जिन्नात की दुल्हन -14

 

बहोत ही शातिर दिमाग पाया था उसने..!
गुलशन को उपर के एक कमरे मे धर दबोचा.!
खलिल की अम्मीके  शरीर का सहारा लेकर सुलतान को ध्वस्त करने उसने अपनी चाल चली थी!
एन वक्त पर खलिल के सामने सुलतान प्रकट न हुआ होता तो जरुर जिन्नात कामियाब हो जाता!
अपनी बाजी पलटते देख कर वो क्रोधित हो उठा!
वैसे जिन्नात दुगनी चाल चल रहा था!
अपनी वैशी ताकत और दरिंदगी के आगे दोनो बाप बेटे को घूटने टेकने पर मजबूर कर देगा!
ऐसे ख्याल से बार-बार चाल बदलकर वह सामने आ रहा था!
जब उसकी चाल धरी की धरी रहे गई तो वो और अधिक आक्रमक हो गया!
एक ही झटके से उसने खलील की अम्मीजान का बदन छोड़ दिया था!
खलील की अम्मी को इतना भारी धक्का लगा कि वह बेड पर गिरते ही बेहोश हो गई!
तभी उनके सामने गुलशन को लेकर वह छलावे की तरह उपस्थित हुआ था!
खलील को गर्दन से जकड़ लिया फिर भी उसने सरसों के दाने वाली छोटी सी प्लास्टिक बैग सुल्तान को थमा दी थी!
सुल्तान ने फर्श पर जैसे ही सरसों के दाने बिखेर दिए जिन्नात चौकन्ना हो गया था.!
बेहूदे जानवर की तरह वह दीवार चढ़ने लगा था!
अपने हाथ और पैरों की मदद से ऐसे चल रहा था मानो कोई खूंखार भेड़िया अपनी जान बचाकर दीवार के सहारे भाग रहा हो..!
सुल्तान और खलील ने ऐसा मंजर देखने की उम्मीद नहीं की थी!
उसका पेट  रिंग की तरह मुड़कर  ऊपर  उठा था!
उसका मुंह भी सीधा था!
पीठ का भाग नीचे होने के बावजूद गुलशन तेजी से दीवार पर इधर उधर छलांग लगा रही थी.!
"तू मुझसे जीतने की उम्मीद मत रख..!"
वह एक अलमारी के ऊपर बैठ कर बोली थी!
उसके मुंह से मरदानी आवाज निकल रही थी.!
"वैसे तो मैं मेरी बीवी को साथ लेकर जाऊंगा...!
तुम लोग जो नहीं मानोगे तो उसका खामियाजा तुम्हें भी भुगतना पड़ेगा..!"
"अब्बा.. तुम इसकी बातों में मत आओ..! जाओ इन सरसों के दानों को सभी कमरों में बिखेर कर अपना काम पूरा करो..!
यह हमको बातों में उलझा कर फिर से कोई नई चाल ना चल दे..!"
रात हो चुकी थी धीमे धीमे अंधेरा बढ़ रहा था !
और अंधेरों में आग से बने जिन्नातों की ताकत दुगनी हो जाती है!
सुल्तान इस बात को अच्छी तरह जानता था!
फिरकनी की तरह घूम कर वह तेजी से सीढ़ी चढ़ गया!
खलील ने बस एक नजर सुल्तान को देखा था!
दूसरे ही पल वह चौक गया!
गुलशन कमरे में कहीं नहीं थी!
एक पल में वह कहां गायब हो गई?
ऐसा कैसे हो सकता है..?
खलील के बदन में ख्वौफ की सिरहन दौड़ गई!
सुल्तान को आगाह करता उससे पहले एक बड़ा धमाका हुआ!
उसने देखा जैसे बिजली सी कौंधी थी!
सुल्तान सीढ़ियों से लुढकता हुआ नीचे आकर गिरा!
पूरे शरीर में काफी चोटें आई थी!
सर पर लगा था!
खून काफी बह रहा था!
हुआ यूं कि,
ऊपर चढ़कर सुल्तान ने जैसे ही दरवाजे को हाथ लगाया!
वैसे ही गुलशन की एक जबरदस्त ठोकर से दरवाजा सुलतान के साथ सीढ़ियों पर गिरा था.!
"अब्बा जान...!"
खलील सुल्तान को गिरता देख कर तड़प उठा था!
दौड़कर उसने सुल्तान को संभाला!
सुल्तान की किस्मत अच्छी थी वरना इस बार से उसका बचना नामुमकिन था!
सीढ़ियों के उपले छौर पर गुलशन ठहाका लगाकर हस रही थी.!
सुल्तान की आंखों में गुस्सा उतर आया था!
कराहता हुआ वह खड़ा हो गया.!
खलील ने उसका हाथ पकड़ लिया.!
"क्या करना चाहते हो अब्बा ..?
यह मार डालेगा..!
खून सवार है इस पर..?
सुल्तान ने धीरे से कहा !
"वो अपना कुछ नहीं बिगाड़ सकता है मेरे बच्चे..!
बस तू देखता जा!"
इतना कहकर सुल्तान नें वह छोटी सी प्लास्टिक बैग से कुछ दाने अपनी मुट्ठी में ले लिए,
और वह पूरी ताकत लगा कर सिढी पर कुदा!
कुछ हद तक ऊपर चढ़कर सुल्तान ने सरसों के दाने गुलशन की ओर उछाल दिए थे!
सुल्तान के इरादे को जिन्नात पहले से भांप गया था!
सरसों के दाने हवा में उछलकर सीढ़ियों पर बिखर गए!
गुलशन छलावे की तरह अपनी जगह से गूम हो गई थी!
हैरान-परेशान और बावला सा होकर सुल्तान इधर-उधर देखने लगा.!
वह अच्छी तरह समझ गया था!
ऊपर जाने का मतलब था जिन्नात के झांसे में फंस जाना.!
चेहरे पर उलजन के भाव लिए सीढी पर सुल्तान ठिठक गया था!
कि तभी..!
खलील और सुल्तान के चेहरो पर रोशनी छा गई!
वजह थी!
बंगले के मैन डोर से प्रवेश ने वाला काली कमली वाला एक बूढा..!
उसका चेहरा देखते ही सुल्तान उछल पड़ा था.!
"बाबा आप यहाँ...? "
सुल्तान काफी भाव विभोर हो गया.!
खुशी और आश्चर्य उसके लफ्जों में ऊभर आया..!
हां मुझे आना पड़ा..!
मैं देख रहा था की इस दरिंदे ने काफी परेशान कर रखा है तुम लोगों को..!
इसके जुल्म देख कर मुझसे रहा नहीं गया!
अब तो मुझे डर लगने लगा था कि कहीं यह तुम्हारे परिवार में से किसी की जान ना ले ले..!
मगर अब शैतान की कहानी खत्म..!
उसके वैसी जुल्मों का अंत..!
आओ बच्ची के कमरे में बैठकर उसे मेरी ताकत का परचम दिखाता हूं..!
कहता हुआ काली कमली वाला बाबा गुलशन के कमरे में प्रवेश कर गया.!
उसके पीछे पीछे सुल्तान और खलील भागे!
खलील ने सुल्तान को रोकते हुए कहा! "अब्बा जान अम्मी...?"
'माई की फिक्र ना करें उस कमरे में सरसों के दाने बिखरे हुए हैं..!
वहां पैर रखने की उसकी मजाल नहीं है अब!
लेकिन बच्ची के कमरे में बुलाने पर उसको आना होगा.!
बाबा पालथी मारकर बैठ गए थे.!
उनके माथे पर भभूति लगी हुई थी!
खुले पेट पर त्रिशूल का निशान बना हुआ था!
लंबी घनी दाढ़ी और सर के बाल
कोई महान तपस्वी की छवी उनमे नजर आ रही थी!
खलील और सुल्तान भी पालथी मारकर उनके अगल बगल बैठ गए थे.!
पूरा खंड बाबा के मुख से निकलने वाले मंत्रों की गूंज से भर गया था.!
कुछ ही पल बीते की दरवाजे में गुलशन नजर आई..!
उसकी आंखें सुर्ख थी!
अपनी बड़ी बड़ी आंखों से वह बाबा को घूर रही थी!
ईधर आकर बैठ जा यहां पर..!"
बाबा के हुक्म से उसका पूरा बदन कांप गया.!
गुलशन रोने लगी दो हाथ जोड़कर गिड गिडाने लगी!
मुझे जाने दो छोड़ दो मुझे मैं कैद होना नहीं चाहता हूं चला जाऊंगा इसे छोड़ कर..!
नहीं तुझे नहीं छोडूंगा..!
तू यहां से जाकर फिर किसी और को पकड़ लेगा.!
तेरा जमीन पर रहना ठीक नहीं है.!
बाबा ने अपने मंत्रों की गूंज तेज कर दी.!
साथ ही उन्होंने एक छोटी सी पोटली से कांच की एक बड़ी बोतल निकाल कर सामने रख दी.!
सरसों के वही दाने फिर से अभिमंत्रित कर कर के गुलशन के सिर पर डालें!
गुलशन काफी मचल रही थी!
कुछ देर बाद उसने अपनी पूरी बॉडी को उछाल उछाल कर फर्श पर पटका.!
खलील और सुल्तान आवाक होकर गुलशन की दयनीय हालत पर तरस खाकर देख रहे थे!
कुछ कर भी तो नहीं सकते थे वे!
जो करना था बाबा को करना था.!
तकरीबन 5 मिनट तक यह सिलसिला चलता रहा.!
फिर अचानक गुलशन स्थिर हो गई!
उसके बदन से धुआं निकला और बोतल में समाने लगा.!
सारा धुंवा बोतल में समा गया की
तपाक से बाबा ने बोतल का ढक्कन बंद कर दिया.!
और अपनी जगह से उठ़ते हुए बोले!
" चलो मेरे साथ इसे किसी वीरान जगह पर दफन करना होगा!, जहां किसी इंसान को भनक तक ना लगे!
एक पल की भी  देरी किए बगैर खलील ने गाड़ी निकाली.!
अब्बा आप मम्मी के पास रुक जाओ..!
मैं इस बोतल को जमीन में गाड़ कर वापस आता हूं..!
सारा मामला ठीक हो गया है...!
यह बात समज में आते ही सुल्तान ने हामी भरी.!
खलील बाबा को लेकर तेज रफ्तार से भागा!
सुलतान गुलशन के कमरे मे आया!
अपनी जगह पर बैठी गुलशन कीसी अजनबी की भांति कमरे का जायजा ले रही थी.!
सुलतान को देख कर बोली.!
"अब्बाजान..  खलिल कहां..? "
गुलशन को अपने ओरिजिनल रुपमे देखकर सुलतान की आँखे झिलमिला उठी
बडे प्यार से उसने कहा..!
कुछ काम से खलिल बहार गया है बच्ची..!
तुम्हारी सासु मा बहोत याद कर रही है तुजे..!
गुलशन मे ससूर की बात सूनकर जान आ गई..!
सारी उलझन को ताक पर रख कर तेजी से
उठ कर वह..  सासूमा के कमरे मे भागी..!
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रात काफी हो चुकी थी.!
ठंडी हवाये अपना असर दिखा रही थी.!
फिलहाल उसका कोई असर खलिल को नही हो रहा था!
उसका पुरा ध्यान ईस वक्त गड्डा खोदने मे लगा था. !
एक सूनसान जगह पर गाडी रोक कर खलिल बाबा की एक एक बात का अनुसरण कर रहा था. !
वो जानता था की गड्डा खोदना होगा!
ईस लिये याद करके निकलते वक्त फावडा उसने गाडी मे रख दिया था!
फावडे के कारन ही खलिल गहेरा खड्डा बना पाया..!
अब ठीक है..!  बोतल को संभाल कर अंदर रख दो.. !
और मिट्टी डाल कर गड्डा भर दो..!
खलिल ने वैसा ही किया..!
कार्य पुर्ण होते ही दोनो वहां से चूपचाप निकल गये..!
बाबा ने रास्ते मे ही सूचना दे दी थी की काम खत्म होते ही एक भी लब्ज बोले बगैर वहा से निकल जाना है..!
रास्ते मे धाटी के पास बाबा को छोड देना है..!
ईसलिये खलिल तेजी से गाडी के पास आ गया..!
बाबा भी आकर गाडी में बैठ गये.!
खलिल ने अपनी सीट संम्हाली.!
तब...!!!
उन दोनो को पता नही था..!
एक किसान गाडी को ईस विरान जगह पर रुकते देखकर जिञ्यासा वश वहा एक घने पेड के पीछे छूप कर देख रहा था..!
जब ये लोग..  वहा से निकल लिये तो..!  उसने अपने कदम उस जगह की और बढाये जहां खलिल ने अभी अभी जिन्नात को गाडा था..!
                    ( क्रमश:)

 

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