Stree - 20 in Hindi Novel Episodes by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-20)

स्त्री.... - (भाग-20)

स्त्री.......(भाग-20)

मेरे पति वापिस चले गए और मैं बिल्कुल अकेली रह गयी...। सुनील भैया और सुमन दीदी फोन करके हालचाल लेते रहते थे, बाकी अपने अपने काम और घर में बिजी हो गए और मैंने भी अपने आप को काम में बिजी कर लिया। काम बढ़ाने के लिए मुझे अपनी वर्कशॉप के लिए जगह भी बड़ी चाहिए थी, बस उसी की तलाश शुरू कर दी थी। अभी जिस घर मैं रह रही थी वो भी तो पति को उनके मालिक ने रहने को दिया था और अहमदाबाद में वो किराए पर रह रहे थे, पर अब तो वो भी खाली करना पड़ेगा। मैंने जल्दी ही एक जगह ढूँढ ली थी जहाँ मेरे दोनो काम हो सकते थे और इसमें मेरी मदद एक पुराने क्लाइंट ने की......
उऩकी ही एक प्रॉपर्टी खाली थी पहली मंजिल पर एक हॉल था और दूसरी मंजिल पर दो रूम का सैट जो मेरे लिए काफी था। मैंने पहले अपनी वर्कशॉप शिफ्ट कर ली एक महीने के अंदर ही मेरी इतनी बड़ी टेंशन खत्म हो गयी। मेरे पति को गए तकरीबन 2 महीने होने को थे, उनकी अपने बहन भाई से बात होती रहती थी, पर मुझे उनका कभी फोन नहीं आया न मैेंने किया। हम दोनो के पास एक दूसरे से बात करने के लिए के लिए वजह भी न थी। पहले तो माँ थी तो उनके लिए सब करना पड़ता था, वो भी अब नहीं थी। शामको काम खत्म कर घर जाती तो खाली घर मुझे बेचैन कर जाता। हर कोने में पसरा सन्नाटा मुझे डरा रहा था। फिर खुद को ही हौंसला देती कि जानकी अभी तो जिंदगी की असली लड़ाई और संघर्ष अब शुरू होगा, घबराने और यूँ डरने से काम नहीं चलेगा। खालीपन को दूर करने के लिए मैं घर मैं घुसते ही टी वी चला देती, जिसकी आवाजे किसी के होने का एहसास कराती। कई बार ऐसा हुआ कि टीवी चलता रहता और मैं सो जाती। सुबह ही रात के लिए सब्जी और रोटी बना कर जाती क्योंकि कई बार मन ही नहीं करता था खाना बनाने का, सो सुबह का खाना कभी गरम करके तो कभी ठंडा ही खा लेती। कितना फर्क पड़ता है एक इंसान के होने या न होने से!! माँ होती थी तो सुबह शाम को अलग गर्मागर्म बना कर दोनों खा लेती थी....माँ के न होने से मैं लापरवाह हो गयी थी,पर करती भी तो क्या करती........शायद हम औरतें अपने लिए कुछ करना ही नहीं चाहती न गरम खाने की चाह न ही रोज नया कुछ पका कर खाने का मोह........पर अगर घर में कोई और भी हो तो कितना कुछ काम करने को तैयार रहती हैं, थकान होने पर भी काम करने की वजह होती है। एक दिन सुबह सुबह सुनील भैया का फोन आया," वो शाम को 5 बजे घर आएगा तो आप भी तब तक अपनी वर्कशॉप से आ जाना, सुमन और मामाजी भी आएँगे"....सुनील भैया से बात करने के बाद मैं काम देख कर और बाकी सब समझा कर घर 3 बजे ही आ गयी और चाय नाश्ते की तैयारी के लिए कुछ सामान भी लेती आयी। मन में बस यही चल रहा था कि क्या हुआ होगा? फिर सोचा कि शायद मकान बेचने की बात पक्की हो गयी होगी ? कभी किसी का इंतजार हो तो टाइम भी मुश्किल से बीतता है। सबसे पहले सुनील भैया आए और कुछ देर बाद सुमन दीदी और सबसे बाद में मामा जी आए और उनके साथ एक और आदमी थे, जिन्हें मैं नहीं पहचानती थी। मामा जी ने बताया कि ये उनके और उनकी दीदी यानि मेरी सास के वकील हैं। हम सब हैरान थे कि सुनील भैया के होते हुए माँ का वकील कोई और क्यों था!! मैंने सबसे पहलेे सबके लिए चाय बनायी.....चाय पीते हुए वकील साहब ने बताया कि हमारे मामा जी ने 2 दिन पहले ही बातों ही बातों में बताया कि आपकी माँ अब नहीं रहीं और आपके मामा जी को भी उनकी वसीयत के बारे में नहीं पता था, सो मैंने बताया तो ये मुझे यहाँ ले आए हैं...आपकी माताजी की वसीयत के मुताबिक आपके घर को बेच कर जो पैसा मिलेगा वो तीन हिस्सों में बाँटा जाएगा.....एक हिस्सा सुनील जी के बच्चो का, एक हिस्सा सुमन जी के बच्चो का और एक हिस्सा उनकी बड़ी बहु जानकी के नाम का.......उन्होंने लिखा है अगर उनके दोनों बेटों में से कोई तलाक लेता है तो धनराशि बहुओं को ही दी जाएगी। इतना ही न हीं उनके बैंक एकाउंट में जितना पैसा है वो जानकी का है क्योंकि जानकी ने जब से काम करना शुरू किया है वो जानकी के अपने पैसे खर्च करने की वजह से बचे हुए हैं। दो FD उनके दोनों बेटो के नाम हैं, जिनकी वैल्यू 2-2 लाख है जिनका समय पूरा होने में 2-3 महीने बचे हैं। मैं तो हैरान थी कि माँ ने ये सब कब किया ? हमेशा तो मैं थी उनके पास!! मैं पूछती इससे पहले सुनील भैया ने पूछ ही लिया, सर माँ ने ये वसीयत कब लिखी थी? ये वसीयत उन्होंने 4 साल पहले की थी। आप अपने बड़े भाई को भी बुला लीजिए
आगे की कार्यवाही पूरी हो जाएगी, आप तीनों के साइन चाहिए जिससे वसीयत को आप चैंलेज न कर सकें। दोनों बहन भाई ने साइन उसी टाइम कर दिए। वकील साहब और मामा जी चले गए। सुनील भैया ने उसी टाइम अपने भाई साहब को फोन करके सब बताया और 1-2दिन की छुट्टी ले कर आने को कहा। सुनील भैया ने बताया कि घर की डील भी फाइनल करनी है, सब काम हो जाएगा आपके आने से। सुनील भैया के जाने के बाद सुमन दीदी रह गयीं, मुझे लगा कि उन्हें मुझसे जरूर शिकायत होगी क्योंकि अपने भाई की लाडली रही हैं,तो उनके नाम न करके माँ ने मुझे ये हिस्सा दिया है, पर ऐसा कुछ दीदी ने नहीं कहा। कुछ देर चुपचाप बैठी रहीं, फिर बोलीं भाभी देखा माँ कितनी सुलझी हुई औरत थी, वो मुझे हँसते हुए कहती थी कि मैं वो माँ नहीं हूँ जो सब कुछ बेटों को दे कर मरूँगी, मैं तुझे भी बराबर हिस्सा दूँगी और माँ ने वही किया। दीदी सही तो कह रही थी,उस समय कहाँ बेटियों को भी हिस्सा देने का चलन था!! माँ काफी सोच समझ कर खर्च करती थीं, ये पता था। फिर भी हमें किसी चीज के लिए रोका टोका नहीं दीदी....माँ ने ये पैसे कैसे बचाए होंगे !! मैंने दीदी से पूछा।भाभी आपको हम में से किसी ने नहीं बताया कि हमारे पापा की डेथ एक एक्सीडेंट में हुई थी तो जिस ट्रक ने उन्हें कुचला था, वो उसी समय पकड़ा गया था। हमारे छोटे थे और केस लड़ने के पैसे भी नहीं थे तो जो असली मालिक था उसने मामा को कह कर माँ को हमारे फ्यूचर के लिए 10 लाख ले कर केस ना लड़ने को मना लिया था, माँ प्रैक्टिल थी हमेशा से, तो मां समझती थी की पापा वापिस नहीं आ सकते, पर हम को तो पालना ही है, सो वो मान गयी। उन पैसों को भी माँ ने बचा कर रखा और मामा की हेल्प से कुछ ब्याज पर दिए कुछ हमारी शादियों पर भी खर्च किए होंगे। माँ ने बहुत मेहनत की और हर छोटे बड़े काम किए और घर उसी कमाई से चलाया, बताते हुए दीदी का गला भर आया और मैं भी अपने आँसू रोक नहीं पायी। हम कुछ देर चुप बैठे रहे, भाभी माँ ने ऐसा क्यों लिखा कि उनके बेटे तलाक लें तो पैसा बहुओं को मिलेगा?? कुछ पता है आपको? शायद माँ को लगा हो कि कामिनी भाभी और सुनील भैया में ज्यादा दिन न बने? पर वो तो पहले ही खूब पैसे वाली अपने पिता की इकलौती वारिस है!! दीदी ने अपने सवाल का जवाब खुद ही देते हुए कहा!! दीदी तलाक तो आपके बड़े भाई साहब भी ले सकते हैं न?? क्या कह रही हो भाभी, ऐसा आप मजाक में भी न कहना??? दीदी, माँ के समय जब आपके भाई आए थे तो मुझे बोल कर गए थे कि वो मुझसे तलाक लेना चाहते हैं। सुमन दीदी को मेरी बात सुन कर हैरानी तो होनी ही थी....पर क्यों भाभी? क्या कमी है आप में? इतनी अच्छी बीवी किसी को मिल सकती है क्या जितनी अच्छी आप हो?? अब मैं कशमकश में थी कि दीदी को पूरी बात कहूँ या नहीं? वो मुझ पर यकीन करेंगी या नहीं? मैं तो बाहर वाली हूँ पर ये सगे बहन भाई हैं क्या पता सच जानने के बाद ये लोग अपने भाई से नजरे फेर लें, पता नहीं क्यों दिमाग तो कहना चाहता था कि सब कह दूँ, पर माँ का दर्द सामने आ गया तो बस इतना ही कह पाई, दीदी वजह तो वही बता पाँएगे, मुझे तो पता नहीं। सुमन दीदी ने कहा,
भाभी, अभी भाई साहब को फोन करके पूछती हूँ, कि ये उन्होंने कैसे सोच भी लिया। दीदी अभी आप रहने दो, वो कुछ दिन में आएँगे तब पूछ लेना। कुछ सोच वो उठ गयीं, ठीक है भाभी आमने सामने ही पूछ लूँगी, अब मैं चलती हूँ, बच्चे दादी को परेशान कर रहे होंगे.......दीदी भी चली गयीं और मैं फिर अकेले थी। माँ ने अपने गहनों के बारे में पहले ही मुझे कई बार बताया था कि उनके जाने के बाद किसको क्या देना है, अचानक दिमाग में गहनों की बात आयी तो मैं माँ की अलमारी खोल कर बैठ गयी। माँ के पास गहनों के नाम पर दो जोड़ी कान के और चार कंगन थे, जो तीनों भाई बहनो ने मिल कर बनवा कर दिए थे, जो माँ ने बस एक दो बार ही पहने थे, एक गले की चेन और दो अँगूठियाँ जो बहुत पुरानी थी। ये सब एक दिन कामिनी और दीदी को बुला कर दे दूँगी.....सोच कर दोबारा वहीं रख दिए जहाँ से उठाए थे।
क्रमश:
स्वरचित
सीमा बी.

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