Stree - 18 in Hindi Novel Episodes by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-18)

स्त्री.... - (भाग-18)

स्त्री......(भाग--18)

माँ की तबियत उस दिन के बाद ठीक ही नहीं हुई.....डॉक्टर्स को दिखाया वो दवा देते और कहते आप इन्हें खुश रखिए...सुमन दीदी और सुनील भैया अपने बच्चों के साथ मिलने आते पर कुछ भी काम नहीं कर रहा था दोनो बहन भाई अपने बड़े भाई साहब को भी माँ की तबियत का कहते तो वो फिक्र तो जताते पर कहते कि नया काम है, छुट्टी मिलते ही आता हूँ........माँ को फोन मिला कर भी दिया कि बात करो पर माँ ने मना कर दिया। माँ की हालत देखी नहीं जा रही थी...बस चुपचाप लेटी रहती। कमजोर होती चली जा रहीं थी। अपनी तरफ से हम सब कोशिशे कर के हार गए थे। मैंने ही हिम्मत करके उन्हें कहा कि माँ से मिलने आ जाओ, शायद वो आपकी चिंता में हैं.....तुम उनको अच्छे से अच्छे डॉ को दिखाओ पैसे मैं और भेज देता हूँ और माँ से कहो कि मैं जल्द से जल्द उनको मिलने आऊँगा......का जवाब मुझे मिल गया और मैंने फोन रख दिया। कुछ दिन और बीत गए कि माँ को कैसे ठीक किया जाए, ये वो वक्त था, जब मोबाइल फोन आ गए थे.....उस टाइम काफी मंहगा पड़ता था, आने जाने की कॉल पर पैसे लगते थे.....मैंने भी अपने काम के लिए एक मोबाइल खरीद लिया, जिससे मेरे क्लॉइंटस मुझसे बात कर सके। अपना काम देखना और माँ को देखना थोड़ा परेशानी भरा तो था, पर मैं दोनो को ही छोड़ने के हक में नहीं थी।
इसलिए दिन में एक बार जा कर काम देख लेती थी, मेरे साथ ये अच्छा था कि साथ काम करने वाले मेरी परेशानी को समझ पूरा साथ दे रहे थे.....हाँ पर कुछ दिन के लिए और काम नहीं ले रही थी।
मैं माँ को एक दिन टैक्सी करके हमारे पुराने घर में ले गयी.....अपना पुराना एरिया देख माँ की आँखो में चमक आ गयी....सुजाता दीदी अपने पति और दो बेटों के साथ अभी भी वहीं रह रही थी।
स्कूल की नौकरी उन्होंने छोड़ दी थी।
माँ और मुझे देख व बहुत खुश हो गयीं।
मैं हम दोनो का खाना साथ ले कर चली थी......पर उन्होंने हमें वो खाना नहीं खाने दिया। माँ बहुत दिनों को बाद कुछ खुश थी और उनके बेटों के साथ खेल रही थी......मैंने सुजाता दीदी को बता भी दिया कि अगर जरूरत पड़ी तो आपको ये घर खाली करना पड़ सकता है, क्योंकि माँ यहाँ वापिस आना चाहती हैं तो उन्होंने कहा ठीक है, पर कुछ पहले बताना, हमैं और घर ढूढँना पडेगा.....हमारी बातें सुन रही थी माँ, ये मैंने ध्यान नहीं दिया था।
नहीं जानकी मकान खाली मत करा, ये बच्चे परेशान होंगे, तूने मुझे मेरा घर दिखा दिया यही बहुत है.....उस दिन हम शाम को घर वापिस आए तो माँ ने अच्छे से खाना खाया। सुजाता दीदी ने माँ से वादा लिया था कि वो कभी भी नीचे वाले कमरे में रहने आ सकती हैं, बस एक दिन पहले बता देना। रात को सोने लगीं तो मैं दवा दे कर उनके पैर दबाने लगी हमेशा की तरह....पर उस दिन माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया और खुद भी उठ कर बैठ गयीं। उनकी आँखो में आँसू देख मैंने पूछा ,माँ अभी तो खुश थी, अब रोने क्यों लगी?
"जानकी तू मेरी बहु नहीं बेटी है, मेरे मन की बात मेरे पेट से पैदा किए हुए बच्चे नहीं समझ पाते, पर तू समझ जाती है,मेरी किस्मत बहुत अच्छी है जो मेरी बहु बन कर आयी, पर मेरा बेटा नालायक निकला जो हीरे जैसी बहु को छोड़ वहाँ बैठा है"। "माँ वो काम में बिजी हैं, नहीं तो आ जाते, वो कह रहे थे कि जैसे ही छुट्टी मिलती है मैं तुरंत आ जाऊँगा".....माँ की बात सुन कर मैं उनका दिल रखने के लिए और भी बहुत कुछ कहती रही और मेरा चेहरा देखती रही, उनको अपनी तरफ ऐसे देखते हुए पूछा," क्या हुआ माँ"?
"जानकी मैं तेरे पति की माँ हूँ, वो मेरी बात बेशक ना समझे पर मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानती हूँ, मुझे पता है वो तुझसे भाग रहा है, मेरे बार बार डॉ के पास चेकअप के लिए पूछने से भाग रहा है। बचपन में भी जब कोई बात सच सच नहीं बता सकता था, तो सामने आने से कतराता था। कमी तुझ में नहीं उसमें है और ये बात उसको पता है और तुझे भी पता ही होगा, ये उसके न आने से मैं समझ गयी हूँ....पर मेरा इतना भला बुरा कहने पर भी मुझे तूने पलट कर नहीं कहा.....ये गम मुझे अंदर से खाया जा रहा था, पाप का बोझ रखा था मेरे दिल पर आज तेरे सामने मान कर मुझे अच्छा लग रहा है, हो सके तो मुझे माफ कर देना और मेरे बेटे से अलग हो कर तुम अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करो"!"माँ आप ये सब क्यों कह रही हैं....मुझे कहीं नही जाना, बस आपके साथ रहना हैऔर आप ये सब सोचना छोड़ कर सोने की कोशिश करो"। "तू ठीक कहती है जानकी अब मैं आराम से सो सकती हूँ.....सुधीर की गलती किसी पाप से कम नहीं है, कमी को सुधारने के तो कई रास्ते थे पर उस कायर को भागना आसान लगा....पर फिर भी उसको माफ करने के लिए कह रही हूँ, माँ जो हूँ"। "माँ, मैंने तो कब का माफ कर दिया अब बिना सोचे सोने की कोशिश करो"!....उस रात मैं न जाने क्यों अपने कमरे मैं न जा कर वहीं सो गयी। हम दोनों ही शायद बहुत दिनों बाद गहरी नींद सोए थे......सुबह उठ कर माँ बहुत दिनों के बाद नहा कर पूजा करने बैठ गयीं......मां नाश्ते और लंच के लिए सब्जी बनाने लगी। माँ की पूजा खत्म हुई तो मैं हमारी चाय ले कर उनके पास बैठ गयी। माँ चाय पी हमेशा की तरह कुछ देर बॉलकनी में बैठ गयी और मैं अपने बाकी के काम में लग गयी। माँ का ध्यान रखने के लिए एक बाई और आती थी जो माँ की हर चीज का ध्यान रखती थी, वो भी आ गयी। मैंने उसे माँ का नाश्ता और दवा दे कर उसे माँ को खिलाने को कह मैं अपना सब साथ ले जाने वाला सामान समेटने लगी। अभी मुश्किल से मैं अपनै कमरे तक गयी थी, जो शायद 5-7 कदम पर ही था की बाई की तेज आवाज आयी। मैं वापिस क्या हुआ बोलती हुई बॉल्कनी में चली गयी......देखा तो माँ की आँखे खुली थी, जैसे एकटक कुछ देख रही हों, शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही थी। मुझे लगा बेहोश तो नहीं हो गयी, इसके लिए मैंने उनके मुँह पर पानी के छींटे मारे पर माँ तो शाँत थी। उन्हें ऐसै देख कर मेरे हाथ पैर ठंड़े पड़ गए थे।
बाई को जल्दी से नीचे भेज कर डॉ. को बुलाने को भेजा। सबसे पहली मंजिल पर एक डॉ फैमिली आयी थी.....बाई के आने तक सुमन दीदी और सुनील भैया को भी फोन कर दिया। डॉ. साहब तुरंत आ गए, पर माँ तो अपनी सब तकलीफों को साथ ले कर अपनी जीवन की एक यात्रा पूरी कर दूसरी पर चल दी थी।
मैंने अपने पति को भी फोन किया कि अब आप को आना होगा, माँ चली गयी आपका इंतजार करते हुए.....वो घबरा कर बोले ऐसे कैसे माँ जा सकती है!मैंने कहा था कि उनका इलाज अच्छे से करवाओ! मैंने उनकी बीच में काटते हुए कहा," अब जो हुआ सो हुआ, आप कितनी देर में आ सकते हैं? मुझे कम से कम 4-5 घंटे लगेंगे.....ठीक है आप आओ....अंतिम संस्कार आप को ही करना होगा कम से कम 15-17 दिन का बोल कर आएँ कह मैंने फोन रख दिया। दोनो बाइयों का साथ मिल कर कमरा खाली किया। माँ को लिटाया जो मैं जानती थी और जो बाइयों को पता था करते जा रही थी। माँ की हर बात याद आ रही थी, वो मुझसे अपने दिल की हर बात करके बिना किसी बोझ के चली गयी पर अपने बेटे से मिलने की इच्छा उनके बेटे ने नहीं पूरी की, पर क्या कर सकते थे!! मैं रोना चाहती थी पर नहीं रो सकती थी क्योंकि मुझे सब देखना था। अपनी वर्कशॉप पर भी फोन करके एक सप्ताह के लिए छुट्टी के लिए बोल दिया। सुनील भैया, कामिनी और सुमन दीदी और जीजाजी भी बच्चों के साथ पहुंच गए।सुमन दीदी को देख मैं अपने आप को रोक न सकी और बहुत रोई....आँसु रुकने के नाम ही नहीं ले रहे थे। हमारे रोने से बच्चे भी रोने लगे तो हमें अपने आँसू रोकने पड़े। ऐसे समय मोबाइल का होना भी किसी वरदान से कम नहीं था। मेरे पति का फोन आया, पता चला कि वो एयरपोर्ट पहुँच गए हैं, पर अभी फ्लाइट में 3-4 घंटे का टाइम है, तब इतनी सारी फ्लाइटस नही हुआ करती थीं......अब तो काफी आसान हो गया है, एक शहर से दूसरे शहर जाना। इस तरह से उनका देर शाम से पहले आना मुश्किल लग रहा था। माँ के एक भाई ही थे, मायके से वो भी आ गए.....काफी दैर तक विचार विमर्श चलता रहा , मेरी देवरानी के पिताजी और सुमन दीदी के सास ससुर भी आ गए थे......ये हमारा गाँव नहीं था!
ये मुंबई शहर जो बस दौड़ता भागता रहता है,बम के धमाके और बारिशों का पानी भी ज्यादा देर तक इसको रोक नहीं पाता फिर हमारे रिश्तेदार भी तो इसी शहर का हिस्सा हैं....ज्यादा प्रैक्टिकल।
भावनाएँ कम ही काम करती हैं....सबने मिल कर तय किया कि माँ को ज्यादा देर नहीं रख सकते तो सुनील भैया ही अंतिम संस्कार करेंगे। मैं कहना चाहती थी कि उनके बड़े बेटे का इंतजार करना चाहिए पर नहीं कह पायी क्योंकि सूर्यास्त हो गया तो फिर कल ही अंतिम संस्कार हो पाएगा.....पूरा दिन और पूरी रात का समय छोटे बच्चों के साथ बिताना मुश्किल था। सुनील भैया ने मामा जी को मेरे पति का नं मिला कर उनसे पूछने को कहा......मामाजी ने उन्हें समझा दिया था और माँ का अंतिम संस्कार सुनील भैया के हाथों से पूरा हुआ। जो हमारी किस्मत में लिखा है, वही होता है।
क्रमश:
स्वरचित
सीमा बी.

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