before departure in Hindi Moral Stories by Rama Sharma Manavi books and stories PDF | प्रस्थान से पूर्व

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प्रस्थान से पूर्व

हालांकि बहुत सी घरेलू महिलाएं ऐसी हैं, जिनका अपने गृह राज्य पर पूर्ण वर्चस्व स्थापित रहता है।फिलहाल मैं उन गृहणी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हूँ जो आजीवन अपने मन की बात या व्यथा अपने अंतर में ही दबाकर संसार से विदा हो जाती हैं।कभी संस्कारों के कारण गलत बात का भी विरोध नहीं कर पाती हैं, कभी घर के अशांति को स्थगित करने के प्रयास में चुप रह जाती हैं और कभी उनकी भीरुता उन्हें कुछ भी कहने से रोक देती है। मन ही मन तमाम बातें उन्हें आंदोलित करती रहती हैं, जबाब मन में कौंधता रहता है, बार-बार विचार आते हैं कि काश! एक बार मैं भी अपने मन की भड़ास निकाल पाती, परन्तु हर बार हमारी ख्वाहिशों की भांति यह इच्छा भी टलती चली जाती है।लेकिन अपने प्रस्थान से पूर्व एक बार मैं उन सारी बातों को आपसे अवश्य कहना चाहती हूँ जो अक्सर मेरे मन में काले घनघोर घटाओं की भांति उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं, जो अश्रुओं के रूप में तो जब-तब नैनों से बहते रहते हैं लेकिन शब्दों में आजतक व्यक्त करने का साहस नहीं जुटा सकी हूँ।हालांकि कहा तो यह भी जा सकता है कि जब पूरी उम्र खामोशी में गुजार दी तो अब आखिरी समय में कहने से क्या फायदा, किंतु मैं इस घुटन के साथ जगत नहीं त्यागना चाहती औऱ न ही आपको अपने सामने अवसाद में देखने का साहस है मुझमें।

सगाई से पूर्व का कुछ भी वर्णन करने का कोई फायदा नहीं।जिस दिन से हमारी एंगेजमेंट हुई,उस दिन से मेरे आखिरी श्वास तक मेरा प्रणय-प्रेम सिर्फ आपके लिए था और है।यूँ तो हर रिश्ते का आधार स्नेह ही है, चाहे वह माता-पिता,भाई-बहन,पुत्र,मित्र किसी के लिए भी हो एवं सबका अपना अलग महत्व होता है।

आपकी मुस्कान, आपकी मूंछों एवं आपके गहरे नेत्रों पर मैं प्रथम मुलाकात से ही फिदा थी।यह सच है कि विवाह पूर्व मैंने कभी भी अपने भावी जीवन के लिए ज्यादा स्वप्न नहीं सजाए थे,किंतु इतनी चाहत तो थी ही कि मेरा जीवनसाथी मुझे एवं मेरी भावनाओं को अच्छी तरह समझे एवं मेरे अस्तित्व तथा विचारों का पूर्ण सम्मान करे।

विवाह के एक माह पश्चात ही आप दोनों भाइयों एवं आपकी माताजी के मध्य हुए विवाद में आप सबके क्रोध को देखकर मैं हतप्रभ थी,साथ ही अत्यधिक भयभीत भी।अबतक सिर्फ़ आपके मुस्कराते चेहरे की छवि बसी हुई थी मेरे नेत्रों में।खैर चलो,वह तो कोई बात नहीं थी,हर परिवार में ऐसे टकराव अत्यंत सामान्य हैं, होते ही रहते हैं।जब भी आप सबका शब्द-युद्ध होता तो सासुमां मय ब्याज सारा क्रोध मेरे ऊपर निकाल देतीं।मैं कहना चाहती थी कि मैं तो बीच में बोलती भी नहीं, फिर मुझपर आक्रमण क्यूँ?

एक माह के भीतर ही मुझे समझा दिया गया कि मैं बाहरवाली हूँ, यहाँ मेरा कोई अधिकार नहीं है, मेरे हिस्से में सिर्फ़ कर्तव्य हैं, एक चुटकी सिंदूर प्रदत्त असीम कर्तव्य।खैर, मैंने हर कर्तव्य का शिद्दत से निर्वाह किया, किंतु जैसा होता है, कभी किसी को प्रसन्न न कर सकी।मेरे बात-चीत, व्यवहार, कार्य सबमें तमाम त्रुटियां निकाली गईं,जिनका मुझे विशेष अफसोस नहीं था, क्योंकि मुझे लगता था कि आप मुझे समझते हैं एवं सदैव मेरे साथ हैं।

एक बार क्रोधित होकर किसी बात पर सासुमां ने मुझसे कहा कि तुम्हारी किस्मत बढ़िया थी जो हमारे जैसे परिवार मिला,तो मैंने रोते हुए प्रत्युत्तर दिया कि ईश्वर करे,छोटी नन्द को भी ऐसा ही उत्तम परिवार मिले।नन्द ने झुंझलाकर कहा,"भाभी,बद्दुआ मत दो।"मैं कहना चाहती थी कि जो मेरे लिए वरदान है, वह आपके लिए अभिशाप कैसे हो सकता है।

कुछ माह में ही मैं समझ गई थी कि परिवार में छोटे भाई एवं माँ का ही प्रभुत्व है, अतः मैंने आपसे कहा था कि कुछ पैसे अपने पास भी रखा कीजिए।तब अपने नाराज होकर मुझे झिड़क दिया था कि तुम मुझे मेरे परिवार के खिलाफ भड़काना चाहती हो औऱ कई दिनों तक आप मुझसे नाराज रहे।उसी दिन मैं समझ गई थी कि मैं आपकी जिंदगी में सदैव द्वितीयक ही रहूँगी।मैंने उनका स्थान लेना भी नहीं था लेकिन बराबरी तो चाहती ही थी।

बेटी के जन्म से एक दिन पूर्व रात्रि में आप तीनों के मध्य भयंकर वाद-विवाद हुआ था।मैं सुबह से ही तकलीफ़ में थी,फिर भी सबको खाना बनाकर खिलाया था, मैं अभी खाना खा भी नहीं सकी थी कि आप सबका वाकयुद्ध प्रारंभ हो गया था।आप दोनों तो पुरुष थे,नहीं समझे मेरी पीड़ा,किंतु सास तो स्त्री थीं, उन्होंने भी समझना आवश्यक नहीं समझा, आखिर बहू जो थी मैं।तीन दिन पश्चात मैंने बेटी को खो दिया।खोया तो आपने भी, किंतु नौ माह कोख में पालने से जो जुड़ाव माँ महसूस करती है, पता नहीं पिता कर पाता है या नहीं।हालांकि मानती हूँ कि आपके दिए सम्बल एवं मानसिक सहारे के बलबूते ही मैं उस अवसाद से उबर सकी।

आपके प्रेम पर तो मुझे कभी भी शक नहीं था।तब भी नहीं जब विवाहोपरांत मात्र 8-10 दिन के भीतर ही आपकी बहन ने कहा था कि आप तो विवाह करना ही नहीं चाहते थे या कहीं और करना चाहते थे।मुझे खुदपर एवं अपने प्यार पर पूर्ण विश्वास था।लेकिन शायद आपके अंदर के पुरूष ने आपको मुझपर कभी पूर्ण विश्वास करने ही नहीं दिया।न जाने वह आपकी असुरक्षा थी या पुरुषगत सामान्य अविश्वास, मैं कभी नहीं समझ सकी।कहना चाहती थी कि तीन दशक साथ रहने के बाद भी,मेरे द्वारा हर कर्तव्य को शिद्दत से निभाने के बावजूद आपको मुझमें इतनी कमियां नजर आ रही थीं।तो सच तो यही है कि विश्वास स्वयं के अंदर होता है, अगर वही कमजोर होगा तो हर छोटी बात पर दरकता रहेगा।

मैंने आपके हर क्रोध को खामोशी से बिना प्रतिवाद के सहन किया।ऐसा नहीं था कि आप हर बार सही थे,या मैं जबाब नहीं दे सकती थी।मैं मानती थी कि यदि कोई गुस्से में है तो उसे सही बात भी नहीं समझाई जा सकती।साथ ही मैं यह भी समझ चुकी थी कि आपको मेरा कोई भी स्पष्टीकरण न सुनना है, न समझना है, न मानना है, इसलिए मैंने खामोशी का स्थायी मार्ग चुनना बेहतर माना,भले ही इसे मेरी भीरुता का नाम दिया जा सकता है।जब कभी अत्यावश्यक प्रतीत होता तो मैं एक बार आपके समक्ष अपने विचार प्रस्तुत कर देती जिससे आप बाद में यह न कह सकें कि तुमने सलाह दिया ही नहीं था या देना नहीं चाहती क्योंकि उसमें भी मेरा ही अपराध होता कि तुमने इस घर को अपना समझा ही नहीं।यह अलग बात है कि आज भी आप स्वीकार करते ही नहीं हैं जिन बातों की चेतावनी मैंने दी थी।

आपको तो शायद याद भी नहीं होगा कि आप क्रोध में क्या-क्या कह जाते थे।मेरा हृदय टुकड़े- टुकड़े हो जाता था आपके आधारहीन आरोपों को सुनकर।जब बेटा समझदार होने लगा तो शायद मेरी इसी चुप्पी के कारण वह विद्रोही होने लगा।वह आपको प्रत्युत्तर देना चाहता था,आपकी जिन बातों से वह असहमत होता था किंतु अशांति के भय से मैं उसे चुप करा देती थी।आप दोनों के मध्य बढ़ती दूरी को रोकने के लिए आप दोनों को अलग-अलग एक- दूसरे के पक्ष को रखने एवं समझाने का प्रयास करती किंतु दोनों मुझपर ही पक्षपात का आरोप लगा देते।

अपने विचार, कृत्य एवं स्वयं को सभी सही मानते हैं लेकिन वह सामने वाले के दृष्टिकोण से उचित ही हो यह आवश्यक तो नहीं।इसलिए यह जरूरी होता है कि सामने वाले की बातों को खुले मन-मस्तिष्क से समझने का प्रयास किया जाय।लेकिन लोग इन बातों को सिरे से खारिज कर देते हैं, परिणामस्वरूप रिश्तों में दूरियां बढ़ जाती हैं।

कुछ वर्षों पश्चात आपका नया तंज प्रारंभ हो गया था।हर बार क्रोध में आप कहते कि तुम दोनों माँ-बेटे को सिर्फ मेरे पैसे से मतलब है।अब यह तो कोई बात नहीं।जब आप एकमात्र कमाऊ सदस्य हैं तो कोई आवश्यकता होने पर वह आपसे ही कहा जाएगा।अब मैं किचन एवं घर के कार्य करती हूँ तो क्या मेरी स्थिति मात्र परिचारिका की ही रह गई।यह तो पारिवारिक सामंजस्य है दायित्वों के बंटवारे का।कोई एक सबमें तो समर्थ नहीं हो सकता।

आप कदापि नहीं स्वीकार करेंगे,लेकिन यह सत्य है कि यदि मैंने कोई भी कार्य अपनी सोच से कर दिया तो वह आपको कभी भी सही प्रतीत नहीं हुआ या आपको नागवार गुजरा।परिणामतः मुझमें एक निराशा घर कर गई कि क्या फायदा,मेरा किया कुछ पसंद तो आने से रहा, जिससे मेरा आत्मविश्वास समाप्तप्राय सा हो गया।

ऐसा नहीं था कि आप मेरी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को पूर्ण करने में समर्थ नहीं थे,किंतु या तो आप उन्हें अनावश्यक समझते थे या आपकी दृष्टि में उनकी अहमियत नहीं थी।आपने मेरी वृद्धावस्था की सुरक्षा के लिए काफी धन मेरे अकाउंट में जमा कर दिया लेकिन इस प्लानिंग में जीवन की खुशियों का संचय करना भूल गए।

उम्र के छः दशक व्यतीत हो जाने के बाद एक बात तो मैं दावे से कह सकती हूँ कि मेरी अतिशय सहनशीलता मेरा सबसे बड़ा दुर्गुण था।सही को स्वीकारना तो उचित है लेकिन गलत का प्रतिकार न करना सर्वथा अनुचित है।अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए किंतु अपने अधिकारों को त्याग भी नहीं देना चाहिए।कहते हैं,"बिना रोए माँ भी अपने बच्चे को दूध नहीं पिलाती"।अतः अपने अस्तित्व को मटियामेट भी नहीं करना चाहिए।अधिकार भिक्षा में नहीं मिलते,उनके लिए लड़ना पड़ता है।यहीं मैं चूक गई।मैं ताउम्र सोचती रह गई कि आप मुझे एक न एक दिन अवश्य समझेंगे, मुझे सराहेंगे,कभी रूठूँ तो मनाएंगे।परन्तु अब आप चाहेंगे भी तो मुझे नहीं पाएंगे।

खैर, शिकायतें तो आपको भी मुझसे तमाम होंगी,सभी को होती हैं, विशेषतः उन्हीं से, जो सबसे करीब होते हैं।यह जिंदगी खट्टी-मीठी गोलियों की मानिंद होती है,हर रस का अपना महत्व भी होता है और अपना स्वाद।

चलो,गले मिलकर तमाम शिक़वे-गिले भुला देते हैं।अब मैं प्रस्थान करती हूँ अपने अगले जीवनचक्र के लिए।

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