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भवभूति के रूपको मैं सूच्य विन्यास

भारत के इने गिने महान प्रतिभाशाली नाटककारों में से एक, महाकवि भवभूति की नाट्य कृतियों का अनुशीलन ,भारतीय नाट्य समीक्षा पद्धति पर ही किया जाना सर्वथा उचित प्रतीत होता है। ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में कुछ ऐसे सार्वभौम सिद्धांत अवश्य होते हैं ,जिनको किसी भी देश की सांस्कृतिक परंपरा में देखा जा सकता है। ऐसे सार्वभौम तत्वों के निष्कर्ष पर-------‐----- ही भवभूति के नाटकों को परखने का प्रयत्नकिया गया है।

काव्य के दो भेद हैं ---श्रव्य काव्य एवं दृश्य का-व्य । दृश्य काव्य नेत्र का विषय तथा रूप से आरोपित-‐- होने के कारण रपक कहा गया है---

दृश्य श्रव्यत्वभेदेन पुनः काव्यम, द्विधामतम, `।
दृश्यम, तत्राभिनेयम, तदूपारोपातु रूपकम, ।। साहित्य दर्पण 6/1

दशरूपक में भी धनंजय ने अवस्था की अनुकृति को ही नाट्य कहां है---

अवस्थानुकृतिर्नाट्यम,( दशरूपक 1/7)

आचार्य भरत के मतानुसार नाना भावों से संपन्न विभिन्न अवस्थाओं से युक्त नाटक में लोकवृत्त का अनुकरण रहता है। वस्तुतः इस विशाल विश्व फलक पर जो कुछ भी है, उन सब का चित्रण नाटक में रहता है। आचार्य भरत मुनि का यह कथन सर्वथा उचित ही है----

न तत् ज्ञान न तत, शिल्पम, न सा विद्या न सा कला ।
न सा योगो, न तत्कर्म ,नाट्येअश्मिन यन्न दृश्यते।।"

यही कारण है कि भवभूति ने भी अपनी अभिव्यक्ति को मुखरित करने हेतु श्रव्य विधा को न चुनकर दृश्य विधा रूपको का ही चयन किया है । इस चयन का एक अन्य प्रमुख कारण सामयिक और सामाजिक प्रयोजन भी है ,जो इस सर्वग्राही सशक्त माध्यम द्वारा लोक धर्म की प्रतिष्ठा करने में सक्षम है । रूपक के 10 भेद हैं ---नाटक, प्रकरण ,व्यायोग ,भाण ,सम- वकार, डिम ईहामृग ,अंक ,वीथि एवं प्रहसन। इनमें नाटक एवं प्रकरण ही प्रमुख है। भवभूति के प्रसिद्ध तीनों नाटक इन्हीं दो नाट्य भेदो में समाहित हैं। महावीर चरितम् और उत्तररामचरितम् दोनों नाटक है और मालती माधव को प्रकरण कहा जा सकता है। भवभूति के सभी रूपको मे नाट्य नियमों का पालन करते हुए नांदी पाठ के पश्चात ही कथावस्तु का श्रीगणेश किया गया है। नाटक का कथानक दो भागों में विभक्त रहता है --(1)आधिकारिक और (2) प्रासंगिक। नायक की लक्ष्य प्राप्ति पर आधारित कथा आधिकारिक होती है तथा जिस कथा का प्रयोग आधिकारिक कथा के उपकरण रूप में किया जाता है वह प्रासंगिक होती है (साहित्य दर्पण 6 /42-- 43) यह प्रासंगिक कथाएं मुख्य कथा के उत्कर्ष में सहायक होती है।

हमारा वास्तविक जीवन अनेक सांसारिक चिंताओं द्वंद एवं क्लेशो से आक्रांत होने पर भी भारतीय नाटकों में आशा परक उज्जवल एवं आनंद प्रद जीवन दर्शन की कलात्मक अभिव्यक्ति ही दृष्टिगोचर होती है । जीवन की अनेक दु:ख परक वास्तविकताओं का मंच पर प्रत्यक्ष प्रदर्शन अशुभ माना जाता है। संस्कृत रूपक अपने दर्शकों को किसी प्रकार का अशुभ मानसिक आघात नहीं देना चाहते ,क्योंकि इससे सत् प्रेरणा के मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो जाता है और दर्शकों का नैतिक बल, कुछ समय के लिए ही सही ,कुंठित हुआ सा लगता है । इसीलिए दशरूपककार ने-नाटकीय मंच पर ऐसे शिष्टाचार विरोधी दृश्यों के प्रत्यक्ष प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है--

दूरा ध्वानम् वधं युद्धम् राज्यदेशादि विप्लवम् ।
संरोधं भोजनं स्नानं सुरतं चानुलेपनम् ।
अंबर ग्रहणादीनि प्रत्यक्षाणि न निर्दिशेत्।
नाधिकारिबधं क्वापि त्याज्यमावश्यकम् न च।।

आचार्य मम्मट द्वारा काव्य के जो 6 प्रयोजन माने गए हैं---

काव्यम् यशसे अर्थकृते व्यवहार विदे शिवेतरक्षतये।
सद्य : परनिवृत्तये कांतासम्मित तयोपदेशयुजे।।

उनमें भी ऐसे दृश्य "शिवेतरक्षतये" एवं "सद्य: परनिवृत्ति" के स्पष्ट बाधक हो जाते हैं। हां ,नाटकीय कार्य व्यापार के विकास में यदि इनमें से कुछ दृश्यों को आवश्यक माना जाता है ,तो प्रवेशक या विषकम्भक की अवधारणा करके मंच पर उपस्थित पात्रों के परस्पर वार्तालाप के क्रम में उनका संकेत मात्र करा दिया जाता है। नाट्य नियमों के अनुसार जो कुछ नीरस एवं अनुचित या विस्तृत होता है, जैसे --नायक का पतन ,मृत्यु ,युद्ध, हत्या ,विवाह ,शयन, भोजन ,स्नान आदि --उसे कथानक की सूच्यश्रेणी में रखा जाता है तथा जो मधुर, उदात्त एवं रसपूर्ण एवं भावपूर्ण होता है वह कथानक के दृश्य -श्रव्य माध्यम द्वारा प्रकट किया जाता है। यहां भवभूति के रूपको में केवल सूच्य वस्तु विन्यास का-ही विश्लेषण किया गया है।

सूच्य वस्तु विन्यास
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रूपको की कथावस्तु के सूच्य अंगों को -"अर्थोपक्षेपक"- कहा जाता है। यह 5 होते हैं( 1) विषकम्भक (2) प्रवेशक (3) चूलिका (4) अंकास्य (5)अंकावतार।

(1) विषकम्भक
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यह वृत्त मैं विद्यमान कथांशो का निदर्शक होता है। संस्कृत भाषी मध्यम कोटि के पात्रों द्वारा प्रायोजित विषकम्भक शुद्ध कहा जाता है। निम्न एवं मध्यम पात्रों द्वारा प्रयुक्त विषकम्भक संकीर्ण अथवा मिश्र कहलाता है । (दशरूपक 1/59 --60)एवं (साहित्य दर्पण 6/ 55--56 )इनमें स्थान ,काल आदि की सूचना देकर कथा सूत्र को जोड़ा जाता है। भवभूति के तीन रूपको मैं शुद्ध एवं मिश्र विषकम्भक की योजना मिलती है । महावीर चरितम् के पांचवें अंक में, उत्तररामचरितम् के दूसरे तथा तीसरे अंक के प्रारंभ में तथा मालती माधव के पांचवें ,छठे एवं नौवे अंक में शुद्ध विषकम्भक की योजना की गई है तथा महावीर चरित के दूसरे ,चौथे ,छठे एवं सातवे अंक में उत्तररामचरित के चौथे एवं छठे अंक के प्रारंभ में व मालती माधव के प्रथम अंक में मित्र विषकम्भक का आयोजन है । "उत्तररामचरितम्"के द्वितीय अंक के शुद्ध विषकम्भक मैं सीता त्याग के अनंतर 12 वर्षो के बीच घटी घटनाओं का उल्लेख है। आत्रेयी एवं वासंती के वार्तालाप से वाल्मीकि ऋषि द्वारा जृम्भकास्त्र सिद्ध लव कुश का पालन ,शिक्षण ,रामायण की रचना, श्री राम का अश्वमेध यज्ञ अनुष्ठान ,लक्ष्मण पुत्र चंद्र केतु का चतुरगनी सेना के साथ गमन तथा राम का शंबूक वध के लिए दंडक वन में पुनरागमन आदि प्रसंगों की सूचना मिलती है। तृतीय अंकमें करुण रस की द्रवण शीलता दर्शकों को भावविभोर कर देती है । तत्पश्चात मृदुल हास्य से परिपूर्ण विषकम्भक की योजना नाट्य एवं रंगमंचीयदृष्टि से अत्यंत उत्तम है। उत्तररामचरित के छठे अंक का मिश्र विषकम्भक विद्याधर एवं विद्याधरी के वार्तालाप द्वारा नाट्य कला के नियम अंतर्गत, लव एवं चंद्र केतु के बीच हुए युद्ध प्रदर्शन का परिहार कर अंत में ---"कल्याणमस्तु सुतसंगमनेन राज्ञ: "---इस कथन द्वारा श्री राम के लव कुश से मिलन का भावी संकेत देते हैं।

महावीर चरितम् के पंचम अंक के शुद्ध विषकम्भक में जटायु एवं संपाती द्वारा राम एवं लक्ष्मण के वीर कार्यों से जुड़ी हुई भूतकालिक घटनाओं की सूचना दी जाती है ,साथ ही रावण द्वारा सीता हरण की घटना को भी सूचित किया जाता है। इस प्रकार भवभूति के रूपको में विषकम्भकों का आयोजन उत्तम कोटि का कहा जा सकता है ।

प्रवेशक
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यह अर्थोपक्षेपक का दूसरा अंग है। इसकी योजना नाटक के प्रथम अंक में नहीं की जाती। यह 2 अंकों के बीच में स्थित होता है। (दशरूपक 1/61 साहित्य दर्पण 6/57 )अनुदात्त वाणी बोलने वाले नीच पात्रों से युक्त प्रवेशक शेष अर्थो का सूचक होता है। भवभूति के नाटको मैं प्रवेशक की योजना केवल मालती माधव में द्वितीय ,तृतीय ,सप्तम् एवं अष्टम् अंकों के प्रारंभ में हुई है। द्वितीय अंक में मालती की दासियों के वार्तालाप द्वारा ,तृतीय अंक में बुद्ध रक्षिता एवं अवलोकिता के वार्तालाप द्वारा ,सप्तम अंक में बुद्ध रक्षिता के कथन द्वारा एवं अष्टम अंक में अवलोकिता के कथन द्वारा ,अनेक शेष अर्थो की- सूचना प्रवेशक के आयोजन द्वारा दी गई है।

3 चूलिका
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कथावस्तु का तृतीय सूच्य अंग चूलिका कहा गया है । इसमे यवनिका के पीछे रहकर कार्य की सूचना दी जाती है। (दशरूपक 1/61 )

भवभूति ने अपने तीनों रूपको में इस अर्थोपक्षेपक का प्रयोग किया है। "महावीर चरित ",के चतुर्थ अंक में नेपथ्य से परशुराम पर श्री राम की विजय की सूचना दी जाती है --(नेपथ्य)

भो भो वैमानिका: ! प्रवर्तयन्तां मंगलानि।
शाश्ववान्ते वासी जयति दिनकर कुलेंदु : विजयते।।( म0 च0 4/1)

सातवें अंक में सीता की अग्नि परीक्षा की सूचना भी चूलिका द्वारा ही दी गई है। नेपथ्य में कोलाहल के साथ ही देवगण अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण साध्वी सीता का अभिनंदन करते हैं और श्री राम से उन्हें समादृत करने का अनुनय करते हैं। (महावीर चरितम 7/3 )उत्तररामचरितम् के द्वितीय अंक में वासंती नेपथ्य से तपस्वीयो का स्वागत करती हुई सुनाई पड़ती है---

स्वागतम् तपोधनाया: (उत्तररामचरित 2/1)

और पंचम अंक में ---(नेपथ्ये)

"भो भो सैनिका : जातम जातमवलंबनम्`अस्माकं" (उ रा5/1)

के पश्चात चंद्र केतु के आगमन की सूचना को चूलिका द्वारा प्रस्तुत किया गया है---

"नन्वेष त्वरित सुमंत्रनुदयमान
प्रोदवल्गत्` प्रजवितवाजिना रथेन।
उत्खात प्रचलित गोविदारकेतु :
श्रुत्वा व: प्रधनमुपैति चंद्र केतु :।। (उत्तररामचरित 5/1)

मालती माधव के तृतीय अंक में व्याघ्र के आक्रमण की सूचना भी चूलिका द्वारा दी गई है ।( मालती माधव 3 /15 _16) तथा छठे अंक में भी मालती के साथ नंदन के विवाह की सूचना भी चूलिका द्वारा यवनिका के पीछे से ही दी गई है (मा मा 6/2)


4 अंकास्य/ अंक मुख
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दशरूपककार धनंजय के शब्दों में अंक के अंत में आने वाले पात्रों द्वारा पूर्व अंक से असंबद्ध अग्रिम अंक के अर्थ की सूचना देने के कारण इसे अंकास्य कहा जाता है। (दशरूपक 1/62 )भवभूति ने इसकी योजना महावीर चरितम मैं ही की है। इसके प्रथम अंक के अंत में सर्वमान्य का यह कथन ---"कार्य पर्यंत माल्यवत्युपवेदये" ---(महावीर चरितम 1/61) द्वितीय अंक के प्रारंभ में माल्यवान की उपस्थिति का संकेत करता है। इसी प्रकार द्वितीय अंक के अंत में सुमंत्र का श्री राम एवं जमदग्नि को यह संदेश देना ---" भगवंतो वशिष्ठविश्वामित्रौ भवत: सभार्गवानाद्य यत:"--- और तब उनके द्वारा पूछे जाने पर --"क्व भगवन्तौ? "-‐-तब सुमंत्र द्वारा बताया जाना कि ---"महाराज दशरथस्यांत्रिके "---और अंत में सब का वहीं जाना तत्पश्चात् अगले अंक में वशिष्ठ विश्वामित्र और परशुराम का बैठे हुए दिखाई देना अंकास्य का ही सूचक है । यहां सुमंत्र के द्वारा अगले अंक के प्रारंभ में होने वाले अर्थ की सूचना दी गई है जो पूर्वांक से भिन्न है । अंकमुख के अंतर्गत एक अंक में सब अंको की सूचना रहती है तथा बीज एवं अर्थ संक्षेप में सूचित रहते हैं "(साहित्य दर्पण 6/59 --60 )"मालती माधव "-के प्रथम अंक में कामंदकी एवं अवलोकिता के वार्तालाप द्वारा प्रकरण के पूरे कथानक का विहंगम परिचय प्राप्त हो जाता है।
5 अंकावतार
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आचार्य विश्वनाथ ने अर्थोपक्षेपक की परिभाषा देते हुए साहित्य दर्पण में कहा है कि जिस अंक के अंत में उसी अंक के पात्रों द्वारा आगे के अंक की सूचना मिलती है तथा वही पात्र आगामी अंक में दिखाई देते हैं वहां अंकावतार होता है । (साहित्य दर्पण 6/58 --59 )भवभूति ने अंकावतार की योजना केवल "मालती माधव "--में ही की है। तृतीय अंक के अंत में मकरंद पर व्याघ्र के आक्रमण की घटना से माधव का मूर्छित होना तथा कामंदकी द्वारा सचेत किया जाना तथा सबको मकरंद के पास चलने के लिए कहना ---"तदेहि यावत् । पश्याम:।"-- तत्पश्चात् चतुर्थ अंक के प्रारंभ में इन सभी पात्रों का रंगमंच पर होना यह अंकावतार का ही सूचक है। इसके द्वारा तृतीय अंक का घटनाक्रम चतुर्थ अंक में अविच्छिन्न बना रहता है।

गर्भांक
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उपर्युक्त 5 अर्थोपक्षपकों के अलावा एक अन्य सूच्य अंग भी है जो कथावस्तु की सूचना का सशक्त माध्यम है जिसे गर्भांक कहा जाता है। एक अंक के अंतर्गत दूसरे अंक की नियोजना को गर्भांक कहते हैं । इसकी अपनी प्रस्तावना होती है। यह बीजयुक्त भी होता है तथा फलवान भी। ("साहित्य दर्पण 6/20 )"भवभूति ने" उत्तररामचरित "के सातवेअंक में गर्भांक की योजना की है । इसकी कथा बाल्मीकि द्वारा लिखित भरत द्वारा आयोजित तथा अप्सराओं द्वारा अभिनीत है। इस नाटक में पृथ्वी एवं भागीरथी द्वारा सीता की पवित्रता की घोषणा की जाती है । ("उत्तररामचरित 7/8 )"--इस प्रकार नाटक की सुखद परिणति को संभव बनाया जाता है । भवभूति ने गर्भांक की योजना द्वारा निर्वहन संधि में अद्भुत रस का सुंदर निर्वाह किया है।



इति
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