Apna Aakash - 33 in Hindi Moral Stories by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | अपना आकाश - 33 - चलूँगी, ज़रूर चलूँगी

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अपना आकाश - 33 - चलूँगी, ज़रूर चलूँगी

अनुच्छेद- 35
चलूँगी, ज़रूर चलूँगी

विकल्प डेयरी का काम चल निकला। अंगद, नन्दू, तन्नी ही नहीं सभी स्त्री-पुरुष डेयरीमय हो गए। सभी ने दूधारू गाय भैसों के दाना पानी पर ध्यान देना शुरू किया। दूध का उत्पादन बढ़ा इक्यावन लीटर दूध से प्रारम्भ डेयरी एक महीने बाद ही उन्हीं जानवरों से सत्तर लीटर की आपूर्ति करने लगी। पुरवे के लोगों के चेहरे दिप दिप करने लगे। उनके अन्दर इस डेयरी ने एक सपना उगा दिया है। सपनों के होने से ही जीवन में कितना फर्क पड़ जाता हैं? डेयरी के काम-काज की समीक्षा के लिए आज अंगद -तन्नी ने एक बैठक बुलाई। माँ अंजलीधर विपिन के साथ पहुँचीं । कान्ति भाई भी अपनी साइकिल चलाते हुए आ गए। गाँव के बूढ़े, बच्चे, जवान सभी प्रसन्न । महिलाएँ भी इकट्ठी हुईं।
माँ जी की अध्यक्षता में बैठक शुरू हुई। अंगद ने महीने भर की आमदनी और खर्च का ब्योरा पेश किया। बचत तो अधिक नहीं थी पर सभी परिवारों की सहभागिता महत्त्वपूर्ण थी। 'डेयरी का काम चलना चाहिए न ?' माँ जी ने सभी से पूछा । 'हाँ', एक स्वर से सभी ने हुँकारी भरी। माँ प्रसन्न हुई । बोली, 'डेयरी ने एक आशा बँधाई है। आप सब के चेहरे इसकी गवाही दे रहे हैं। यह कार्य दिनोदिन बढ़े। मेरी इच्छा है कि अगले कुछ महीनों में अँचार बनाने का काम भी शुरू किया जाए।' माँ जी के इतना कहते ही तालियाँ बज उठीं। महिलाएँ बहुत खुश हुईं।
'मैं जो कह रही हूँ क्या वह तुम लोगों की समझ से भी उचित लगता है ?’ माँ जी ने पूछा । 'बिल्कुल उचित लगता है।' सभी ने एक स्वर से कहा 'तब ठीक है। हम लोग फिर इस पर बैठक करेंगे।' माँ जी के बाद कान्ति भाई खड़े हुए। गद्गद् । कहा, 'माँ जी इस पुरवे के साथ जिस गहराई से जुड़ी हैं उससे हम सभी को दिशा मिल रही है। यह पुरवा निश्चित रूप से एक विकल्प प्रस्तुत करेगा। हम लोग अपनी पूरी ताकत से इसमें लगेंगे तो गाँव का विकास निश्चित रूप से होगा। भाई मंगल के मामले में भी हम लोग आगे बढ़ रहे हैं । छानबीन हो रही है। सही बात एक न एक दिन सामने आएगी ही। माँ जी का अँचार बनाने का नया प्रस्ताव पुरवे को और आगे ले जाएगा।' कान्ति भाई ने जैसे ही अपनी बात खत्म की, तन्नी माँ जी द्वारा लाए लड्डू बाँटने लगी। माँ जी जब भी पुरवे की बैठक में शामिल होती कुछ न कुछ प्रसाद के लिए जरूर ले जातीं।
'तरन्ती की शादी का क्या हुआ?" माँ जी ने तन्नी से पूछा ।
'फागुन में होगी माँ जी।' तन्नी ने उत्तर दिया ।
'ठीक है', माँ जी का दिमाग चलता रहा।
बैठक खत्म होते ही नन्दू, तन्नी, अंगद ही नहीं सभी नर-नारी बच्चे माँ जी, विपिन और कान्तिभाई के निकट आकर आत्मीयता प्रकट करते रहे। माँ जी सभी से स्नेह पूर्वक हाल चाल पूछती रहीं । भँवरी को वहाँ न देखकर माँ जी ने तन्नी से पूछा, 'तेरी माँ नही दिख रही हैं तन्नी ।'
'वे घर ही रह गईं। भैंस को चारा-पानी देना था इसीलिए।' तन्नी ने बताया ।
'चलो, उनसे भी मिल लेते हैं। माँ जी चल पड़ीं।
साथ में कान्ति भाई, विपिन, अंगद तथा गाँव के लोग ।
माँ जी को देखते ही भँवरी आगे बढ़ीं और आँचल के खूंट से चरण स्पर्श किया। माँ जी देर तक सिर पर हाथ रख आशीष देती रहीं। गाँव के लोगों के चेहरों पर प्रसन्नता के भाव दिखते हैं। भँवरी भी उस उल्लास में सम्मिलित होती है पर मंगल की याद आते ही उसका चेहरा उदास हो जाता। घंटों उदासी से वह उबर नहीं पाती। माँ जी को देखते ही भँवरी का चेहरा उल्लास से भर जाता है।
माँ जी ने भँवरी का हाल चाल पूछा।
वीरेश की पढ़ाई के बारे में जानकारी ली।
गाँव की औरतों को स्नेह भरी दृष्टि से देखा ।
जैसे एक जलते हुए दीपक से दूसरे दीपकों को जलाया जाता है वैसे ही सभी के चेहरे दीप्त हो उठे।
माँ जी उठीं और सभी से राम राम करती विपिन की मोटरसाइकिल पर बैठ गई। कान्ति भाई भी अपनी साइकिल पर बैठ और राम जुहार करते चल पड़े।
माँ जी द्वारा अँचार बनाने का सुझाव आने पर महिलाएँ बहुत खुश हुईं। उन्हें लगा कि सभी महिलाएँ इससे कुछ कमाने की स्थिति में हो जाएँगी। महिलाएँ तन्नी, अंगद, नन्दू से पूछतीं, 'अँचार बनना कब शुरू होगा?' जल्दी ही इसे शुरू किया जाएगा।' तीनों बताते। अंगद ने एक बैठक बुलाई। तन्नी, नन्दू सहित पुरवे के लोगों ने विचार किया। कौन सा अँचार बनाया जाए ? खपत कहाँ होगी? लोगों को प्रशिक्षण कैसे दिलाया जाए? इन पर चर्चा हुई। माँ जी से बात कर इस पर और जानकारी इकट्ठी करनी होगी। कहीं ऐसा न हो कि अँचार को हम बेच ही न पाएँ। सभी बातों पर अच्छी तरह विचार करके ही काम को हाथ में लेना होगा। महिलाएँ नित्य पूछतीं । अंगद, नन्दू और तन्नी माँ जी के यहाँ पहुँचे। अँचार बनाने के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा हुई। सहमति बनी कि बाज़ार का अध्ययन करके ही कोई कदम उठाया जाए। 'बाज़ार का अध्ययन करने के लिए भी कुछ खर्चे की जरूरत पड़ेगी ।
डेयरी की आय से यह खर्च न किया जाए अन्यथा डेयरी का काम प्रभावित होगा। इस खर्चे को मैं वहन करूँगी। मेरे खाते में कुछ पैसे पड़े हैं।" माँ अंजलीधर ने तीनों में साहस का संचार करते हुए कहा ।
'डेयरी का काम पूरी निष्ठा से हो।' माँ जी ने अंगद को सचेत किया। 'ठीक है माँ जी। डेयरी के काम में कोई ढिलाई नहीं होगी।' अंगद ने आश्वस्त किया।
“विपिन, कान्तिभाई को मैं बाज़ार के अध्ययन में लगाऊँगी। तुम लोगों को भी जो समय मिलेगा उसमें यह काम करना होगा। खर्च मेरे ज़िम्मे रहेगा। मैंने कुछ सोचकर ही अँचार बनाने का सुझाव दिया है। इससे सभी महिलाएँ आत्मनिर्भर हो सकेंगी। माँ जी प्रसन्न मन से बोलती रहीं।
तन्नी ने चार प्याली चाय बनाई। चारों चाय पीने लगे।
माँ जी पुरवे के विकास के बारे में बात करती हुई पूछ बैठीं।
'बैंक से मंगल ने जो कर्ज लिया था उसके लिए क्या करना होगा?"
'फसली ऋण को साल के अन्दर ही देना होगा।
इंजन के कर्ज को किस्तों में देने की छूट है।' अंगद ने कहा।
'हूँ' करते हुए माँ जी सोचने लगीं।
'माँ जी सोचती हूँ दस बिस्वा जमीन बेच कर कर्ज अदा कर दूँ।' चाय का एक घूँट पीते हुए तन्नी ने कहा । ' नहीं बेटे ज़मीन बेचने की ज़रूरत नहीं है।' माँ जी ने चाय खत्म करते हुए कहा ।
'बारह कुन्तल धान पैदा हुआ है माँ जी उसमें नौ कुन्तल बेच कर बैंक में जमा कर दिया जाय।' तन्नी ने प्रस्ताव रखा।
'पर घर का खर्च?" माँ जी ने पूछ लिया।
'अंगद चाचा ने भैस के बदले दुधारू गाय खरीदवा दी है। पाँच लीटर दूध देती है वह। तीन लीटर डेयरी में चला जाता है। इससे घर का खर्च चल जाएगा।' तन्नी ने बताया ।
माँ जी ने अंगद की ओर देखा ।
'तन्नी ठीक कहती है माँ जी धान बेच कर बैंक में जमा कर दिया जाय।
जो बचा रहेगा वह रबी की फसल उगाकर दिया जायगा',
अंगद बताते रहे ।
'ठीक है। इससे भी सावधानीपूर्वक निपटना होगा।'
माँ जी ने कुछ सोचते हुए कहा।
'तरन्ती की शादी की तारीख तय करना है।' माँ जी ने कहा।
'माँ जी उसमें भी कुछ.....।' अंगद के कहते ही माँ जी बोल पड़ीं, 'क्या कर पाऊँगी अभी बहुत स्पष्ट नहीं हैं। पर कुछ तो करूँगी ही।'
'आपके बिना पुरवे का कोई काम संभव नहीं है माँ जी ।' अंगद कुछ उत्साह में! ‘ऐसा नहीं कहते, भाई। मेरे न रहने पर भी पुरवा आगे बढ़े हमें इस तरह की स्थिति बनानी है। तन्नी ज़रा देखकर बताओ कितनी महिलाएँ लिख पढ़ नहीं पातीं। क्या कोई बच्चा ऐसा भी है जो स्कूल नहीं जाता। यदि ऐसा बच्चा है तो उसका स्कूल न जाने का कारण क्या हैं?" कहते हुए माँ जी ने एक डायरी तन्नी को पकड़ा दी। 'ठीक है माँ जी। दो-तीन दिन में इस काम को पूरा कर लूँगी।' तन्नी चारों खाली प्यालों को उठाकर अन्दर ले गई। साफ करके रख दिया। 'नन्दू, तेरे सपनों का गाँव बनेगा।' माँ जी ने मुस्कराते हुए कहा।
अंगद और नन्दू भी प्रसन्न हुए। नन्दू बोल पड़ा, 'माँ आपकी कृपा का फल है ।'
‘नहीं, नहीं माँ जी को इतना न चढ़ाओ। तुम लोगों के सपने, कर्मठता ही गाँव को आगे ले जाएँगे। मैं तो चन्द दिनों की मेहमान हूँ' कहकर माँ खिलखिला पड़ीं। उनकी यह स्वाभाविक खिलखिलाहट कितनों को ही जीवन दान दे चुकी है।
'माँ जी, गाँव को आपसे बहुत आशा है।' नन्दू की आँखों में उल्लास की जगमगाहट दिखी।
'हमारी दौड़ तो आप ही तक है। आज चल रहे है माँ जी। बाज़ार से हम लोग भी पता करेंगे।'
कहकर अंगद उठ पड़े, नन्दू, तन्नी भी। माँ जी को प्रणाम किया।
'मैं भी लगूँगी। जानकारी करूँगी। माँ जी भी आशीष देते हुए उठ पड़ीं।
मानवाधिकार आयोग ने वंशीधर का उत्तर पाने के बाद छानबीन की। प्रथम दृष्ट्या वंशीधर तथा दरोगा निरंजन प्रसाद को दोषी मानते हुए सी.बी. आई से जाँच की संस्तुति की। वंशीधर को पता चला। सत्ता में बैठे अपने लोगों से सम्पर्क साधा। मानवाधिकार आयोग की संस्तुति उन्हें तंग करती रही । फाइल को दबवा देना होगा, सोचते हुए आज सुबह वंशीधर ने चाय का एक घूँट पिया। मन उदास था । खिन्नता के कारण मुँह का स्वाद बिगड़ा हुआ था। चाय इसीलिए बेस्वाद लगी।
वे उठकर कमरे में टहलते हुए सोचते रहे। यहाँ नौगढ़, चन्दौली रहते पैरवी करना मुश्किल होगा। उनका नाम उपाधीक्षक की सूची में शामिल हो गया था। दो महीने में उन्हें उपाधीक्षक का पद मिलने वाला है। ऐसे में मानवाधिकार की यह संस्तुति । आठ वर्ष सेवा और है। हर कीमत पर इस संस्तुति को आठ वर्ष के लिए जमीदोज़ कराना ही होगा। उन्होंने निरंजन प्रसाद को फोन मिलाया। उनका स्थानान्तरण फतेहपुर हो गया था।
'प्रणाम सर ।' उधर से आवाज़ आई ।
'मानवाधिकार आयोग पीछे पड़ा है, जानते हो'
'हाँ सर' ।
"कुछ करना पड़ेगा इसके लिए।'
'जी सर ।'
'फिर बात करेंगे।' कहते हुए वंशीधर ने फोन बंद किया।
वंशीधर को सफलता मिल ही गई। वे उपाधीक्षक पद पर प्रोन्नत हो गए। उन्होंने बहराइच में अपने को स्थानान्तरित करा लिया। कहा जा रहा है कि मंत्री से सीधे उनका संपर्क हुआ। ब्रीफकेस के साथ वे उपस्थित हुए। क्या था उसमें? यह तो वही जानते होंगे।
बहराइच पहुँचते ही उन्होंने अपना जाल फैलाना शुरू कर दिया। भँवरी, तन्नी, नन्दू, हरवंश उनके दिमाग में हर समय चढ़े रहते। आखिर इन्हीं के प्रार्थनापत्र पर मानवाधिकार आयोग ताल ठोंक रहा है। ये न दौड़ेंगे तो.....।
तन्नी, अंगद और नन्दू माँ जी के यहाँ पहुँचे। माँ अंजलीधर बैठक में आ गई। तन्नी ने कहा, 'बेटी चाय बनाओ।' तन्नी अन्दर जा कर चाय बनाने लगी। उसी समय कान्तिभाई और विपिन भी आ गए। जब भी कोई विचार-विमर्श करना होता पाँचों लोग माँ जी के यहाँ उपस्थित होते ।
'माँ जी आपने देखा राज्य में सैकड़ों नौकरशाह अरबपति हो चुके हैं और तीन सौ से ज्यादा बाबू भी करोड़पति ।' कान्तिभाई ने अखबार माँ जी के सामने रख दिया।
"पर कान्ति भाई यह भी तो देखना होगा की आधी से ज्यादा आबादी बीस रुपये से कम पर गुज़र कर रही है।’ माँ जी ने अखबार उठाते हुए कहा । "अम्मा, अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है।' विपिन ने ध्यान दिलाया।
'ठीक कहते हो विपिन । आगे हमारी दिशा क्या होगी कान्तिभाई?"
'सरकारों की दृष्टि तो बदल गई है। अब जनता से ही कोई आशा की जा सकती है।' कान्तिभाई कुछ चिंतित दिखे।
'जनता के बीच से जब तक जुझारू और दृष्टि सम्पन्न नेतृत्व नहीं उभरता......।' विपिन बोल पड़े।
अंगद और नन्दू इस बातचीत का मर्म समझने का प्रयास करते रहे। इसी बीच तन्नी एक ट्रे में चाय लेकर आ गई।
‘तो तन्नी रसोई सँभाल रही थीं।' विपिन ने मुस्कराते हुए टिप्पणी की। सभी हँस पड़े।
'अच्छा चाय पियो' माँ जी ने एक प्याला उठा लिया। तन्नी भी बैठ गई। सभी चाय पीने लगे।
'चाय का भी दाम बहुत बढ़ गया है माँ जी।' अंगद बोल पड़े।
'चीनी और दाल ?' नन्दू ने ध्यान दिलाया।
'सभी चीजों का दाम बढ़ रहा है।' कान्तिभाई ने चाय पीते हुए कहा।
'क्या हम लोग दूध का दाम बढ़ा सकते हैं? दाना, चूनी खली सभी का दाम बढ़ गया है।' अंगद ने प्रश्न रखा।
"क्या किया जाए?' माँ जी ने कान्ति भाई से पूछा ।
'अभी हम लोगों को डेयरी का काम शुरू किए पाँच ही महीने हुए हैं। इतनी जल्दी दाम बढ़ाने से ग्राहकों का विश्वास पाने में कठिनाई होगी।'
'क्यों अंगद भाई? कान्तिभाई के विचार संगत लग रहे हैं। ग्राहकों का विश्वास पाना तो ज़रूरी है।'
'हाँ, माँ जी।'
'तब, अभी दाम न बढ़ाओ। यही अच्छा रहेगा। क्यों नन्दू ?"
"ठीक है माँ जी। अभी हमें और प्रतीक्षा करनी चाहिए।'
'कान्तिभाई, अँचार की बिक्री के क्षेत्रों का कुछ पता चला?"
"हाँ माँ जी, हमने इस शहर का सर्वे किया है। छोटे बड़े 157 होटल, ढाबे हैं जहाँ कुल पन्द्रह - सोलह कुन्तल प्रति माह की खपत होती है।'
पर इसमें सेंध लगाने के लिए अपना अँचार बहुत अच्छा होना चाहिए।' विपिन ने जोड़ दिया।
'अँचार अपना प्राकृतिक ढंग से तैयार किया जाएगा। इसीलिए श्रेष्ठ तो होगा ही।' माँ जी आश्वस्त दिखीं।
'एक लाख की आबादी का शहर है। कुछ घरों में भी बिक सकता है।' विपिन ने संकेत किया।
‘हाॅं कुछ बिकेगा । पर मध्यवर्ग और उच्चमध्य वर्ग में ही ।' कान्तिभाई अपने सर्वेक्षण का खुलासा करते रहे।
"अभी अपने अध्ययन को जारी रखा जाए। किस तरह के अंचार पसन्द किए जाते हैं? लागत और लाभ का सम्बन्ध क्या है?"
'हाँ, ठीक है माँ जी। सोच समझकर ही कदम रखना होगा।' कान्तिभाई सहमत दिखे।
'तन्नी, तुमने बच्चों और महिलाओं के सम्बन्ध में जानकारी की?"
'हाँ माँ जी, सात बच्चे प्राइमरी स्कूल में नहीं जा रहे थे। उन्हें स्कूल में भेजा जाने लगा है। महिलाओं में इकतालीस जरूर ऐसी हैं जिन्हें साक्षर करने की ज़रूरत है।'
'अंगद भाई, इन महिलाओं को भी शिक्षित करना होगा।
मैं आकर इन्हें प्रोत्साहित करूँगी।' 'ठीक है माँ जी, हम लोग इसमें जुटेंगे।' अंगद ने माँ जी को आश्वस्त किया।
'अम्मा, मुझे आज्ञा दीजिए एक गोष्ठी में भाग लेना है।'
'जाओ', माँ जी ने कहा। विपिन चला गया।
'तन्नी, तरन्ती की शादी की तारीख तय करना है', माँ जी ने हँसते हुए कहा ।
माँ जी के दिमाग में कोई योजना चल रही है सभी ने अनुभव किया। 'आपको शादी में चलना होगा।' अंगद ने जैसे ही कहा माँ जी खिलखिला पड़ीं, 'चलूँगी, जरूर चलूंगी।' उनका चेहरा और खिल गया।
कौन जानता था कि माँ जी ही कर्ता-धर्ता होंगी?