जिन्नात की दुल्हन-2

(हिन्दी पाठको को अगर ये कोन्सेप्ट पसंद नही आ रहा तो रोक देन्गे वादा रहा)

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सूहागरात की रंगिनिया खलिल के लिए अभिशाप साबित हूई थी।

अपनी जिंदगी की बेहतरीन रात को जैसे उसके मूक्कदर से किसी ने छीन ली थी।

गुलशन अपनी सजी हुई बेड पर किसी के साथ हमबिस्तर थी।

उसकी हरकतें काफी देरसे खलिल देख रहा था।

वो अपने बिस्तर मे ईस तरह लोट रही थी।

जैसे कोई पके हुए आम को निचोड कर उसका रस पी रहा था।

बार-बार उसकी गरदन को उपर उठा लेना और आहे भरना, वो दर्दनाक चित्कार खलिल के कानो मे गरम सीसा बनकर उतर रहे थे।

उसके पैरो को उपर नीचे होते देखकर खलिल बेजान सा हो गया।

गुलशन उसके आगोश मे ईस वक्त वो होनी चाहिए थी।

उसकी जगह कोई और उसके खुबसुरत बदन को आज मजे से लूट रहा था।

खलिल कितना बेबस था कि उस नजारे को देखने के अलावा वो कुछ कर भी तो नहीं सकता था।

वो सारी रात करवटे बदलता रहा।

गुलशन को छू ने का अब उसमे हौसला नही था।

सारी रात उसने वो नजारा देखा।

गजब की बात थी।

ना गुलशन थकी थी ना उससे रातभर खेलने वाला।

खलिल रातभर नही सोया।

जब सूब्हा चार बजे गुलशन थककर चूर हो गई।

अपने बदन को ढीला छोड़कर चहेरे पर परम तृप्ति और दर्द मिश्रित भाव लिए गुलशन इत्मिनान से अन्जान बनकर सोई थी।

शायद उसको वो भी पता नही था की उसके सारे ख्वाब उसकी जिंदगी मे आई बेहतरीन रातने छीन लिये थे।

एक ही रातमे उसने अपने जिगर के टूकडे को कोसो दूर कर दीया था।

उससे ये अन्जाने मे ही हुवा सही मगर बहोत तकलिफ हुई थी खलिल को

तब खलिल ने हिम्मत जुटाई।

सोफे पर सोकर उसका बदन दर्द करने लगा था।

वो आहिस्ता से उठा।

कमरे में हल्की सी रौशनी मौजूद थी।

खलिल और गुलशन के लिये सजाई गई बेड पर कूचले गए फूल जैसे खलिल के बिखरे अरमानो की तरह तीतर-बीतर हुए पडे थे।

अपनी बेड के करीब पहोंच कर वह गुलशन को टकटकी लगाये देख रहा था।

उसके दोनो पैर चौड़े हुये पडे थे।

उसकी ब्रा खुली हुई होने से स्तनों की गोलाईया बाहर झाँक रही थी।

उसकी खूनसे सनी पैन्टी देखकर खलिल की आंखे फटी की फटी रेह गई।

खलिल को उसपर रहेम आ गया।

कितनी बेरहेमी और बर्बरता बर्ती गई थी उसके साथ..?

बेईन्तहा महोब्बत थी उसे खलिल से..

और वो महोब्बत की वजह से ही खलिल अपनी भीगी हुई पलके लिए जैसे अपने आप से नजरे चुरा रहा था।

उसे अपने सीने से लगा कर चीखना चाहता था।

आज अपनी ही नजरो मे वो जैसे गिर गया था।

अपनी गुलशन के खुले बदन को लिबास पहनाने वो उसके कंधे की और झूका।

उसके भीगे गालो पर अपने हाथ फेर कर खलिल सहेलाने लगा।

वो सूकुन से परिपूर्ण अहेसास के साथ भरी निंद में थी।

उसकी पलको पर अपने होठ रखने खलिल थोडा उपर उठा की।

अचानक... !

उसकी गोल बडी-बडी आँखें खुल गई।

ईतनी बडी आँखें देखकर खलिल ने गबरा कर पिछेहट करली।

वो अपनी जगह पर बिना हाथ के सहारे एसे उठकर बैठी हौ गई जैसे कीसीने उसकी पीठ पीछे से धक्का लगा कर बैठा दिया न हो...!

खलिल को धूरते हुये उसने मुंह से बोल फूटे।

"पाबंदी लगाकर रखता हूँ

मै अपने नजराने पर

ये गुलशन भी मेरी

ये जलवा भी मेरा..!"

"क्या मतलब..? "

अपने ही अंदाज मे गुलशन को सुनना खलिल के लिए हैरान कर देने वाली बात थी।

"तू ईतना नादान नहीं की हर बात का मै जिक्र करू

गैर की अमानत को छू ने की गूस्ताखी

न किया कर..! "

"गैर की अमानत..? "

खलिल गुलशन की आँखों मे देख रहा था।

ये बोलने का तरीका गुलशन का बिलकुल नही था।

सारा लहेजा ही अलग था..।

खलिल के सवाल पर वो हसने लगी।

उसकी हंसी बढती रही।

खलिल भौचक्का सा उसे देख रहा था।

ईतना सबकुछ देखने के बाद भी तू मूजसे सवाल पूछता है..?

तो सून...!

गुलशन तेरी नही मेरी ख़ातून है ..!

मै उसके साथ था और मेरा निकाह हो गया है तुम्हारे साथ साथ ईससे..!" खलिल का चहेरा खौफझदा हो गया।

उसने गुलशन की बड़ी बड़ी आंखों के सामने डटे रेह कर पूछा।

"मै जान सकता हूँ की आप हजरत कौन है..?"

"जिन्नात हूं बूझदिल...!

तू अपनी औकात मे रहेना..!

याद रखना गुलशन अब एक जिन्नात की दुल्हन है "जिन्नात की दुल्हन"..!"

खलिल देखता ही रेह गया।

वो कमर लचकाती हुई उठकर स्नानागार मे गूस गई।

उसकी तिरछी नजरे जानलेवा थी..।

***

खलिल ईस वक्त काफी परेशान था।

गुलशन उसके होश उडाकर स्नानागार मे चली गई थी

खलिल शयन कक्षमें अपनी लाचार निगाहो से कमरे को देख रहा था।

अपने शयनकक्ष को उसने खुद दिलचस्पी ले कर तैयार करवाया था।

दीवारों का रंगआकर्षक और हल्का गुलाबी यह सोच कर रखा था की मन में शांति बनी रहेगी और परिवार में किसी तरह का विवाद नही होगा ।

बेड पर एक बडा गद्दा बिछाया गया था।

जिससे पति-पत्नि के मध्य एकता एवं सामंजस्य बना रहे।

दोनो के बिच प्यार बना रहे यह सोचकर ‘‘लव बर्डस् और मेडरिन-डक्स‘‘ की तस्वीरे अपने शयन कक्ष में खलिल ने लगवाई थी।

शयन-कक्ष की दीवारें, परदे व आंतरिक साज-सज्जा सभी गुलाबी रंग से रंगी थी जिससे मन प्रफुल्लित रहता है।

गोपनीयता शयन-कक्ष का विशेष गुण है अतः इसे आंतरिक एवं ब्राह्य व्यवधानों से मुक्त रखा गया था।

इस कक्ष में डेसिंग टेबल पूर्व दिशा में रखा गया था। शयन-कक्ष में वस्त्रों को रखने के लिए अलमारी थी अलमारी का मुख उत्तर दिशा में था।

खलिल का मानना था कि जिस अलमारी में कीमती आभूशण व नकदी आदि रखी जाए उसके दरवाजे उत्तर की ओर ही खुलें, तो बेहतर होता है।

लेकिन सब कुछ आज उसकी सोच के विपरीत हुआ था!

उसकी सारी उम्मीदे तार-तार हो गई थी!

अपने आशियाने को जिस अरमानो से उसने सजाया था। वो सारे अरमा बिखर चूके थे और ईस वक़्त कमरे में मौजूद था।

दम घुटने वाला सन्नाटा..!

दिवारे चीख रही थी।

परदो की सरसराहट कमरे में किसी की मौजूदगी का अहेसास दिला रही थी।

खलिल ने कभी सोचा नहीं था की उसकी जिंदगी मे एसा तूफान भी आयेगा।

जो उसने गुलशन के साथ में संजोये ख्वाबो को राखमे तब्दिल कर देगा।

उसने मसूरी और नैनीताल की फाईवस्टार होटले अपने हनीमून के लिए बूक करवाई थी।

टिकटे कन्फर्म थी।

क्या क्या नहीं सोचा था उसने... !

जिंदगी के ईन हसीन लम्हो को वो इस तरह जीना चाहता था की वो पल अपनी जिंदगी मे गुलशन और वो खुद ताउम्र न भूले..!

पर कुदरत को शायद यह मंझुर नही था।

खलिल ध्यान से ईस वक़्त स्नानागार के डोर को देख रहा था।

शावरबाथ ले रही गुलशन ईस वक़्त पानी की बौछार से काफी देर से जैसे खेल रही थी।

पानी की बौछार की आवाज़ खलिल के जेहन में आग लगा रही थी।

काफी देर हूई तो खलिल से रहा न गया।

वो कैसे उसके लिए बेफिक्र हो जाता ?

जब की ईस वक्त गुलशन को उसकी जरूरत थी।

धीरे धीरे बिना आहट किये वो स्नानागार की और बढा।

उसकी धड़कने तेज हो गई थी।

दील धाड धाड करके पसलियाँ से टकरा रहा था।

वह परवरदिगार से यही दुवा माँग रहा था की गुलशन का कोई और रूप देखने न मिले तो अच्छा है !

खलिल जिन्नात से काफी हद तक डर गया था!

वह कुछ भी कर सकता है !

क्यूकि गुलशन उसके कब्जे मे थी।

उसके कहे अनुसार वो गुलशन से शादी करके आया था ।

और खलिल ने बहोत बूजूर्गो से सूना था कि जब कोई मुवक्किल किसी खूबसूरत औरत के शरीर मे रहेकर साथ-साथ शादी के बंधन में बंध जाता है तो फिर उस औरत के शरीर में से उसे निकालना नामुमकिन हो जाता है ।

वह स्नानागार के डोर पर खड़ा था!

ईस वक़्त उसने डोर को हल्का सा धक्का दिया।

डोर खुला था।

उसकी गुलशन बाथ टब मे मुंडी झूकाये पडी थी।

टबमे पानी उसपर बौछार बनकर गिर रहा था।

उसका गोरा बदन भीगने का मजा ले कर फ्रिज हुये अकड कर पडा था।

खलिल उसे देखकर कर टूट सा गया।

उसने तेजी से उसके गीले निर्वस्त्र बदन को उठाया।

और शयनकक्ष मे बेड पर ले आया।

उसकी सांसे चल रही थी।

मगर वो बेहोश थी।

खलिल टोवेल से उसका बदन पोछने लगा।

खलिल ने देखा की उसके उन्नत वक्षस्थल पर जगह-जगह लाल धब्बे हो गये थे ।

उसके होठ भी अधिक मात्रा में सूजे हुए थे।

जैसे उसके होठो को बार बार  दांतो से काटा गया था..!

गुलशन के सारे बदन का यही हाल था।

गुलशन को ईसबात की भनक न लगे यह सोचकर खलिलने अलमारी से उसके लिए यलो कलर का ड्रेस निकाला।

साथ-साथ गुलशन को अति पसंद निला टाईट जीन्स लिया।

और गुलशन को फटाफट पहनाने लगा! तेजी से उसने ड्रेस पहेनाया! फिर जीन्स पहनाने लगा!

तभी वो कराहने लगी।

"कहा.. हो.. आप..?"

उसके होठो से दर्द भरी आवाज निकली।

मुझे छोड़कर कहीं मत जाओ..! मुझे बहोत डर लग रहा है.. खलिल..!

"

बेबी..! मै यही हूं तुम्हारे पास..!

गभराओ मत..! "

उसने पलके उठाई.. उसकी आंखों में बहोत थकान थी!

बदन टूट रहा था!

उसने खलिल को ध्यान से देखा वह उसकी जीन्स चढा रहा था।

फिर उसने चौककर अपने कपड़ों पर नजर डाली।

खलिल...! ये आपने क्या किया..?

रात को दर्द का बहाना करके सोफे पर सोये और मूजे निंद आ गई तो आपने मूजपर रेप किया..?

मेरा सारा बदन टूट रहा है

थोडी रहेम बरतनी चहीए थी मूजपर..!

मेरी गहेरी नींद का आपने क्या जमकर फायदा उठाया हैं ।

खलिल क्या बोलता...? उसकी जबान तालु से जा चिपक थी।

उसने जो आरोप लगाया उसको मूक रेहकर क़बूल करना उसकी मजबूरी थी।

आप जाओ..! यहां से..! "

हमे अकेला छोड़ दो.. लीव मी अलोन प्लिज..!

खलिल तिलमिला कर अपने शयनकख्श से बाहर निकल गया।

(क्रमश:)

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- साबीरखान पठान

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