमीझुल्फोवाला सर दिखाई दिया, और आठवें सेकन्ड में खूबसूरत आँखेंभी, जिस पर फुल्ली पोलिश्ड आइ–ब्रो । बहोत स्पष्ट तो कहां दिखेगापर हमारी कल्पना दृश्य में ढलकर दृश्य को स्पष्ट कर देती है न ।

बिना एन्टेना के क्रिकेटमैच देखते हैं तो टीवीस्क्रीन के डोटस के बीचबोल दिखता है ? बस यूं समझ लें । यूं ही स्पष्ट सुंदर आँखें दिखपडी, ़ ़ हूबहू वनिता जैसी । हाँ, अब ठीक सोचा, पुरानी प्रेयसी कीबात ही करता हूँ । अभी तो नौवीं सेकन्ड खत्म हो न हो कि वनितायाद आ गई । अतः दसवीं सेकन्ड की बात शायद लंबी हो जाने काडर है ।

ये वनिता याने ़ ़ , जाने भी दो, वनिता की पहचान कीएहमियत कितनी ? वैसे भी बीत चुके क्षणों को यूं इस लाठी से कुचलथोडे सकते है हम ? कुछ समय पहले ही वनिता ने मुझे साइकिलछोडकर नई बाईक खरीदने की सलाह दी थी । उसके आग्रह से मेरीएक न चली । तो मैंने सब से पहले बाइक सीखने का इरादा किया ।

इसी इरादे के अमलीकरण के तहत एक दोस्त की बाइक का कुछजायजा ले रहा था कि ये फ्रेक्चर हुआ । 'गेट वेल सून' कहने, मेराहाल पूछने एक बार भी वनिता आई नहीं । तभी तो मैं उसे 'पुरानीप्रेयसी' बता रहा हूँ, तो मेरा क्या कसूर ?

ये लो, देखो ़ ़ , दिवाली पर प्रसिद्ध होते सामयिको केदो संयुक्त अंक जैसी ग्यारहवें और बारहवें सेकन्ड इस वनिता कीबातों में ही हाथ से निकल गये, शायद वनिता की तरह। तेरहवेंसेकन्ड में वह एकसौ दस औंस का कोना जरा सिकुड़ रहा हो ऐसाजरूर लगा पर उस कोने के पीछेवाला गुलाबी चेहरा और बडा होते हुएनजदीक आ रहा था । जी नहीं, मैं अपनी खुद की आँखों से मेरेनंबरवाले चश्मे तक नहीं पहचान सकता तो इस खूबसूरत चेहरे कोकैसे पहचान पाऊँ ? यदि ़ ़ , यदि वह सचमुच वनिता ही है फिर तोन पहचानना ही बेहतर है, खाँमखाँ जी जलाना ़ ़ ?

हनुमानजी का मंदिर अब ज्यादा दूर नहीं । आधे सेज्यादा रास्ता तो मैंने तय कर लिया है । पीछले चौदह सेकन्ड से मैंजिसकी बातें निकाल रहा हूँ उस वनिता के साथ मैं एक ही बार इसमंदिर आया था । वहाँ हमने ़ ़ , रहने दीजिए, इस बात की कोईएहमियत नहीं कि वहाँ हमने क्या क्या किया । कैसी कैसी चाहतभरीबातें कीं । बस इतना याद है कि ओटो में आये थे और सीटीबस मेंलौटना पडा था ।

सेकन्ड पन्द्रहवां ़ ़ , बाइक ़ ़ , कुछ औंस का कोना,खूबसूरत चेहरा ़ ़ , लोकेशन ़ ़ वही का वही ़ ़ हाइ–वे ़ ़ , ईश्वरने मन भी कैसा बनाया है ? केवल पन्द्रह–बीस सेकन्ड में तो कितनाकुछ सोच लेता है ?

जैसा कि आप का मानना है; सोलहवें सेकन्ड में वोबाइक बिलकुल करीब आ चुका । खूबसूरत चेहरे का संपूर्ण उदय होचूका था । उसने पहने कपडों के रंग काफी स्पष्ट दिख रहे थे ।बाइकचालक की कमर पर लिपटे हुए सुंदर हाथ भी दिखाई दिया ।

समझो कि ये वनिता ही है ़ ़ तो ? पलभर तो हुआ कि लाठी को फैंकदूँ, भूल जाऊँ फ्रेक्चर को, रास्ता क्रोस करके दौडकर उस तरफ जापहूँचने का मन हुआ । मन तो ऐसा ही होता है, इसी लिए मन परकाबू रखने के वास्ते भगवान ने दिमाग भी दिया होगा । लेकिन एकबात तो तय है, इस सोलहवें सेकन्ड में मैं हनुमानजी को बिलकुलभूल गया था ।

सबसे कठिन व भारी पड़ जाए ऐसा सत्रहवां सेकन्ड ़ ़ ।इस क्षण वह बाइक ठीक समांतर पसार हुआ । एक नजर मेरे चश्मे केकाच तक टकराकर वापस चली गई हो ऐसा लगा । चल रही हवाओंसे कोई 'अपनी–सी' खुश्बूओं को पहचानने की मैंने नाक सिकोडकरकोशिश की । ़ ़ लाठी के हेन्डल पर प्रस्वेदबिंदु फैलते रहे ़ ़ ़

़ ़ हंसा मेरी साइकिल पर जरूर बैठ जायेगी ़ ़ ़

–मैने मन को समझाया ।

़ ़ और ़ ़ ,

़ ़ अठ्ठारहवें सेकन्ड में मैं बिना लाठी के सहारे बुलंदइरादों से भरे कदम बढाते हुए आगे बढ़ रहा था, हनुमानजी के मंदिरकी ओर ़ ़ ़

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nihi honey

nihi honey 3 years ago

Mirza Hafiz Baig

Mirza Hafiz Baig 6 years ago

प्रतिभाशाली लेखक के प्रभावशाली लेखन का और एक उदाहरण । एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए ।

Bharat Kumar

Bharat Kumar 6 years ago

Chandraveer Singh Thakur
Prakash Chamaria

Prakash Chamaria 6 years ago