Stree - 36 in Hindi Novel Episodes by सीमा बी. books and stories PDF | स्त्री.... - (भाग-36)

स्त्री.... - (भाग-36)

स्त्री.......(भाग-36)

हमारी तरफ के सब लोग आ गए थे। मेरी इस खुशी में मेरा पूरा परिवार मेरे साथ है, पर मेरी सास नहीं थी, जिन्होंने मुझे माँ से भी ज्यादा प्यार और इज्जत दी....माँ ने मुझे आगे तलाक ले कर आगे बढने को कहा था, आज उनकी ये इच्छा भी पूरी हो जाएगी। पिताजी ने सुमन दीदी और सुनील भैया के परिवार से बिल्कुल सहजता से परिचय कराया.....कामिनी के पिताजी से परिचय कराते हुए पिताजी ने कहा,"भाई साहब ये वैसे तो हमारे समधी हैं, पर जानकी का एक पिता की तरह ध्यान रखते हैं, तभी हमारी बेटी इस शहर में आराम से है"। सोमेश जी और उनके पिताजी सब से बड़े प्यार से मिल रहे थे। उनके दोनो भाई अभी तक पहुँचे नहीं थे तो सोमेश जी बार बार फोन कर रहे थे।
सोमेश की मम्मी जी व्हील चेयर पर बैठी थी, सब इंतजार कर रहे थे, पर शायद वो लोग घर से ही नहीं निकले थे, तभी सोमेश जी ने कहा," उन्हें आप लोग अब शाम को सीधा होटल ही पहुँच जाना", कह कर फोन रख दिया। बंसल सर ने उनकी तरफ देखा, "पापा वो लोग कल रात को कहीं बाहर गए हुए थे तो देर से लौटे होंगे, तो अभी तैयार हो रहे हैं, वो शाम को मिल लेंगे सबसे"। दोनो भाईयों के पास समय पर न आने की अपनी वजह थी। सोमेश जी पंडित जी से बोले, "चलिए पंडित जी, शुरू कीजिए, जिनकी शादी होनी है, वो यहाँ हैं ही और जिनके आशीर्वाद की जरूरत है, वो लोग भी हैं"।
बंसल सर पिताजी के सामने थोड़े असहज हो रहे थे, पर पिताजी ने माहौल को संभाल लिया......! थोड़ी अटपटी तो थी ये बात पर शायद वो लोग काफी समय से अलग रह रहे हैं तो इतना आपसी प्यार भी न हो...तभी सोमेश जी ने उन्हें शाम को ही आने को कहा होगा!!
मैं बैठी बैठी यही सोच रही थी और पंड़ित जी जो कहते जा रहे थे हम करते जा रहे थे। जयमाला के बाद फेरे और फेरो के सात वचन और उसके बाद अँगूठी से माँग में सिंदूर भरा जाना, सब कुछ इतनी तेजी से होता चला जा रहा था कि मैं बस उन्हीं रस्मों में खो गयी। गले में सोमेश जी के नाम का मंगलसूत्र पहनाया जा चुका था...हमारी शादी हो गयी। हम दोनो नें पहले पंडित जी का फिर सब बड़ो का आशीर्वाद लिया। पंडित जी को दक्षिणा दे कर हम बाहर आ गए। बच्चों को तारा संभाल रही थी। सब शगुन देने लगे तो सोमेश जी ने मना कर दिया। "मैं आप सबसे मिलने जब आप के घर आऊँगा, तब जो भी देंगे ले लूँगा पर आज बस शुभ कामनाएँ और आशीर्वाद दीजिए हम दोनों को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है".....कोई कुछ नहीं कह पाया। अब आगे क्या और कैसे करना है पिताजी सोमेश जी के पापा से बात कर रहे थे। हम दोनों बँधे थे गठबंधन में तो हम लोग दोनो माँओ के पास खड़े थे।
"सोमेश जी अब आगे कैसे जाना है"? "हम सब लोग सीधा होटल जाँएगे! माँ बार बार बाहर नहीं आ जा सकती और फिर पूरा दिन तो आने जाने में निकल जाएगा।
सब बहुत थक जाँएगे। मैंने चार कमरे उसी होटल में बुक करा दिए हैं....हमारा सारा सामान कारो में ही है तो सब चलते हैं"। सोमेश जी के पापा भी सब को यही बात कह रहे थे। सुनील भैया और सुमन दीदी की फैमिली शाम को समय पर पहुँचने का वादा करके चले गए और पिताजी ने कामिनी के पापा को विपिन जी और चाची जी को भी जरूर लाएँ कह कर भेजा। मैं भी तो रात को यही सोच कर सोयी थी कि राजन को बोलूँगी कि दो कमरे बुक करा लेगा, तभी तो सब कुछ पैक कर लिया था। मैं और सोमेश जी एक तरह से सोचते हैं, बहुत अच्छा लग रहा था ये सोच कर । मैं और सोमेश जी एक कार में, दूसरी कार में सोमेश जी के पैरेंटस और केयर टेकर, एक कार में राजन छाया और बच्चे लेकर निकला और एक कार पिताजी और माँ को ले कर चल दी.... होटल ज्यादा दूर नहीं था।वैसे तो डोली घर जानी चाहिए थी और रस्मों के बाद ही गठबंधन वालो औढनी और पगड़ी को निकाल सकते हैं, पर ये रस्म भी मेरी सास ने वहीं करवा ली, कहते है न, "आवश्यकता अविष्कार की जननी है"! सब कुछ होने के बाद एक कमरे में छाया, बच्चों और तारा चले गए और दूसरे कमरे में राजन, माँ और पिताजी, कुछ घंटो की बात थी, फिर शाम की तैयारियाँ शुरू होनी थी।डिनर में दूसरी साड़ी और गहने मुझे दिखाए गए। सुबह वाले गहने उतार कर मैंने अपनी सास को संभालने के लिए दे दिए।खाने का टाइम हो गया था। सबके कमरों में ही सोमेश जी ने अपनी पसंद का खाना भिजवा दिया और खाना खा कर वो मुझे बोले जानकी तुम मिलो सबसे, माँ पिताजी और तारा दीदी से बातें करो।मैं भी मम्मी पापा को देख कर आता हूँ। मैं तो खुद यही चाहा रही थी कि सबको देख आऊँ, उनको अजीब लग रहा होगा। कमरे साथ साथ ही तो थे, पर हिचक हो रही थी मुझे पूछने के लिए, पर सोमेश जी हर कदम मेरे लिए आसान करते जा रहे थे, जो मेरे लिए एक बहुत सुंदर सपने की तरह था....मैं पिताजी के कमरे में गयी तो पिताजी बोले, अभी याद ही कर रहा था कि शाम के लिए कुछ तोहफे लाने हैं, कैसे जाना होगा। पिताजी के पास सुनील भैया वाला पैकेट था, कुछ पैसे मैं भी घर से ले आयी थी। पिताजी मैं सोच रही थी कि सोमेश जी के दोनों भाई के परिवारों के लिए चाँदी के कुछ बरतन ले लेते हैं, और मम्मी पापा के लिए भी कुछ चाँदी का ले लेते हैं। पिताजी को पसंद आया था मेरा आइडिया....माँ ने भी कहा ये ठीक रहेगा...शाम के लिए मिठाइयाँ भी लेनी थी, जो हमने कह रखा था। सोमेश जी को फोन करने मैंने पूछा, "थोडी देर के लिए पिताजी के साथ मुझे बाहर जाना है,मैं चली जाऊँ"? वो जानते थे कि मुझे ही जाना पड़ेगा क्योंकि बाकी सब के लिए नया शहर है....इसलिए मुझे जाने तो दिया पर कहा कि टाइम से आ जाना।ये भी अच्छा था कि होटल से हमें ज्यादा दूर नहीं जाना था।उस समय एक चाँदी के सामान का बहुत बड़ी दुकान हुआ करती थी...जहाँ बरतन ,गहने सब मिल जाता था। समय हमारे पास वैसे भी कम था तो जल्दी से 6ग्लास, कटोरी, चम्मच और ट्रे के दो सेट ले लिए और एक डिनर सेट अपने ससुराल के लिए। चाँदी के सिक्के उनके बच्चों के लिए। जो सेट मैंने सोमेश जी के भाइयों के लिए लिए थे, वैसा ही एक सेट मैंने छाया के लिए भी ले लिया और माँ के लिए चाँदी का चाभियों के लिए गुच्छा। सुमन दीदी और कामिनी के लिए मैंने गणेश जी की ले लिए। सब जल्दी जल्दी गिफ्ट पैक करा लिए। मिठाई की दुकान पर फोन करके पूछ लिया था कि हमारे बॉक्स तैयार हैं। हम वहाँ से मिठाइयाँ ले कर होटल पहुँच गए। होटल का एक छोटा हॉल तैयार किया जा रहा था हमारे डिनर की पार्टी के लिए। वापिस आ कर सबने चाय पी और एक दूसरे को हम तैयार होने के लिए कहने लगे। मैंने सारा सामान उन्हें बता दिया कि सब कुछ इसमें है और जो उतारना सब रखते जाना इसी बैग में....पिताजी ने कहा कि सब हो जाएगा जानकी बेटा तुम अब उधर भी जा कर देखो अपने सास ससुर से मिलो और वहीं रहो तुम यहाँ चिंता मत करो राजन है न!! मैंने सोमेश जी से पूछा कि वो कहाँ हैं तो बोले मम्मी पापा के पास तो मैं भी वहाँ चली गयी। सब बातें कर रहे थे और मम्मी जी मुझे दिखा रही थीं कि शाम वो क्या पहनने वाली हैं! अरे जानकी ने तो देखी हुई है, उसके यहाँ की ही तो साड़ी है, पापा ने हंसते हुए कहा। पता है जानकी, तुम्हारे यहाँ से जो भी साड़ियाँ हमारे यहाँ आती हैं, सबसे पहले मैं एक साड़ी पसंद करके ले लेती हूँ, मम्मी जी ने कहा तो मुझे बहुत खुशी हो रही थी। "तुम बहुत सुंदर काम करवाती हो, बस ऐसे ही खूबसूरती से घर को और हर रिश्ते को संभाल लेना बेटा" मम्मी जी मैं पूरी कोशिश करूँगी , पर मम्मी जी मुझे आपसे एक बात पूछनी थी, अगर आप नाराज न हो तो? पूछो, जरूर पूछो बेटा, उन्होंने कहा तो मैंने पूछा क्या मैं आपको मम्मी जी की बजाय माँ कह सकती हूँ? हाँ, क्यों नहीं तुम माँ कहा करो। हमारी बातें सुन कर पापा और सोमेश जी मुस्कुरा रहे थे और फिर बोले चलो लेडिज अब तैयार होना शुरू करो, 6 बज गए हैं। माँ मैं पहले आपकी हेल्प कर दूँ तैयार होने में? नहीं बेटा, वो तुम कल से करना आज तुम्हारा दिन है, तुम अच्छे से तैयार हो जाओ।
हम सब तैयार हो चुके थे 7:30 बजे हम सब नीचे थे। राजन ने होटल स्टॉफ की हेल्प से सारे गिफ्टस नीचे रखवा दिए, बस छाया का ही ऊपर रख दिया गया था। मैंने ससुराल से आयी महरून रंग की सिल्क साड़ी पहनी हुई थी, जिस पर गोल्ड का रानी हार और एक हाथ में 12 सोने की चूडियाँ और एक हाथ में बड़ा भारी सा कंगन जो रजवाडे खानदान का लग रहा था मुझे तो। इतने सारे गहने पहन कर सोच रही थी कि हमारे गाँव मैं इतने सोने से कितनी लड़कियों की शादियाँ हो जाती! भगवान किसी को इतना ज्यादा और किसी को इतना कम क्यों देता है! ये सही वक्त तो नहीं था, ये सब बातें सोचने का, मुझे तो भगवान को धन्यवाद कहना चाहिए कि मुझे इतना अच्छा पति और ससुराल मिला। कैसी लगी तैयारियाँ, सोमेश जी ने पूछा तो मैं ख्यालों से बाहर आ गयी। बहुत सुंदर है सब....मैंने वो शादियों वाला स्टेज और कुर्सिया नहीं रखवायी हैं, मुझे अजीब लगता है वो सब। जी बिल्कुल ठीक कहा आपने.....हम सब के साथ बैठेंगे तभी अच्छा लगेगा, हाँ यही सोचा था मैंने भी। दोनों परिवार मिल कर बैठे थे। धीरे धीरे सब आ गए और हम सबसे मिल रहे थे आराम से, शादी ऐसे भी हो सकती है ये कभी हम लोगों ने नहीं देखा था। सोमेश जी के दोनो भाई भाभी से मिले तो सबके पैर छुए तो उन्होंने मुझे गिफ्टस दिए जो मैंने सोमेश जी को पकड़ा दिए और वो माँ को दे आए। सोमेश जी ने अपने दो बचपन के दोस्तों को भी बुलाया हुआ था। सब लोग काफी अच्छे लगे मुझे। सब बच्चों को तारा बहुत अच्छे से देख रही थी। राजन और पिताजी हमारी तरफ से आए हुए सब लोगो से मिल रहे थे। जब अपने ससुराल वालों से मिल लिया तो मैं और सोमेश सुनील भैया और सबसे मिलने लगे....विपिन जी और चाची जी थोड़ा सरप्राइज दिख रहे थे, तारा उनकी तरफ देख कर बार बार मुस्कुरा रही थी। विपिन जी से सोमेश जी का परिचय कराया और चाची जी भी पास में खड़ी थी तो मैंने जानबूझ कर बताया कि सोमेश जी डॉक्टर हैं और विपिन जी बिजनेस सैटल कर रहे हैं, पहले ये लंदन में रहते थे। चाची जी ने मुस्कुरा कर सोमेश जी को आशीर्वाद दिया और विपिन जी ने हम दोनो से हाथ मिलाते हुए बधाई दी....! सब के साथ मिल कर खाना खाया और खिलाया। फोटोग्राफर हम दोनो की फोटो खींचना चाहता था तो सोमेश जी ने खाने के बाद कहा। सब धीरे धीरे जा रहे थे और पिताजी ने सुमन दीदी, सुनील भैया और चाची जी को उनके गिफ्ट और मिठाइयों के बॉक्स दिए। उसके बाद सोमेश जी के दोस्त और भाई भी अपने अपने परिवारों के साथ जा रहे थे, उन्हें भी गिफ्टस और मिठाइयाँ दे कर विदा किया। सोमेश जी कह रहे थे, मना किया था न कुछ नहीं लाना फिर ये सब क्यों? क्योंकि सब हमारी खुशी में शामिल हुए हैं तो मुँह मीठा कराना बनता है। फिर बिल्कुल कुछ भी न करना पिताजी को अच्छा नहीं लग रहा था। ठीक है, मैंने इस ढंग से नहीं सोचा था, फिर बिल्कुल ठीक किया। हम सब को तो यहीं होटल में रूकना था, पर माँ और पापा घर जाना चाहते थे तो सोमेश जी ने उन्हें और सब गिफ्टस को उनके साथ भेज दिए। जब माँ और पिताजी ने जब माँ और पापा को उनका तोहफा दिया तो खुश हो गए। बाकी मिठाई के डिब्बे भी बाँटने के लिए दे दिए थे......दो कारों मे सब चला गया। अब हम सब थे। एक कमरा खाली था तो वहाँ राजन सो गया और तारा तो छाया के पास ही सो गयी। मैं और सोमेश अगले दिन की प्लानिंग कर रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि कल दोपहर को मैंने अपने स्टॉफ को लंच के लिए कहा है तो कैसे करना चाहिए? वो बोले कि तुम राजन के साथ सुबह जल्दी घर चली जाना साथ तारा दीदी को लेती जाना ,मैं बाकी सब को यहाँ नाश्ता करवा कर ले आऊँगा। ठीक है, ऐसा ही करते हैं, पर घर पर माँ और पापा हमारा इंतजार करेंगे? उसकी टेंशन मत लो, पापा ने ही कहा जब सब गाँव चले जाँए तभी जानकी अपने घर आ जाएगी, इसलिए तुम बिंदास अपने सब काम करो, मैं तुम्हारे स्टॉफ से मिल कर वापिस घर आ जाँऊगा, तुम अपना टाइम फैमिली के साथ फ्री हो कर बिताओ, मैं वहाँ रहूँगा तो सब फार्मल रहेंगे, वो मुझे ठीक नहीं लगेगा। उनकी बातें सुन कर मेरे दिल को बहुत सुकून मिला....कितने समझदार हैं मेरे पति। हर लड़की अपने पति में शायद सबसे पहले पिता को ढूढँती है, उसके बाद दोस्त, प्रेमी और पति, ये सब मैं जब पढा करती थी तो हँसी आती थी क्योंकि तब मेरा अनुभव कुछ ऐसा था....पर सोमेश जी जब पहली बार मुझसे मिलने आए तो वो वर्कशॉप में सब देखते हुए कारीगरों से बात करते हुए आए थे, तभी मुझे वो पिताजी की तरह शांत लगे थे, कुसी काम की कोई जल्दी नहीं। अब यकीन हो चला है कि जो लिखा जाता है वो कभी तो किसी के साथ घटा होगा तभी तो अनुभव और कहानियाँ लिखी जाती होंगी....वो रात बहुत ही प्यारी थी, हम दोस्त बन गए थे। बहुत देर तक हम बातें करते रहे, मेरा हाथ उनके हाथों मे था और न जाने कब मैं उनकी बातें सुनते सुनते ही सो गयी। पूरी रात मैंने उनका हाथ पकडे रखा था, सुबह हड़बड़ा कर उठी, नींद चिंता के कारण खुल गयी थी। सुबह के पाँच बजे थे, सोमेश जी सो रहे थे। मैंने धीरे से दरवाजा खोला और राजन को उठाने चली गयी।एक दो बार बेल बजाने पर वो उठ गया। मैंने उसे हाथ मुँह धोने को कह तारा को उठाने चली गयी, घंटी बजाते ही तारा बाहर आ गयी। मैेने उसे कहा कि हम दोनो घर जाँएगे राजन के साथ, तैयार हो कर मेरे पास आ जाओ। मैंने गले का हार और कान के निकाल कर अपने हैंडबैग मे रख लिए। धीरे से सोमेश जी को उठा कर मैंने अपने जाने का बताया.....वो बोले कि हम लोग भी जल्दी आ जाँएगे, नाश्ता बनाने मत बैठना, हम यहीं से कर के आँएगे.......
क्रमश:
स्वरचित और मौलिक
सीमा बी.

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