Wajood - 22 in Hindi Fiction Stories by prashant sharma ashk books and stories PDF | वजूद - 22

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वजूद - 22

भाग 22

थोड़ी ही देर में कुसुम एक पोटली लेकर आई और शंकर की पीठ को सेंकने लगी। ज्यादा गर्म तो नहीं है ना शंकर ? कुसुम ने पूछा।

नहीं भाभी ठीक है आराम मिल रहा है। शंकर ने जवाब दिया।

हां इसलिए तो सेंक रही हूं।

वैसे तुम्हें बुखार भी है। कुसुम ने चिंता जाहिर करते हुए कहा।

हां भाभी दर्द के कारण कुछ बुखार आ गया है। शंकर ने फिर जवाब दिया।

ये कुछ नहीं है शंकर, यह बहुत तेज बुखार है।

अब तुम एक काम करो आंखें बंद करके लेट जाओ, मैं ठंडे पानी की पट्टी तुम्हारे सिर पर रख देती हूं ताकि यह बुखार उतर जाए। कुसुम ने कहा।

नहीं भाभी अब आप भी आराम करो। मैं सुबह तक ठीक हो जाउंगा। शंकर ने कुसुम से कहा।

अपने आप कैसे ठीक हो जाओगे ? मैं पट्टी रखती हूं तुम चुपचाप लेटे रहो। कुसुम ने फिर कहा।

पर भाभी....

कहा ना चुपचाप लेट जाओ। अपनी भाभी की बात नहीं मानोगे। इस बार कुसुम ने शंकर को डांट लगाते हुए कहा।

इस बीच हरी में कमरे में आ जाता है। अब कैसी तबीयत है इसकी ? हरी ने कुसुम से पूछा।

बुखार है और दर्द भी हो रहा है। मैंने सेंक तो कर दिया है अब बुखार के सिर पर पट्टी रखूंगी। पर जनाब का कहना है कि मैं जाकर आराम करूं। कुसुम ने हरी की बात का जवाब देते हुए कहा।

देवर भाभी के बीच में मैं नहीं आना चाहता। मैं सोने जा रहा हूं, मुझे सुबह खेत पर पानी देने के लिए जाना है। हरी ने कहा।

हां आप सो जाओ मैं अपने बेटे के पास ही रहूंगी। कुसुम ने कहा।

भाभी आप भी आराम कर लो। मैं सुबह तक ठीक हो जाउंगा। शंकर ने फिर कुसुम से कहा।

अब अगर बोलेगा तो मार खाएगा। कुसुम ने फिर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा।

अब तुम चुपचान आंखें बंद करो और सो जाओ। मैं यही हूं। कुछ भी चाहिए तो मुझे बोल देना। कुसुम ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा। अब शंकर ने अपनी आंखे बंद कर ली थी और कुसुम उसके सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखती रही और फिर बदलती रही। पूरी रात कुसुम शंकर का ध्यान रखती रही। सुबह उठकर फिर अपने काम में लग गई। तबीयत ठीक न होने के कारण शंकर कुछ लेट उठा था। वह उठकर बाहर आया तो कुसुम गाय को चारा डाल रही थी। कुसुम ने उसे देखा और फिर उसके पास आई और सिर पर हाथ रखकर देखा उसका बुखार उतर चुका था।

चलो बुखार उतर चुका है अब दर्द कैसा है ? कुसुम ने शंकर से पूछा।

अब काफी कम हो गया है भाभी। पर आप रात भर नहीं सोई।

हां तो क्या हो गया। आज तुम्हारे भैया दिन में नहीं आएंगे। सुबह ही खाना बनाकर दे दिया था। अब सारा काम खत्म हो गया है तो अभी थोड़ा आराम कर लूंगी। तुम एक काम करो हाथ मुंह धो लो। मैं तुम्हारे लिए चाय बना देती हूं। कुसूम ने शंकर से कहा।

नहीं भाभी अब आप आराम कर लो। मैं खुद चाय बना लूंगा। जब भूख लगेगी तो खाना भी खा लूंगा। आप बस आराम करो अब। पूरी रात हो गई है और सुबह से फिर काम में जुट गई हो। शंकर ने कहा।

ठीक है। कुसुम ने कहा और फिर अपने कमरे में चली गई।

हॉस्पिटल में बेड पर लेटे शंकर की आंखों में अब आंसू आ गए थे। उसे याद आ रहा था कि उसकी एक चोट में उसकी भाभी ने उसका कितना ध्यान रखा था। आज अगर वो उसकी यह हालत देखती तो कितना परेशान हो जाती है। शंकर कुसुम को याद कर रो पड़ा था। इसी बीच डॉक्टर वहां आ गया। उसने शंकर को रोते हुए देखा तो उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा- देखो जो तुम्हारे साथ हुआ है वो बहुत बुरा हुआ है। इंस्पेक्टर ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया है। पर तुम यूं ही जिंदगी से नहीं हार सकते हो। मानता हूं कि तुम्हारे जीने की कोई वजह नहीं है पर तुम फिर से अपना जीवन शुरू कर सकते हो। अभी जवान हो, शादी करो, अपना परिवार बनाओ, उनके साथ पूरी जिंदगी हंसी खुशी के साथ जीयो। गांव के लोगों की जितनी मदद तुमने करना थी कर ली है अब अपनी मदद खुद करो और फिर से अपना जीवन शुरू करो। मैं सिर्फ दवा दे सकता हूं, तुम्हारे अंदर जीने की जो ख्वाहिश होना चाहिए उसे मैं नहीं जगा सकता हूं। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि अब तक तुम दूसरों के लिए जीते आए हो अब एक बार खुद के जीना शुरू करो। शंकर सिर्फ डॉक्टर की बात सुन रहा था। डॉक्टर ने उसका चेकअप किया और एक बार उसके हाथ दबाते हुए वहां से चला गया। अब शंकर सो चुका था।

करीब 15 दिन और बीत गए थे। इंस्पेक्टर अविनाश रोज शंकर से मिलने के लिए आता था। उसके दिल में शंकर के लिए हमदर्दी थी। हालांकि इन 15 दिनों में शंकर की हालत में कुछ सुधार भी आया था। अब वह चलने फिरने लगा था। उसे जो कमजोरी थी वह भी धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।

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