Stree - 24 in Hindi Fiction Stories by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-24)

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स्त्री.... - (भाग-24)

स्त्री......(भाग-24)

जब मेरी जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा होता है तो अक्सर मुझे डर लगने लगा है कि अब कुछ गलत होने वाला है।
डर लगना तो वाजिब ही है.....अपने अनुभव की वजह से डरती हूँ। कुछ भी मुझे सरलता से कभी मिला भी तो नहीं। कभी कभी लगता है कि मेरा नाम जानकी गलत रखा गया है, मेरा नाम तो संघर्ष या फिर मेहनत या मुसीबत होना चाहिए था....काश जिंदगी को जीना आसान होता!! पर शायद फिर सब कुछ अच्छा ही रहता तो भी नीरसता आ जाती। इंसान कमजोर हो जाता है, जब सब कुछ अच्छा ही अच्छा होता रहता है। संघर्ष ही तो हमें मजबूती देता है और जीने का तरीका भी सिखा जाता है।अपने जीवन का हर दिन तो लिखना सबके लिए बहुत मुश्किल होता है, मैं भी अपनी जिंदगी के कुछ महत्वपूर्ण फैसले या बातों ही कागज पर उतार लेती हूँ। मैं अपने काम से खुश थी और संतुष्ट भी। मुकेश की मदद से मैंने अपना ईमेल आई डी बनाया क्योंकि लोग अक्सर पूछने लगे थे, तो वो काम भी सीख लिया। बेशक मैंने सिर्फ 9वीं तक की थी, पर इंग्लिश की प्रैक्टिस मैंने कभी नहीं छोड़ी क्योंकि इसी भाषा की वजह से ही तो मुझमें हीन भावना आ गयी थी और उसी को दूर करने में मैं कुछ हद तक कामयाब हो गयी थी। जब कोई मेरे काम की तारीफ करता है तो मैं अपनी माँ की दूरदर्शिता को थैंक्यू कहती हूँ कि उन्होंने मुझे डाँट डपट कर ये हुनर सिखाया जिसकी वजह से मैं अपने पैरों पर खड़ी हो पायी हूँ।
सुमन दीदी और सुनील भैया के बड़े भाई साहब सुमन दीदी के बच्चों के जन्मदिन पर आ रहे थे। सुमन दीदी ने मुझे भी बुलाया था......पर साथ ही बता भी दिया था कि वो भी आ रहे हैं शायद अपने परिवार के साथ। उन्होंने मुझे ये सोच कर बताया कि अगर मैं उन्हें वहाँ देखती तो दीदी से पहले क्यों नहीं बताया कि वजह से नाराज हो जाती। सुमन के पति और ससुराल वालों की वजह से उन्हें फोन किया था, सुमन दीदी ने मुझे अपनी पूरी बात कह दी तो मैंने भी कहा कोई बात नहीं दीदी वो आप के भाई हैं, मेरी वजह से आप तीनों आपस में दूरी मत रखो, मैं जरूर आऊँगी, आप बेफिक्र रहिए।मेरे दिल में उनके लिए न गुस्सा था अब न कोई और भाव पर ये जरूर था कि मेरी कम पढाई पर जो उन्होनें उठाया था, मुझे एक वजह दे दी थी आगे बढने के लिए। मेरे लिए यही काफी था, इस तरीके से सोचती हूँ तो लगता है कि भगवान जो करते हैं, वो अच्छा ही करते हैं। सुमन दीदी के घर सुबह पूजा थी और शाम को एक होटल में पार्टी थी। मैं सुबह पूजा में कुछ देर के लिए चली गयी और बच्चों को उनके गिफ्टस दे कर वापिस आ गयी, रात को आने का वादा कर के। काम निपटा कर और रात की शिफ्ट वाले काीगरों को काम समझा कर मैं अपने साथ तारा को भी साथ ले गयी। वो मना कर रही थी, पर उसको मेरी जिद पर चलना ही पड़ा। पहले से तारा अब ठीक हो गयी थी, इंसान को जहाँ प्यार और सम्मान मिलता है तो वो अपने दुखो से बाहर आ जाता है, बस यही तारा के साथ हुआ था। उसको कामवाली की तरह ट्रीट न मैंने कभी किया न ही किसी स्टॉफ ने। तारा भी तैयार तो हो गयी थी, पर इस शर्त पर की पहले बच्चों को देने के लिए ड्रैस खरीदेगी!! उसकी ये बात मुझे माननी पड़ी। हम दोनों जब पहुँचे तो केक काटने की तैयारी हो रही थी, वो भी सब के साथ खड़े थे। दुबले पतले सुधीर अब थोड़े सेहतमंद हो गए थे। उनके साथ आयी उनकी पत्नी और बच्चे भी उनके साथ ही थे। सुमन दीदी, जीजाजी और बच्चों से मिल कर और तारा से गिफ्ट दिलवा कर हम दोनों थोड़ी दूर चेयर पर बैठी कामिनी और उसके पिताजी से मिलने वहाँ चले गए।सुनील भैया सब बच्चों के साथ मस्ती कर रहे थे। उनकी नयी पत्नी देखने में अच्छी लग रही थी, बच्चे भी शायद अच्छे स्कूल में पढते थे, वो बार बार अपने बच्चों को देख रही थी। तारा को मेरे साथ बैठे रहने से थोड़ा अजीब लग रहा था तो वो पीछे बैठ गयी और मैं कामिनी से बात करने लगी। कामिनी ने बताया कि जेठ जी शाम को आए हैं अपने परिवार के साथ.....जेठानी जी का नाम मीता है। मैं सुन रही थी उसकी बातें। मैंने बात बदलने के लिए उससे काम की बात करने लगी और वो घूम फिर कर मुझे मेरे फ्यूचर के बारे में सोचने के लिए राय देने लगी। "जानकी बेटा, कामिनी बिल्कुल ठीक कह रही है, सुधीर ने शादी कर ली तो तुम भी दोबारा शादी कर लो और खुश रहो" कामिनी के पिताजी ने मुझे समझाते हुए कहा। "बेटा तुम अपना काम बहुत अच्छे से संभाल रही हो, अब तुम मालकिन हो तो किसी को अपना असिस्टेंट रख लो, जिससे भागदौड़ का काम वो करे और तुम ऑफिस संभालो और आजकल मोबाइल सबके पास है तो तुम अपने क्लाइंटस से बात कर ही सकती हो, जब ज्यादा जरूरी हो तब तुम जाओ। अपने मैटीरियल के लिए भी होलसेल्स से कांटेक्ट करो, वो तुम्हारी जरूरत का सामान का आर्डर लेने खुद आएँगे, बस तुम्हें फोन ही तो करना होगा"। उनकी बात सही लगी मुझे। बार बार सामान लेने जाना टैक्सी के खर्चे बढ़ा रहा था....!! कामिनी के पिताजी की बातो ने पिताजी की याद दिला दी। "जी आपने बिल्कुल ठीक कहा, मैं वैसे ही करूँगी जैसा आपने कहा, आपका बहुत आभार की आपने मेरे लिए अच्छा सोचा",कह मैंने उनके पैर छू कर आशीर्वाद लिया। कामिनी एक अच्छी दोस्त बन सकती है, ये मैंने कभी सोचा नहीं था.......मैं और तारा खाना खा कर वापिस आने लगे तो सुनील भैया ने कहा कि आपको मैं छोड़ आता हूँ,तो मैंने मना कर दिया। कामिनी ने जिद करके अपने ड्राइवर को हमें छोड़ने के लिए बोल ही दिया। सुमन अपने बड़े भाई के साथ बहुत खुश थी, ये देख कर अच्छा लगा कि वो इनकी पत्नी के साथ भी सहजता से बात कर रही थी। मेरा उससे कोई वैर नहीं था, उसको सहारा मिला तो उसकी और उसके बच्चों की जिंदगी सँवर जाएगी। वो मुझे देख रहे थे, ऐसा मुझे लगा पर मैंने अपनी नजरे उठा कर देखा नहीं.....पूरे रास्ते तारा और मैंने एक भी बात नहीं की....घर पहुँच कर तारा ने मुझसे लड़ाई की, वो बोली आपको पता था कि आपके पति भी आ रहे हैं तो आप क्यों गईं? "अरे तारा क्या फर्क पड़ता है उनके आने से"? वो अपनी बहन के घर आए हैं, हम रोक नहीं सकते बहन भाई को मिलने से, फिर तुम ये देखो कि परिवार भले ही उनका है पर सुमन दीदीऔर सुनील भैया आज भी मेरे साथ रिश्ता निभा रहे हैं, तो मैं क्यों पीछे हँटू"? "दीदी आप ठीक कह रही हो,पर वहाँ कोई आपस में बात कर रहे थे कि सुधीर बाबू ने दूसरी शादी की है क्योंकि उनकी पहली बीबी सुंदर तो बहुत थी, पर बच्चे नहीं पैदा कर पायी। इसलिए मुझे अच्छा नहीं लगा, वो नीचे देखते हुए बोली"। उसकी बात सुन कर बुरा तो लगा पर मैंने तारा को जाहिर नहीं होने दिया, हाँ तारा वो लोग ठीक कह रहे थे, हम दोनो के बच्चे नहीं थे, इसलिए ही तो मुझे छोड़ा था। यही तो सच है न बच्चा तो औरत ही पैदा करती है, फिर बुरा क्यों लगना। अच्छा अब चाय बना कर नीचे भी दे दो और हम दोनों के लिए भी बना लो"। तारा को चुप करा दिया था.....पर लोगों को चुप कराना नामुमकिन है। कितनी सरलता से अनुमान लगा लेते हैं सब कि तलाक से अलग होने की वजह सिर्फ और सिर्फ औरत में ही कमी होना होता है। फिर मेरे पति ने ही अलग होने की सच्ची वजह नहीं बतायी तो मेरा कहा किसको सच लगेगा तो लगने देते हैं जिसको जो लगता है, पर सच तो ये है कि आज सब बच्चों को देख कर मेरा मन भी मचल गया है एक बच्चे के लिए, जिसे मैं पैदा करूँ और वो मुझे माँ कहे....!!
क्रमश:
स्वरचित
सीमा बी.