Ant - 15 in Hindi Moral Stories by निशा शर्मा books and stories PDF | अंत... एक नई शुरुआत - 15

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अंत... एक नई शुरुआत - 15

आज मैं पहली बार सपरिवार खुद गाड़ी चलाकर बाहर सबको घुमाने ले जा रही हूँ । सनी काफी दिनों से मुझे गाड़ी खरीदने के लिए कह रहा था और मुझे भी अब बस में आने में परेशानी होने लगी थी जबसे मुझे न्यूरोपैथी जो कि नसों की कमज़ोरी से हो जाती है की शिकायत हो गई है तबसे मुझे बस में चढ़ने व उतरने में काफी दिक्कत होने लगी है और फिर अब सनी की दादी को भी इस उम्र में कहीं बाहर ले जाने के लिए किसी ऑटो या रिक्शा में जाने में असहजता होती है और इसके साथ ही एक दिन मैंने उन्हें सनी से ये कहते हुए भी सुना था कि बेटा, अपनी माँ से कह कि अब वो कार खरीद ले । अरे ! मरने से पहले इस बुढ़िया को भी चार पहिए में घुमा दे ज़रा ! बस उनकी ही बात शायद मुझे इतना असर कर गई कि मैंने पिछले शनिवार को वैगनआर कार फाइनेंस करवा ली । बाकी रही ड्राइविंग की बात तो वो तो रोमा मुझे कई महीने पहले ही सिखा चुकी है । आज मैं सबसे पहले सबको मंदिर लेकर जाऊँगी और उसके बाद सनी की फेवरेट थ्री - डी मूवी देखेंगे जिसके लिए सनी के साथ - साथ उसकी दादी भी बहुत उत्साहित हैं ।

मैंने रोमा को भी अपने साथ ले लिया है क्योंकि पहली बार परिवार को गाड़ी में बिठाकर ड्राइव कर रही हूँ तो थोड़ी सी घबराहट होना तो लाज़िमी है न ! रात को डिनर भी हम सबनें बाहर रेस्टोरेंट मे ही किया । सब बहुत खुश थे आज और सबकी खुशी देखकर मैं भी बहुत खुश हूँ । घर वापिस आने पर ऊषा देवी ने आज मेरे सिर पर आशीर्वाद देते हुए मुस्कुराकर अपना हाथ रखा जिसपर मैंने उनके पाँव छुएं और मुझे ऐसा करते हुए देखकर सनी ने भी तुरंत उनके पाँव छुएं जिसपर उन्होंने सनी को अपने गले से लगा लिया । फिर सनी बोला कि 'आय लव यू दादी' और उसकी इस बात का जवाब उन्होंने भी 'आय लभ यू' कहकर दिया । आज मैं सचमुच बहुत खुश हूँ । आज मुझे अपना त्याग और तपस्या सार्थक होती हुई नज़र आ रही है । थैंक्यू भगवान जी, थैंक्यू ! !

आज रोमा नें एक अजीब सा प्रस्ताव मेरे सामने रखा जबकि वो जानती है कि मैं कभी भी किसी अजनबी पर यूं ही विश्वास नहीं करती पर फिर भी उसनें आज मुझे अपनी पहचान के एक लड़के को मेरे घर में एक पेइंग - गेस्ट के रूप में रखने के लिए कहा और इसके पीछे उसकी जो दलील थी वो भी बड़ी ही अजीब थी । जब मैंने रोमा से कहा कि वो खुद उसे अपने घर में क्यों नहीं रख लेती तो उसनें इस पर मुझसे ये कहा कि वो एक बेहद शरीफ़ लड़का है और इसलिए वो रोमा के पास नहीं रह पायेगा । उसने कहा कि वो मेरे टाइप का नहीं है और फिर इस बात पर जब मैंने उससे ये कहा कि किराएदार रखना है रोमा मैडम , न कि आपको उससे शादी करनी है ! जिसपर वो खिलखिलाकर हंस पड़ी ! अभी तो मैंने उससे सोचने के लिए कुछ वक्त माँगा है जो कि मेरा उसे टालने के लिए सिर्फ एक बहाना मात्र है बाकी मेरी तरफ़ से तो इस प्रस्ताव के लिए पूरी तरह से न है ।

इस बात को कई दिन गुज़र गए मगर रोमा नें जब इस संदर्भ में कोई बात नहीं छेड़ी तब मुझे लगा कि उसनें शायद उस लड़के को कहीं और घर दिला दिया है मगर मुझे इस बाबत चैन की साँस लिए हुए दो घंटे भी नहीं बीते होंगे कि छुट्टी के समय उसनें फिर से अपना वो ही राग अलापना शुरू कर दिया और जब मैंने कहा कि मैं इस तरह से किसी अजनबी पर विश्वास नहीं कर सकती तो उसनें पता नहीं किसे कॉल मिलाकर फोन मेरे कान से सटा दिया । दूसरी तरफ़ कोई चिर-परिचित आवाज़ थी और जब मैंने फोन अपने हाथ में लेकर ध्यान से सुना तो वो तो कोई और नहीं बल्कि स्मिता मैम थीं और उन्होंने मुझसे कहा कि वो उस लड़के को बहुत ही अच्छी तरह से जानती हैं , दरअसल उस लड़के की बहन उनकी स्टूडेंट रह चुकी थी । इसके साथ ही जब मैंने घर में इस सिलसिले पर बात की तो ऊषा देवी का तर्क भी यही था कि मेरी गाड़ी की किश्तों में भी मुझे इस किराएदार के घर रहने से सहूलियत हो जायेगी । सबकी बातें सुनने के बाद आखिरकार मुझे अपने हथियार डालने ही पड़े और अब मैं अपने घर के पीछे की तरफ़ बने हुए छोटे कमरे की साफसफाई में लगी हुई थी ।

अगले दिन वो लड़का सुबह-सुबह ही अपने सामान के साथ मेरे घर के दरवाज़े पर खड़ा था कि जैसे मेरी हाँ के लिए ही रूका हुआ हो अभी तक !

"हाय ! मायसेल्फ़ अनुराग ! बट यू कैन कॉल मी अनु !", बड़े ही फ़िल्मी अंदाज़ में वो बोला ।

उसकी इस बात पर मैं चाहकर भी हंसे बिना न रह पायी । अरे , अच्छा - खासा , माता - पिता ने लड़कों वाला नाम तो रखा हुआ है जनाब का मगर नये जमाने की नयी पीढी के चलन के चलते लड़की बने फिरेंगे अब....अनु ! ! खैर मैंनें अपनी हंसी रोकने का असफल प्रयास करते हुए उसे उसका कमरा दिखाया । खाने - पीने का समय वगैरह और कुछ हमारे घर के नियम - कायदे समझाये । फिर उसके बाद उसका दिया हुआ एडवांस चुपचाप लेकर मैं तैयार होकर सनी के साथ स्कूल निकल गई ।

थोड़े दिन बीतते ही मेरे मन की शंका कम होने लगी । वो , मेरा मतलब है कि अनुराग सचमुच बहुत ही शरीफ़ निकला जिसका नमूना दो बार तो मैंने अपनी आँखों से देखा और कई बार अपने कानों से सुना भी । दरअसल उसके कमरे और मेरे कमरे की दीवार एक ही होने के कारण मुझे अक्सर उसकी बातें सुनाई पड़ जाती थीं जो कि कभी वो अपने बड़े भाई से , माँ से और कभी अपने दोस्तों से कर रहा होता था । अनुराग नें दो बार तो दो लड़कियों को समझाकर उनके घर भेजा था जिसमें से एक तो अपने प्रेमी के धोखा देने पर इसके पास कुछ अजीब सा इरादा या कह लें कि अपने प्रेमी की बेवफ़ाई के बदले अनुराग के साथ मिलकर उसे भी अपनी बेवफ़ाई दिखाने का इरादा लेकर आयी थी और एक दूसरी लड़की जो कि अनुराग से उम्र में मुझे काफी कम लगी जिसे कि शायद ये ट्यूशन पढ़ाता था , उसे अनुराग से प्यार हो गया या कह लें कि इस कच्ची उम्र का आकर्षण मगर अनुराग नें उसे भी बड़ी ही समझदारी और धैर्य के साथ समझाकर उसके घर वापिस भेज दिया । अब मुझे उस दिन रोमा द्वारा अनुराग को बेहद शरीफ़ कहे जाने का कारण बहुत अच्छी तरह से समझ में आ चुका था । अनुराग सचमुच एक अच्छा और सच्चा लड़का है , वो स्वार्थी , आवारा या मौकापरस्त तो बिल्कुल भी नहीं !

अनुराग यहाँ रहकर यूपीएससी की तैयारी कर रहा था तो वैसे तो वो सारा दिन अपने कमरे में ही रहकर पढ़ता रहता था मगर कभी - कभी शाम को जब वो कमरे से बाहर निकलता था तो कई बार सनी के साथ क्रिकेट खेला करता था और इसके अलावा मुझे ऊषा देवी नें बताया कि वो अक्सर दोपहर में भी उनके पास आकर बैठ जाता था और उनसे काफी बातें भी किया करता था । ऊषा देवी और सनी दोनों ही अब अनुराग से काफी घुलमिल गए थे और उसे काफी पसंद भी करने लगे थे । बस एक मैं ही थी जिससे कि अनुराग की बात सबसे कम होती थी या कहें कि बिल्कुल भी नहीं । वो बस महीने की एक तारीख को मुझे पैसे देने आता था और मैं चुपचाप ले लेती थी । हाँ कभी - कभी जब वो आतेजाते मेरे सामने पड़ जाता तो गुड मॉर्निंग या गुड ईवनिंग तो कभी - गुड नाईट भी हो जाया करती थी । कुल मिलाकर सबकुछ ठीक ही चल रहा था ।

फिर एक दिन मेरे स्कूल से मुझे इंटरनेशनल स्कूल मीट के लिए चुन लिया गया । हमारे स्कूल से सिर्फ दो ही टीचर्स का इसके लिए चुनाव किया गया , एक तो अंग्रेजी की टीचर मिस रोमा और दूसरी मैं ! वैसे मेरे लिए तो ये दोहरा अवसर था क्योंकि इस तरह से एक तो मुझे वहाँ अन्य देश के स्कूल की शिक्षापद्धति और उनकी नीतियों के विषय में जानने का सुअवसर प्राप्त हो रहा था और दूसरी ओर मैं इस बहाने पूजा और उसकी बेटी से भी मिल पाती जिसमें कि सबसे बड़ी बात ये होती कि इस तरह से मैं पूजा की शिकायत भी दूर कर पाती और उसकी बेटी के जन्मदिन में जाने से भी मैं बच जाती जो कि अगले दो महीने बाद ही था । मगर इसमें भी एक सबसे बड़ी दिक्कत मेरे लिए ये थी कि बच्चों को उस प्रोग्राम में जाने की अनुमति नहीं थी और सनी को मैंने आज तक कभी कहीं अकेले नहीं छोड़ा था । और एक बार को मैं उसे अकेले छोड़ भी देती तो फिर उसकी दादी जो कि खुद ही इतनी वृद्ध हैं और बीमार भी रहती हैं , वो उसे कैसे संभालतीं और सच कहूँ तो मैं उन्हें भी अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी। यही वजह थी कि मैं इतने सालों से पूजा के बुलावे को हर बार टालती आ रही थी । स्कूल में नामों की घोषणा होने पर सब लोग मुझे बधाईयाँ दे रहे थे और इन सबमें सनी ने भी मुझे 'कौन्ग्रेचूलेशन्स माँ ' कहकर बधाई दी क्योंकि शायद वो अभी तक इस बात से अंजान था कि ऑस्ट्रेलिया मुझे अकेले ही जाना होगा । रोमा तो बहुत ही ज्यादा बिल्कुल बच्चों की तरह उत्साहित थी और उसनें तो नामों की घोषणा होते ही ऑस्ट्रेलिया के सभी पब्स,बार और सारे विजिटिंग - प्लेसिस की लिस्ट भी बना ली थी।

मैं सारी रात उधेड़बुन में लगी रही और फिर सुबह होते-होते मैं ये निर्णय ले चुकी थी कि मैं आज अपना नाम वापिस ले लूंगी जबकि मैं ये अच्छी तरह से जानती थी कि इसका असर मुझपर आने वाले समय में अच्छा नहीं होगा पर मैं मजबूर थी ।

मैं सनी को लेकर घर से स्कूल के लिए निकल ही रही थी कि तभी अनुराग भी कहीं जाने के लिए तैयार होकर आ गया और फिर सनी ने उसे जिद्द करके हमारी कार में लिफ्ट दे दी । हालांकि अनुराग इस तरह से मेरी गाड़ी में बैठने के लिए कुछ असहज सा लग रहा था मगर सनी की जिद्द के आगे उसे मानना ही पड़ा। उसकी असहजता का कारण भी शायद मैं ही थी क्योंकि परिवार के अन्य सदस्यों की तरह मैं उससे कभी ज्यादा बातचीत नहीं करती थी । हाँ एक - दो बार उसनें ये कोशिश ज़रूर की थी मगर कभी मेरे पास समय की कमी तो कभी मेरा अंतर्मुखी स्वभाव उसके आड़े आ जाता था।

"आपको बहुत - बहुत बधाई हो", अनुराग ने मुझसे कहा । जिसको सुनकर पहले तो मैं हतप्रभ हो गई कि इसे तो मैंने कुछ बताया भी नहीं फिर किसने ? क्या सनी या फिर सनी की दादी ? मैं इसी विचार में खोयी हुई थी और इसलिए मैं उसकी बधाई का कोई उत्तर भी नहीं दे पायी । तभी वो एक बार फिर से बोल पड़ा...."रोमा जी ने मुझे बताया था कि आप दोनों इंटरनेशनल स्कूल मीट के लिए सिलेक्ट हुए हैं । कल ही मेरे पास उनका फोन आया था और आप यहाँ सनी और दादी जी की बिल्कुल भी चिंता मत करियेगा । आप मुझपर भरोसा रखिए और निश्चिंत होकर जाइये । यहाँ पर मैं हूँ न !" तभी ब्रेक लगने की आवाज से सब चौंक पड़े । दरअसल मेरा स्कूल आ गया था और इस वक्त मेरा मूड भी कुछ ठीक न होने के कारण मेरी गाड़ी का ब्रेक भी कुछ ज्यादा ही तेजी से लग गया था। इन बातों के चक्कर में वो मिस्टर होशियार अनुराग भी रास्ते में उतरना भूलकर मेरे और सनी के साथ सीधे स्कूल ही पहुंच गया ।

फिर न तो मैंने ही उससे कुछ कहा और न ही वो कुछ बोला और चुपचाप मेरी कार के रुकने पर उतरकर पीछे मुड़कर वापिस चला गया । स्कूल पहुंचने के बाद से ही मैं मौका तलाश रही थी कि मैं रोमा से बात कर लूँ कि आखिर उसने उस अनुराग को इतना हक भला कैसे दे दिया मगर मुझे उससे बात करने का मौका सीधे लंच - टाइम में ही मिल पाया ।

"अरे वाहह....आज तो मैडम नें एंट्री हीरो के साथ की थी !", रोमा की इस बात ने तो मानो आग में घी का ही काम कर दिया और मेरे गुस्से का ज्वालामुखी अब फूट पड़ा ... "क्या हीरो ? तेरे लिए होगा वो हीरो मगर मेरे लिए बस वो मेरे घर में किराए से रहने वाला एक लड़का है , समझी ! और रोमा तूने उससे मेरी फैमिली के लिए फेवर क्यों माँगा , हाँ ? ? ? अरे मानती हूँ कि वो एक अच्छा और शरीफ़ लड़का है मगर इसका ये मतलब तो बिल्कुल भी नहीं न कि मैं उसपर अपने छोटे से बच्चे और उसकी बूढ़ी , बीमार दादी को छोड़कर चली जाऊँ ?", मैं इतना कहते - कहते हाँफने लग गई ! !

जिसपर रोमा एक भरा हुआ पानी का ग्लास मेरी ओर बढ़ाते हुए बोली कि "ले यार, पानी पी तू पहले और रिलैक्स कर ! देख यार मैं तेरी परिस्थितियों को बहुत ही अच्छे से समझती और जानती हूँ बस इसीलिए मुझे अनु से बात करनी पड़ी क्योंकि मैं जानती हूँ कि तू इस अपॉर्चुनिटी से साफ इंकार कर देने वाली है और मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहती डियर ! इसके भी दो कारण हैं , एक तो मैं तेरे अलावा किसी और के साथ जाना नहीं चाहती और दूसरा ये कि तू भी इस बहाने अपने इस संकुचित दायरे से निकल पायेगी । देख मुझे बहुत अच्छे से पता है कि तेरे पति समीर के जाने के बाद तूने खुद को किस कदर कैद कर रखा है । तू सिर्फ और सिर्फ दूसरों के लिए ही जी रही है और यहाँ तक कि तू हंसती भी दूसरों की खुशी के लिए ही है । बाकी बात रही अनु की तो उसकी गारंटी मैं लेती हूँ बस इससे ज्यादा मैं इस विषय में तुझसे और कुछ नहीं कह सकती । बट ये फाइनल है कि हम दोनों ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं ।", कहते हुए रोमा स्टाफरूम से बाहर निकल गई। आज मैं अपना नाम वापिस नहीं ले पायी । मैंने सोचा कि मैं कल ज़रूर अपना नाम वापिस ले लूंगी और उसके बाद रोमा को तो मैं धीरे - धीरे जैसेतैसे करके मना ही लूंगी ।

घर पहुंचते ही मुझे अपने दरवाज़े पर ही सुशीला आँटी मिल गयीं और उन्होंने मुझे घबराते हुए बताया कि आज मेरे घर में डॉक्टर आया था और ऊषा देवी को न जाने क्या हो गया था ! उनकी बात सुनते ही मैं दौड़कर ऊषा देवी के पास पहुँची और जब मैंने देखा कि वो तो हंसते हुए अनुराग से बातें कर रही हैं और अनुराग उन्हें संतरा छील- छीलकर खिला रहा है तो मैं समझ ही नहीं पायी कि ये जो मेरी आँखों के सामने है ये सच है या फिर जो मुझे अभी - अभी बाहर मिली सुशीला आँटी ने बताया वो सच था ? तभी अनुराग जो कि ऊषा देवी को चुटकुलें सुनाकर हंसा रहा था , उठ खड़ा हुआ जिसपर ऊषा देवी ने अपने हाथ से उसे वापिस से बैठने का इशारा किया और बोलीं कि आज मेरी तबियत खराब हो गई थी तो इस बच्चे ने मेरी बहुत मदद की । इसने मुझे दवा दी और फिर मेरे मना करने पर भी फोन करके डॉक्टर त्रिपाठी जी को बुला लिया ।

"क्या हुआ इन्हें ?", मैंने घबराकर अनुराग की तरफ़ देखते हुए पूछा तो उसनें बड़ी ही सहजता से बताया कि... "कुछ नहीं बस दादी जी का ज़रा सा बीपी बढ़ गया था तो मैंने इनका बीपी माँपकर इन्हें दवा दे दी । वो दरअसल मेरी मम्मी को भी सेम यही प्रॉब्लम है तो मुझे इस बारे में पता है सबकुछ । बाकी डॉक्टर साहब को तो मैंने बस इसलिए बुलाया था कि दादी जी का एक बार पूरा चैकअप करवा लूँ और हाँ मैंने लैब वाले को बुलाकर इनका ब्लड - सैंपल भी दे दिया है ताकि इनका फुल बॉडी चैकअप हो सके जिसकी रिपोर्ट आज रात में ही आ जायेगी और फिर आप बेफ्रिक होकर ऑस्ट्रेलिया जा सकती हैं ।", मैं इस पर कुछ कह पाती उससे पहले ही ऊषा देवी जी बोल पड़ीं ... हाँ, हाँ सुमन बेटी तुम आराम से जाओ और फिर तीन-चार दिनों की ही तो बात है । बाकी इसी बहाने तू पूजा से भी तो मिल लेगी वरना तो मुझे छोड़कर कभी तू जाने से रही ।

मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मैं क्या करूँ और तभी सनी ने मुझसे कहा कि मुझे ज़रूर जाना चाहिए और वो अपना और दादी का ख्याल रख लेगा क्योंकि अब वो बड़ा हो गया है न ! उसकी मासूम बातें मुझे आज फिर से एक बार बहुत ही प्रोत्साहित कर गयीं । क्या सचमुच मेरा बेटा अब इतना बड़ा हो गया है कि वो अपनी माँ की उलझन एक ही पल में सुलझाने लगा है ।

"माँ मुझे रोमा मैम नें बताया है कि दिस इज़ ए गोल्डेन अपॉर्चुनिटी फॉर यू !", सनी नें एक बार फिर मुझसे मुस्कुराकर कहा ।

अगले दिन मैंने प्रिंसिपल मैम को अपना जवाब हाँ में दे दिया ।

धीरे - धीरे ऑस्ट्रेलिया जाने की तारीख भी आ गई और फिर बड़े ही बेचैन और भारी मन से मैंने सनी और उसकी दादी समेत अनुराग को ढ़ेर सारी हिदायतों के साथ अलविदा कहा । ऑस्ट्रेलिया आने - जाने का पूरा खर्चा स्कूल वालों ने ही उठाया और पासपोर्ट - वीजा वगैरह का इंतजाम भी उन्हीं लोगों नें हमें करके दिया था । मैंने पूजा और उसकी बेटी के लिए ढ़ेर सारे तोहफ़े खरीद लिए थे । ऑस्ट्रेलिया पहुंचकर मैं और रोमा इतने व्यस्त रहे कि रोमा बेचारी की विजिटिंग - प्लेसिस वाली लिस्ट तो धरी की धरी ही रह गई बाकी मैं भी पूजा से बस एक ही दिन मिल पायी । रोमा भी मेरे साथ ही थी। हम दोपहर में पूजा के घर पहुंच गए थे और फिर रात में डिनर करके ही वापिस आये मगर पूजा तो इतने पर भी बहुत नाराज हुई क्योंकि जब मैंने उसे बताया था कि मैं ऑस्ट्रेलिया आ रही हूँ तो उसे लगा कि मैं पूरे चार दिन उसी के पास रुकूँगी मगर हम लोगों को स्कूल के द्वारा उपलब्ध कराये गए गेस्टहाऊस में ही रुकने की अनुमति थी तो हम चाहकर भी बाहर कहीं और नहीं रुक सकते थे । पूजा की बेटी बिल्कुल आलोक की शक्ल पर गई थी और वो बहुत प्यारी भी थी । आलोक नें हम लोगों को अपनी कई गज़लें और कविताएं सुनायीं और उसनें ये भी बताया कि वहाँ का कोई भारतीय पब्लिकेशन जो कि उसके ही किसी डॉक्टर मित्र के बड़े भाई का है , वो उसकी गज़लों और कविताओं की दो किताबें भी छाप रहा है जिसपर रोमा नें उसे उन किताबों को डाक से भारत भेजने की भी बात कर ली । उफ्फ... रोमा का बेबाकपन यहाँ पूजा को कुछ खल सा रहा था जिसे मैं बहुत जल्दी ही भांप गई ।

मैंने पूजा को अकेले में लेजाकर समझाया भी कि रोमा बस एक स्वतंत्र विचारों की महिला है बाकी वो गलत बिल्कुल भी नहीं है पर इस बात के जवाब में पूजा ने मुझसे कहा कि वो ऐसी औरतों को बहुत अच्छे से जानती है जो खुद का घर तो कभी बसाती नहीं हैं और दूसरों के बसे- बसाए घरों को उजाड़ने की फ़िराक में ही घूमती रहती हैं बस ! मुझे पूजा का ये तरीका बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा । शायद इतने सालों में वो काफी बदल चुकी थी । पूजा का वो सकारात्मक पहलू जिसे मैं जानती थी और जिससे मेरी दोस्ती थी, वो तो इस बार मुझे उसमें कहीं बिल्कुल भी दिखा ही नहीं !

इन चार दिनों में मैंने अनगिनत बार सनी और उसकी दादी से वीडियो कॉल पर बात की और दो - चार बार तो मैंने उन सबका हालचाल अनुराग को फोन करके भी पूछा ।

चार दिन बीत गए और हम भारत वापिस आ गए । जैसे ही मैं घर पहुँची सनी मुझसे लिपटकर रोने लगा और उसे रोता हुआ देखकर मेरी आँखें भी नम हो गयीं! फिर मैंने सनी से वादा किया कि अब मैं उसे ऐसे अकेला छोड़कर कभी भी नहीं जाऊँगी । मैंने जब ऊषा देवी की तरफ़ देखा तो उनकी आँखें भी नम थीं । अनुराग भी उस वक्त वहीं मौजूद था । बाद में मुझे पता चला कि मेरे जाने के दूसरे दिन ही सनी को तेज बुखार हो गया था और अनुराग नें उसकी दिन-रात सेवा की ! डॉक्टर को दिखाना , समय से दवा और खाना - पीना देना और हाँ रातभर उसके माथे पर ठंडी पट्टियाँ भी रखना। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किन शब्दों में अनुराग का शुक्रिया अदा करूँ और सबसे बड़ी बात कि उसनें मुझे किसी भी कॉल या वीडियो कॉल तक पर भी ये पता नहीं चलने दिया बस ये सोचकर कि मैं परेशान न हो जाऊँ ! आखिर कौन करता है आजकल किसी और की परेशानी की इतनी परवाह ! मेरे दिल से आज अनुराग के लिए बस दुआएँ ही निकल रही थीं , ढेर सारी दुआएँ ! दिल कह रहा था कि वो जो भी चाहे, हे भगवान उसे मिल जाये !

अनुराग दिन - रात बस अपनी पढ़ाई में ही लगा रहता था मगर कहते हैं न कि मेहनत के साथ ही साथ हमारी सफलता में हमारी किस्मत का भी बहुत बड़ा योगदान होता है और शायद अनुराग की किस्मत उसकी मेहनत में अपना ये बड़ा योगदान करना इस बार भूल गई और वो यूपीएससी की प्री परीक्षा में ही क्लियर नहीं कर पाया ।

क्रमशः...

लेखिका...
💐निशा शर्मा💐