SMRITI KI SHEETAL CHANH books and stories free download online pdf in Hindi

स्मृति की शीतल छाँह

स्मृति की शीतल छाँह

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ये ज़िंदगी है जो कभी धूप ,कभी छाँह सी चलती रहती है |ये इंसान को कभी नरम तो कभी गरम थपेड़े मारती ही रहती है | कई बार मन में प्रश्न उठता है ---'ऐसा क्यों आख़िर?' भीतर से स्वयं ही उत्तर आता है ,'इसीलिए कि यह ज़िंदगी है | ' और हम चुपचाप,गुमसुम से अपने सामने सब कुछ होते हुए देखते रह जाते हैं ,कुछ भी कर सकने में स्वयं को अशक्त पाते हैं |

न जाने कौनसी गली में किसकी ज़िंदगी की शाम हो जाए ,किसीको कुछ नहीं मालूम कब काम तमाम हो जाए ? सोच क्या कल्पना से भी दूर की बात ! एक स्नेही ,सुमधुर सी मुलाक़ात ,बिना किसी प्लान के ,बिना किसी योजना के मिलना और अपना बन जाना ,ये सब दैवीय संयोग ही लगते हैं | यद्धपि हम नहीं जानते ,न देखा ,न जाना ,बस दिल ने ही महसूस किया उस ईश्वर को जिसे सब कहते हैं ,सर्वव्यापी ,सर्वस्व है | जो न जाने कहाँ है किन्तु महसूसता है मन के भीतर ! एक लौ की तरह करता है रोशन मार्ग हमारे और जब उसका मन होता है तब पुकार लेता है | मुझे तो यह महसूस होने लगा है ,आख़िर क्यों हम एक ख़ास उम्र के दरीचे पर आकर ऐसे लोगों से मिलते हैं जो अचानक बिछड़ने पर एक टीस दे जाते हैं ? किंतु यहाँ भी तो मनुष्य का वश नहीं ,यह भी तो हमारे हाथ में नहीं | सब कुछ दैवयोग से अपने आप होता रहता है और हम उसे होते हुए देखते रहते हैं | वास्तव में समय की धारा के साथ बहना ही हमारे लिए उचित है और वह भी ना-नुकुर किए बिना | हमारे पास परिस्थिति को नकारने की गुंजाइश ही कहाँ होती है ?

बहुत पुरानी पहचान नहीं थी मेरी भूपी सूद जी से ! बस --नाम सुना था 'अयन प्रकाशन' ! इससे पहले मेरी कई पुस्तकें अन्य प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशित की जा चुकी थीं | पत्र- पत्रिकाओं के माध्यम से थोड़ा-बहुत परिचय होगा शायद ,इससे अधिक कुछ नहीं | हाँ,मीडिया से बहुत पहले से टच में रही किंतु प्रकाशकों का तो बहुत सुखद अनुभव रहा नहीं था तब तक | उसमें किसी एक की गलती नहीं होती है ,प्रकाशक व लेखक का आपसी ताल-मेल बैठना भी ज़रूरी है ,ऐसा मैं मानती हूँ |

एफ़.बी पर भी कोई बहुत एक्टिव नहीं थी मैं ,आता ही नहीं था कुछ | मज़े की बात ये कि टाइप करना तक तो आता नहीं था | हमारे ज़माने की एक बड़ी मज़ेदार बात यह रही कि हम लोगों ने लिखना तो बहुत पहले से शुरू कर दिया किन्तु टाइपिंग के नाम पर हम शून्य ही थे | हाथ से लिखकर भेजते रहते ,कुछ रचनाएँ स्वीकृत होतीं ,कुछ बैरंग लौटकर मुँह चिढ़ाने लगतीं, मुझे लगता है यह दौर हमारी पीढ़ी के काफ़ी लोगों ने भोगा है ,संभवत: कमोबेश आज भी यही स्थिति है | समय अपने मूल्यों के साथ करवट लेता है ,मूल्य जीवन की स्लेट से पूरी तरह नहीं मिटते | हमारी परिस्थितियाँ मूल्यों को नवीन आवरण में लपेट समक्ष आती रहती हैं ,समाप्त नहीं होतीं |

दो उपन्यास तैयार थे मेरे ,कन्फ्यूज़न था किस प्रकाशन-संस्थान से ये प्रकाशित होंगे ? मेरे लिए कोई प्रकाशन संस्थान हाथ फैलाए तो बैठा नहीं था | 2015 में अपने पति के साथ दिल्ली गई थी ,तब सूद युगल से मिलने का मन बना किंतु उनसे फ़ोन पर बात होने पर पता चला , उनका निवास उस स्थान से काफ़ी दूर था जहाँ मैं ठहरी हुई थी | उस समय ऐसा भी नहीं लगा कि उधर से कुछ विशेष आग्रह था | चुप लगाकर बैठ गई | उपन्यासों को भी वापिस अहमदाबाद ले आई | अधिक प्रकाशन-हॉउस में जा नहीं पाई ,फ़ोन पर कुछ संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाए ,सो पांडुलिपियों को बगल में दबाकर वापिस ले आई यानि लौट के बुद्धू घर को आए | किन्तु मन में कुरेद थी,अच्छे प्रकाशन -संस्थान से जुड़ने की | अहमदाबाद आकर मेल के माध्यम से बात होती रही | कई अच्छे प्रकाशन -संस्थान तैयार भी हुए किन्तु सबके पास पुस्तकों का जमघट था ,कोई साल भर की बात करता तो कोई डेढ़-दो वर्ष की | वास्तव में हर चीज़ व्यवस्थित होती है,मेरे लिए भी कुछ व्यवस्थित था |

'सिटी प्लस टेलीविज़न एन्ड फ़िल्म इंस्टीट्यूट 'गांधीनगर ,अहमदाबाद में श्री आई.एस.माथुर के साथ काम कर रही थी | वो डायरेक्टर थे ,मैं विज़िटिंग फैकेल्टी थी उन दिनों वहाँ | इससे पहले NID में भी उनके साथ कुछ वर्ष काम कर चुकी थी | बहुत मन था उनका 'गवाक्ष ' पर फ़िल्म बने किन्तु उससे पूर्व ही उनके देवलोक सिधारने पर 'गवाक्ष ' के पट बंद होने लगे | हमारी लगभग चार मीटिंस ही हो पाईं थीं | फ़िल्म पर काम करने का मतलब एक लंबे समय तक उसके साथ इन्वॉल्वमेंट,बहुत सी शोध ! बहुत लोगों के साथ टीम-वर्क ! ऐसा हो नहीं सका | अब तो बिलकुल पक्की तौर पर लगता है जो चीज़ें जैसे होने वाली होती हैं ,वैसे ही होती हैं ,बेशक हम कितनी ही लकीर क्यों न पीटते रहें ,कितने ही प्रयत्न क्यों न कर लें | माथुर साहब के अचानक जाने के बाद वह मैटर मेरी आँखों के सामने नाचने लगा जो हम फ़िल्म के लिए एकत्रित कर रहे थे | पति श्री ललित मोहन श्रीवाल व बेटा श्रुतिन ,दोनों का विचार रहा कि फ़िल्म नहीं बन पाएगी तो कम से कम इसका पुस्तक के रूप में आना ज़रूरी है |

बस ,माथुर साहब के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में 'गवाक्ष' का लेखन हो ही गया और अब आई बारी श्री भूपी सूद जी से बात करने की | मेरा उनसे अथवा श्रीमती सूद से कभी मिलना नहीं हुआ था | हाँ, हम 'फेस-बुक' मित्र थे | चन्द्रप्रभा जी के लेखों ने मुझे शुरू से प्रभावित किया है | मेरा बालपन आर्य समाजी परिवार में बीता , उनके लेखन में ,चिंतन में मुझे अपने विचारों की झलक मिलती और मैं उन्हें पूरे मन से सराहती | इसी बीच उन्होंने एक महिलाओं के काव्य-संग्रह का संपादन किया | पूरी तरह से याद नहीं आ रहा है किन्तु मैं न जाने क्यों और कैसे उनके संग्रह का एक छोटा सा भाग बन गई थी | यद्धपि ,मैंने कई वर्षों से इस प्रकार के संकलनों में प्रकाशित होना बंद कर दिया था ,जिसके कई कारण थे | लेकिन इस फेस-बुक की मित्रता ने ही मुझे श्रीमती एवं श्री सूद साहब के विचारों से अवगत करवाया , मुझे उपन्यास 'गवाक्ष ' के बारे में बात करने के लिए प्रोत्साहित किया और मैं उन्हें 'गवाक्ष' की सॉफ़्ट-कॉपी भेजकर प्रतीक्षा में दिन गिनने लगी |

फ़ोन पर ही सूद साहब से बातचीत के दौरान मैं उनके स्वभाव की ओर आकर्षित व बाद में क़ायल हो गई | काफ़ी दिनों तक मुझे अपने उपन्यास के बारे में पता नहीं चल रहा था | स्वाभाविक था ,मेरी बेचैनी बढ़ी किन्तु भूपी सूद जी ने बहुत संयम भरे शब्दों में जब बताया कि वे स्वयं उपन्यास को बहुत गंभीरता से पढ़ रहे हैं ,उन्हें वह बहुत रुचिकर व अलग लग रहा है ,मैं आश्वस्त सी हुई |

मेरी दृष्टि में सूद साहब का 'अयन प्रकाशन' दोनों पति-पत्नी की सकारात्मक सोच व सहभागिता से ही इतना लोकप्रिय हुआ | प्रभा जी को मैं लगातार पढ़ती रही हूँ और अपनी बुद्धि के अनुसार कमेंट भी भेजती रही | इस प्रकार मैं इस युगल के थोड़ी समीप आई |

मेरी प्रसन्नता की सीमा न थी जब सूद साहब ने मुझे वॉट्सैप पर लिखकर भेजा ,

" यह अयन का सौभाग्य है कि आपका उपन्यास 'गवाक्ष' यहाँ से प्रकाशित हो रहा है |' मैं चौंकी किन्तु एक चैतन्य प्रकाशक की छवि से मैं बहुत प्रसन्न व संतुष्ट हुई | उपन्यास के प्रकाशन के बीच में कई बार उनसे बातें होतीं और एक गुणी व सुंदर विचारवान बौद्धिक प्रकाशक से बात करके अच्छा लगता |

उसी समय मेरी दूसरी पुस्तक 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि 'भी लगभग तैयार थी ,हमारी महिला बहुभाषी महिला संस्था 'अस्मिता' के एक बड़े कार्यक्रम में इन दोनों पुस्तकों का विमोचन भी होना निश्चित हुआ परन्तु तब तक 'गवाक्ष' मेरे हाथ में नहीं थी |मैं थोड़ी चिंतातुर थी क्योंकि इस पुस्तक का विशेष रूप से इंतज़ार किया जा रहा था ,कुछ मायनों में वो ख़ास थी | दिल्ली में बरसात हो रही थी, पुस्तकें तैयार होने के बावज़ूद कवर-पेज़ नहीं हो पा रहे थे | मैंने सूद साहब से बात की , अपनी चिंता उनके सामने रखी और उन्होंने जैसे-तैसे करके विमोचन के ठीक एक दिन पहले पाँच-सात प्रतियाँ मुझे पहुँचा दी गो कि इसके लिए उन्हें काफ़ी मशक्क्त करनी पड़ी थी | और समय पर मेरी दोनों पुस्तकों का विमोचन हो सका | यह विमोचन मेरे लिए इसलिए भी विशेष रहा कि उसके तीन माह बाद ही मैंने अपने पति श्री ललित मोहन श्रीवाल को खो दिया जो उन दोनों पुस्तकों के बारे में बहुत उत्साहित थे | सूद साहब ने कई बार मेरी इस क्षति पर अपनी संवेदनाएँ प्रगट कीं,महसूस हुआ मानो मेरे भाई मुझे सांत्वना दे रहे हों |

माँ शारदे की अनुकंपा से 'गवाक्ष' ने निरंतर कई सम्मान प्राप्त किए जिसमें से प्रमुख 'प्रेमचंद नामित सम्मान' उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्य-मंत्री श्री आदित्यनाथ योगी जी के कर -कमलों से 2018 में वसंत पंचमी के दिन लखनऊ में प्राप्त हुआ | इस बात से सूद साहब बहुत प्रसन्न हुए थे और पता चलते ही उन्होंने मुझे फ़ोन किया |एक मेरी ही नहीं अयन प्रकाशन की और भी पुस्तकों को लखनऊ में सम्मान प्राप्त हुआ | मुझे अधिक तो स्मरण नहीं है किन्तु एक बाल-पुस्तक पर मथुरा के श्री दिनेश पाठक जी को भी अयन -प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किसी पुस्तक पर पुरूस्कार व सम्मान प्राप्त हुआ था | लखनऊ में उनसे भेंट होने पर मुझे पता चला और वहाँ पर अयन प्रकाशन व सूद जी के बारे में बात हुई |

मानसिक बदलाव के लिए मई 18 के अंत में मुझे बेटी,दामाद दिल्ली,हरिद्वार आदि ले गए थे और मैं वहाँ से विभिन्न शहरों में पुराने रिश्तों में ताज़गी भरने के लिए घूमती रही | बच्चे वापिस आ चुके थे किन्तु मैं वहाँ अपने मुहबोले भाई के यहाँ गाज़ियाबाद रुक गई | उत्तर-भारत में रहते हुए भी मेरा लेखन का थोड़ा-बहुत काम चलता रहा और फ़ोन पर सूद साहब से बात होती रही | मन तो पहले से ही था सूद युगल से मिलने का लेकिन दिल्ली की दूरी की परेशानी मुझे अकेले निकलने न देती और जिन भाई के घर पर मैं थी वो मेरा इतना अधिक ख़्याल रखते कि अकेले उनके घर से निकलना मेरे लिए संभव न था |

उन्हीं दिनों 'मनु' स्मृति सम्मान के कार्यक्रम के बारे में सूद साहब से बात हुई | उनके स्नेहपूर्ण आमंत्रण से मैं अभिभूत थी |सूद साहब ने मुझे आमंत्रित तो किया ,साथ ही मुझसे श्रीमती चंद्र प्रभा सूद जी के लेखों के बारे में अपने कुछ विचार प्रस्तुत करने का इसरार भी किया | कार्यक्रम में सम्मिलित होना चाहती थी ,सबसे मिलना चाहती थी किन्तु जिन भाई के घर पर मैं थी वो गाज़िया बाद थे | शाम का कार्यक्रम होने के कारण दिल्ली से गाज़ियाबाद लौटने में रात होनी ही थी | कुंवर बैचैन जी से चर्चा हुई,उन्हें इस कार्यक्रम से पूर्व किन्ही दो और कार्यक्रमों में जाना था अत: उनके साथ जाना संभव नहीं था | मैं निराश हो गई और अपने कुछ विचार कार्यक्रम में प्रस्तुत करने के लिए वॉट्सएप पर प्रेषित कर दिए | लेकिन मन में कहीं एक आस थी ,सबसे मिलने की ,कार्यक्रम में सम्मिलित होने की |

'जहाँ चाह,वहाँ राह' मेरा मन देखते हुए भाई ने मेरे साथ स्वयं चलने का कार्यक्रम बनाया और मैंने प्रसन्न होकर सूद साहब से बात की ,उन्हें सूचना दी और किसी न किसी प्रकार मैं कार्यक्रम में पहुँच ही गई | सच कहूँ तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं सूद साहब और श्रीमती सूद के साथ थी ,उनके सामने थी |मुझे मंच पर पूरे सम्मान के साथ बैठाया गया | मंच से श्रीमती सूद के लेखन के विषय में भी मुझे कुछ कहने का अवसर प्राप्त हुआ |

कार्यक्रम शालीन व गौरवपूर्ण था | कुछ देर के लिए सूद साहब मंच पर मेरे साथ बैठे थे ,पुत्र की स्मृति में उदास उनकी आँखें मुझसे बातें करते हुए भर आईं , स्वाभाविक भी था | मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देने का प्रयत्न किया तो किन्तु पिता का हृदय भीतर से असहज,मैं उनकी मन:स्थिति समझ पा रही थी | मैं पहली बार उनसे ,उनकी पत्नी चन्द्रप्रभा सूद से व बेटे से मिली थी | सरल,सहज सुंदर ,मुस्कुराते व्यक्तित्व के सूद साहब का आकर्षक व्यक्तित्व किसीको भी अपने सहज स्वभाव से अपना बना लेने में सक्षम था ,इसमें कोई संशय न था | कितने लोग बाहर से कार्यक्रम में शरीक़ होने आए थे जिसमें साहित्य से जुड़े काफ़ी नामचीन हस्ताक्षर डॉ.कुंवर बेचैन ,जगदीश बाजपेयी जी ,हरीश नवल जी के साथ ही लघु कथाओं को प्रश्रय देने वाले प्रकाशक श्री मधुदीप जी का भी सम्मान किया गया | यह बहुत सुंदर ,स्नेह सिंचित कार्यक्रम था जिसमें एक प्रकाशक दूसरे प्रकाशक का सम्मान कर रहा था | उनके प्रकाशनों में छपने वाली कवयित्रियाँ श्रीमती प्रगति गुप्ता ,ज्योत्स्ना एवं अन्य कई औरों से भी वहाँ परिचय हुआ | उन सबसे भूपी सूद जी के कारण मिलना हुआ |सब अयन परिवार के सदस्य ममता व स्नेह से भरपूर ! एक संवेदनशील अपनत्व से भर-भरे !

कार्यक्रम के अंत तक मैं वहाँ बनी रही और सूद साहब के स्नेहयुक्त व्यवहार से अभिभूत होती रही |जब उन्होंने झुककर मुझे नमन किया ,मैं एक बारगी विचलित हो उठी ,उन्होंने बड़े सम्मान व स्नेह कहा कि मैं उनसे बड़ी थी और आशीर्वाद उनका अधिकार था | मैं नहीं जानती मैं उनसे बड़ी थी,या छोटी अथवा उनकी हमउम्र किन्तु उस समय अवश्य मैंने स्वयं को उनकी बड़ी बहन महसूस कर लिया था | एक परिवार था जिसकी धुरी श्रीमति व श्री भूपी सूद थे जिनके चारों ओर सब प्रसन्नता भरे मुख थे जो स्नेह केवल स्नेह बाँट रहे थे |वहाँ की बहुत सी मीठी स्मृतियों की शीतल छाँह लेकर मैं वापिस अहमदाबाद आई |

गवाक्ष के प्रकाशन के बाद के पुस्तक मेले के दिनों में मुझे कई लोगों ने फ़ोन करके बताया कि यह पूछने पर कि उनके अनुसार कौनसी पुस्तक खरीदी जाए ? सूद साहब अपनी पसंद की पुस्तक 'गवाक्ष'उठाकर देते |मुझे और मेरे उपन्यास 'गवाक्ष' को सूद साहब का भरपूर स्नेह मिला ,यह कहूँ तो अतिश्योक्ति न होगी |

वॉट्सऐप पर भेजी हुई प्रतिदिन चिड़िया की तस्वीर के साथ 'गुडमॉर्निंग' पढ़ने की आदत पड़ गई थी | चन्द्रप्रभा जी के घुटनों का आपरेशन हो ,बैंगलोर बेटे के पास छुट्टियाँ बिताने जाना हो ,सब कुछ वे मित्रों से साँझा करते | चन्द्रप्रभा अपने विचारशील लेखन के माध्यम से पाठकों में छाई हुई हैं | उनके भी प्रतिदिन 'सुप्रभात' के मैसेज वॉट्सएप पर सुबह की साँकल खटखटाते | और एक दिन सुबह चन्द्रप्रभा का मैसेज तो था किन्तु सूद साहब का नहीं था | सूद साहब के बारे में एफ़ बी के माध्यम से यह अशुभ सूचना प्राप्त हुई | अस्मिता ग्रुप की कई मित्र अयन के साँझा संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं | ग्रुप में जैसे अचानक एक मायूसी छा गई | फिर तो एक-एक करके सभी ग्रुप्स में छटपटाहट पैदा होने लगी | चर्चा के लिए जैसे कुछ शेष न था | अविश्वसनीय ! सच का सामना बड़ा कठिन होता है किन्तु करना पड़ता है | मेरे पास श्रीमती चन्द्रप्रभा सूद को दिलासा देने के लिए कुछ शब्द ही नहीं हैं ,उनकी पीड़ा मैं महसूस करती हूँ , यह भी जानती हूँ कि वे एक साहसी स्त्री हैं ,समाज के लिए जीती हैं ,समाज में जागृति का संदेश देती हैं | ईश्वर से प्रार्थना है कि वे इस अपूर्णीय क्षति की पीड़ा से पीड़ित पूरे परिवार पर अपनी छत्रछाया बनाए रखें ,श्रीमती सूद को इतना बल दें कि वे पहले की भांति समाज का दिशा-निर्देश करती रहें | आमीन !

कभी शब्द कम पड़ जाते हैं,

अँगनाई के शोर में गुम होने लगती हैं

कुछ स्नेहपूर्ण आवाज़ें --किन्तु

सहन करना मनुष्य की नियति है

स्मृति की छाँह शीतलता बरसाती रहे

जितने दिन का भी हो जीवन

स्नेह-प्रेम लुटाती रहे -------बस,इतना कहूँगी

ज़िंदगी झौंका हवा का

प्यार का संगीत है ,

ज़िंदगी ख़ुशियों की महफ़िल

गए सकें तो गीत है | |

सूद साहब की स्मृति को नमन करते हुए

डॉ. प्रणव भारती