Stree - 12 in Hindi Novel Episodes by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-12)

स्त्री.... - (भाग-12)

स्त्री........(भाग-12)

साड़ी ठीक करके मैंने अपने आप को शीशे में निहारा.....और मन फिर अभिमान से भर गया.....क्या कमी है मुझ में !! तब तक पतिदेव कमरे में आ गए...मैंने उन्हें शीशे में ही देख लिया था, कभी मैंने उन्हें यूँ अपने साथ भले ही पीछे खडे़ थे, देखा नहीं था.......दिल में आया कि मुझसे दिखने में कमतर ही दिखते हैं....वो क्या कहते हैं हाँ याद आया मुझसे उन्नीस ही हैं फिर भी बस पुरूष होने का कितना अभिमान है....पता नहीॆ क्यों ये ख्याल मेरे मन में इस पल आया कि उन्हें अभिमान ही है शायद पढाई का या फिर पिता के जाने के बाद घर को चलाने का....या फिर शायद दोनों ही....कितनी देर अपने आप को और निहारोगी? फुर्सत हो तो खाना भी दे दो......उनकी आवाज सुन कर लड़की से पत्नी का चेहरा अपने आप ही लग गया....."जी अभी आयी"....कह कर झट से हाथ धो कर दोनो थाली लगा दी। "तुम खाना बहुत अच्छा बना लेती हो'', मेरे पति ने मुझे कहा तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ....मुझे लगा शायद सुजाता दीदी के सुझाव का असर है, तभी तो उन्होंने कहा वर्ना खाना बनाते हुए तो अरसा हो चला था मुझे.....उन्होंने 2-3 बार खाना खाते खाते नजरे उठा कर देखा भी,ये सब मेरे लिए तो नया ही था......पर आज उनकी आँखो में कुछ अलग सा दिख रहा था, जो मेरी समझ से बाहर था,पर उनके देखने भर से ही इतना खुश थी कि मैंने वो अलग सा भाव नजरअदाँज कर दिया। खाना खा कर वो नीचे माँ को देखने चले गए, उनको सोता देख कर वो वापिस कमरे में आ कर अपने बैग से कुछ कागज में लिपटा चूर्ण जैसा खा कर पानी पी लिया। आप ये "क्या खा रहे हो", मैंने धीरे से पूछा तो बोले, "कुछ नहीं बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं लग रही थी, तो आयुर्वेदिक दवा ले कर आया था, किसी ने बताया कि जल्दी फायदा करेगी तो ले आया...अब सुबह माँ को मत कहने लगना नहीं तो वो परेशान हो जाँएगी, समझी" !!! "हाँ समझ गयी मैं किसी को नहीं कहूँगी".......। वो पलंग पर लेट गए और मैं कुछ देर तो यूँ ही खड़ी रही फिर मैं भी लेट गयी.....पर आज वो मुँह फेर कर नहीं सोए थे.....मुझे ही देख रहे थे। उस दिन उन्होंने मेरा पहली बार खुद हाथ पकड़ा तो मैं शरमा गयी....दिल की धड़कने बहुत तेज हो गयी थी, जब उन्होंने कहा कि," तुम बहुत सुंदर हो जानकी", मैं अपने गालों की गर्मी को महसूस कर रही थी....न जाने कितने दिनों से मैं इस पल का इंतजार कर रही थी.....दूसरे ही पल उनकी हाथ की पकड़ काफी सख्त महसूस की मैंने.....सुजाता दीदी की बातें भी सब याद आ रही थी और शोभा की कितनी ही बातें याद आने लगी थी.....एक मीठा सा एहसास मुझे गुदगुदा ही रहा था। अचानक उन्होंने जैसे मुझ पर हमला बोल दिया हो....गुदगुदाने वाला एहसास छूमंतर हो गया और मैं इस अचानक हमले से अपने आप को संभालने की कोशिश ही कर रही थी कि उनकी आवाज मेरे कानों में पड़ी, बहुत जल्दी है न तुझे हर काम करने की....देख रहा हूँ जब से मायके से आयी हो, कुछ ज्यादा ही मरी जा रही हो पति पत्नि वाले रिश्ते को जीने के लिए.......कह कर उन्होंने अपना पूरा वजन मुझ पर डाल दिया......कुछ देर वो कुछ तो करते रहे, पर मेरी समझ में बस कुछ अजीब सा दर्द महसूस हो रहा था.....पर ये प्यार तो नहीं था.....न ही मैंने उनमें कुछ जोश ही महसूस किया....जल्दी ही वो मेरे ऊपर से हट कर चुपचाप लेट गए.....ये तो वो कुछ भी नहीं था न सुजाता दीदी वाला प्यार था न ही शोभा वाला........जितना मुझे उन दोनों से समझ आया वो इन सबसे अलग था.....पूरी रात यही सोचने में ही बीत गया कि क्या मुझे इसी का इंतजार था? क्या सब ऐसे ही करते होंगे पर शोभा तो बहुत खुश थी, फिर मैं खुश क्यों नहीं हूँ? मुझे क्यों नहीं वैसा लगा जैसा तब लगा था जब गुरूजी ने छुआ था? सवाल बहुत थे, पर पति का प्यार पीने का उत्साह ठंडा हो गया था.......मेरी दिनचर्या एक ढर्रे पर चल ही रही थी...बस जब खाली होती खुद ही पढने बैठ जाती.....जो मुश्किल लगता वो डिक्शनरी में ढूँढती या सुजाता दीदी से पूछती.......सुजाता दीदी वाकई एक अच्छी टीचर हैं, उन्होंने मुझे Tenses, verbs, nouns, pronouns और Adjectives बहुत अच्छे से समझाए।
हिंदी से इंग्लिश में बदलना सब सीखा रही थी....साथ ही साथ बोलने की प्रैक्टिस करवाती रहती हैं....बाकी जो रह जाता वो सुनील भैया और सुमन दीदी भी मदद करते रहते.....एक दिन मैंने अपने पति को कहा....Tomorrow is holiday so we all can go for movie? वो मेरी शक्ल देखने लगे। 3 महीने हो गए हैं, सीखना कभी खत्म तो नहीं होता पर मुझे लगता है कि अब आप मैरी वजह से शर्मिंदा नहीं होंगे......। माँ तो अब काफी ठीक हो चुकी थीं इसलिए मैंने सबके साथ का कार्यक्रम बनाया था।
इन दिनों में मेरे पति मेरे पास हफ्ते में 2-3दिन आते और नोच खसोट कर 10-15 मिनट में शांत हो कर सो जाते.....मैं देखती थी कि वो हमेशा वो दवा खाते थे। समझ नहीं आ रहा था कि अगर ठीक नहीं हो रहे तो किसी और डॉ. को क्यों नहीं दिखा लेते?? एक दो बार कहा भी तो उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि मेरै लिए क्या सही है, फिर मैंने कभी नहीं टोका। मैंने इन दिनों कुछ किताबें भी पढी थी जिनमें फेमिना, सरिता और गृहशोभा जैसी। जिनमें व्यक्तिगत समस्याओं की एक कॉलम आता था जिनमें औरते अपनी परेशानियाँ लिखती थी और उनके जवाब माँगती थी, ऐसा लगता कि हर समस्या मेरी ही है.....बहुत सारी जानकियाँ भरी हुई हैं, सोच कर अपने ऊपर हँस देती......सुजाता दीदी ने एक दिन कहा था कि पति को अपनी कमी सुनना पसंद नहीं होता, बस यही सोच कर मैंने अपने पति से कभी कुछ नही कहा। मैं एक ही रात में या कहूँ कुछ मिनटों में ही समझदार हो गयी थी..। काफी कुछ था जो मैंने धीरे धीरे समझा, जो मेरी सोच से बिल्कुल अलग था..। औरतों की इच्छा की कोई कीमत नहीं, मैं ये समझ गयी थी....खैर अगले दिन हमने बाहर खाना खाया और फिल्म भी देखी,पर हम दोनो ही गए थे....मेरी सास ने ही कहा कि तुम दोनो घूम कर आओ और बाहर ही खाना खा कर आना...। मैं अंदर ही अंदर घुट रही थी, सुजाता दीदी छुट्टियों में अपने मायके चली गयी थीं तो और अकेलापन लगने लगा था....सुमन दीदी भी पढाई में बिजी रहने लगी थी और सुनील भैया अपनी नौकरी से लेट आने लगे थे.....ऐसा लगता था कि सिर्फ माँ और मैं ही खाली थे.....पर एक बदलाव ने दस्तक दी थी मेरी जिंदगी में..
एक दिन पास के बाजार से सब्जियाँ और फल लेने गयी तो वहाँ एक दुकान की दीवार पर कुछ पर्चे लगे हुए देखे तो रंग बिरंगे पर्चे देख मैं पढने लगी, उसमें लिखा था कि वेस्टर्न डॉस सिखाने की एकाडमी खुली है सड़क पार करके सामने बने फ्लैट्स में......मैंने दुकान वाले से पेन और पेपर माँगा तो उसने वैसा ही परचा मेरे हाथ में दे कर बोला एक साहब रख कर गए हैं ये पेंपलेटस आपको चाहिए तो आप ये ले जाओ.... मैंने वो पेपर अपने पर्स में रख लिया......मुंबई े तौर तरीके सीख रही थी, यहाँ गाँव जैसी पाबंदियां नही थी, न ही रात को औरतों के बाहर जाने की मनाही थी। वैसे तो मेरी सास भी मुझ पर कोई रोक टोक नहीं लगाती थी....घर आ कर अपनी सास से डांस सीखने की बात पूछी तो वो बोलीं कि अब ये विदेशी नाच सीख कर क्या करेगी जानकी, अब शादी को भी 2 बरस हो गए हैं ,तुम दोनों मुझे पोता पोती दिखाने का सोचो, मैं सास की बात सुन कर शरमा गयी, फिर न जाने क्या सोच कर वो बोली जा कर कल पता कर ले और सीख ले जो सीखना है, पर पहले सुधीर से भी पूछना है, उसकी ना तो ना। मेरे लिए इतना ही काफी था कि कम से कम मेरी सास को मेरी इच्छा का मान तो है, मेरी माँ को कितना गुस्सा आया था जब मैंने नृत्यशाला में जाने को पूछा था.....सोच कर एक बार फिर मुझे अपनी सास पर बहुत प्यार आ गया और उनकी इज्जत मेरे दिल में और बढ़ गयी थी........मेरी सास शोभा की सास से अलग थी, ये सोच मुझे बहुत खुशी होती थी। सुमन दीदी और सुनील भैया भी तो कितने अच्छे हैं, सोच कर छाया और राजन की याद आ गयी....कुछ रोज पहले चिट्ठी आयी थी छाया की सब ठीक हैं और शोभा की बेटी हुई है, लिखा था...। सुमन दीदी और सुनील भैया के सामने फिर मेरी सास ने रात को खाना खाते हुए डांस की बात छेड़ दी......तो दोनो ने बहुत खुश हो कर का हाँ भाभी जरूर सीखो, वैसे भी बोर हो जाती होंगी सारा दिन घर पर.......अब बारी पति से इजाजत लेने की थी.... तो उन्होंने भी मना नहीं किया। कई दिनों बाद वो मुझसे बोले कुछ और नहीं जानना तुमने?? अब तो जान गयी ना कि पति पत्नी क्या करते हैं? जी बिल्कुल ठीक कहा आपने अब जान गयी हूँ, जो समझ नहीं आया था, वो भी समझने लगी हूँ। मेरे ऐसे जवाब पर उन्होंने मुझे घूरा ,पर अब ऐसे उनके देखने का डर भी खत्म हो गया था... सो मैं अपने काम मैं लग गयी। अब ना उनके छूने का इंतजार था ना मुझमें कोई उत्सुकता थी.....क्या कहूँ और कैसे शब्दों का मैं इस्तेमाल करूँ, जिससे मैं अपनी बातों को समाज की बनायी शालीनता की हद में कह दूँ। मुझे ये कहने में शरम नहीं ना ही कोई गुरेज कि शायद मेरे पति की शारीरिक भूख या प्यास जो भी है वो उनके 5-10 मिनट के उन्माद मे पूरी हो जाती होगी या ये कहा जाए कि इससे ज्यादा देर तक रूकना या मुझे देखना उनके लिए जरूरी नहीं था या वो देख पाते ही न थे......पर मैं उसके बाद भी प्यासी ही थी, शारीरिक भूख और जरूरत का तो स्त्री को भी अहसास होता ही है पर न जाने क्यों पुरूष इसे सिर्फ अपने तक ही सोच पाता है, क्यों होते हैं पुरूष इतने संकुचित विचारों के चाहे फिर मेरा लिखा पढा पति ही क्यों न हो?? मुझे ऐसा लगता है कभी कभी कि इससे अच्छा मैं छूने की उत्सुकता में ही रहती तो अच्छा होता!! कुछ कमजोर पलों ने मेरे अंदर के एहसासों को पूरा तो किया नहीं बल्कि और बढावा दे दिया है।
वो रात फिर मैं अपने पति की आधी अधूरी शिकार बन गयी और मेरी आँखे बंद बिना किसी भाव को महसूस किए थी।
स्वरचित
क्रमश;
सीमा बी.

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