नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 4 in Hindi Social Stories by राज बोहरे books and stories Free | नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 4

नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 4

राजेन्द्र लहरिया-नाट्यपुरुष 4

 

और नियत दिन ठीक समय पर रणजीत उसके घर आ गया था। बैठते ही उसने बिना लाग-लपेट कहना शुरू कर दिया था, ''सर, आप एक नाटककार हैं, रंगकर्मी हैं... आपका 'अंधेर नगरी’ देखने के बाद मुझे लगा था कि आपको अपनी कहानी बताई जानी चाहिए... दरअसल कहानी नहीं, अपनी बीती!... क्या आप सुनने के लिए थोड़ा समय निकालना चाहेंगे?’’

''ज़रूर!...ज़रूर!...’’

सुन कर एक आश्वस्ति रणजीत के चेहरे पर झलकी थी; और वह बोला था, ''सर मैं एक ऐसा आदमी हूं, जो बहुत आसानी से ख़ुश नहीं होता हूँ और बहुत आसानी से किसी से नफ़रत भी नहीं कर पाता हूँ... आज मैं आपको जो आपबीती सुनाने का जा रहा हूँ, उसमें ऐसा हुआ था कि शायद मेरी नफ़रत ने ही मेरी ख़ुशी को चमकदार बना दिया था...’’

''ओह!...’’

''जी सर,’’ वह कह रहा था, ''वह शायद मेरी ज़िंदगी का सबसे चमकदार ख़ुशी भरा दिन था...

''प्रौफेसर पाणिग्रही मुझे तक़रीबन पंद्रह साल बाद मिले थे। उसके बाद पहली ही बार, जब वे यूनिवर्सिटी में राजनीतिशास्त्र पढ़ाते हुए वहीं रह गये थे; और मैं वहाँ से पढ़ कर दुनिया के अँधेरों-उजालों में भटकने के लिए निकल पड़ा था। मैंने इन पंद्रह-सोलह सालों में अपनी दुनिया को खँगाल डालने में कोई कसर न छोड़ी थी। इस काम के दौरान न जाने कितनी भूलभुलैयों से लेकर गुज़रना पड़ा था मुझे... पर मैं उन्हें नहीं भूला था।

''वे राजनीति के शास्त्र और विचार की दुनिया के आला शख्सियत माने जाते थे। उनकी कही हुई बात बुद्धिजीवियों के हलके में 'वेदवाक्य’ की तरह मान्य और स्वीकार्य मानी जाती थी। उनकी लिखी हुई किताबें राजनीतिशास्त्र के 'बाइबिल’ की तरह पढ़ी जाती थीं। वे देश के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रौफेसर थे, जिनके 'कृपा-कटाक्ष’ के लिये राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी तरसते रहते थे। यह उनकी भारी-भरकम और गरिमामयी पृष्ठभूमि थी।

''और मेरी पृष्ठभूमि महज़ इतनी थी कि मैं एक केंद्रीय मंत्री का बेटा था; और उनका विद्यार्थी!’’

''वे उस समय मेरी इस पारिवारिक पीठ से परिचित थे, और क्लास से बाहर आते-जाते जब भी सामना होता था तब मुझसे हाल-चाल पूछ लेते थे और कभी कभार घर पर आने के लिए भी कहते थे, इसलिए मैं एक-दो बार उनके घर भी जा चुका था। घर पर वे ख़ालिस, अनौपचारिक और मुक्त होते थे; खुलकर बातें करते थे। जो कि राजनीति के विचारक वे वहां भी होते थे।

''मेरी रुचि राजनीति के अध्ययन में थी; पर राजनीति करने में कतई न थी। मैं जब भी उनके यहां गया तब खुल कर बातें होती थीं - यहाँ तक कि कई बार बातें बहसज़दा - जैसी भी हो जाती थीं... एक दिन बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, 'कुल मिलाकर यह कि फ़िलहाल लोकतंत्र से बेहतर राजनैतिक व्यवस्था दुनिया के सामने कोई और नहीं है...’

''पर मुझे लगता है सर,’ मैंने उनकी बात के बीच में ही अपनी बात रख दी, 'लोकतंत्र एक ढोंग भरी राजनैतिक व्यवस्था है!’

''तुम किस परिप्रेक्ष्य में यह बात कह रहे हो?’’ उन्होंने मेरी ओर देखा।

''परिप्रेक्ष्य अनगिनत हैं... मिसाल के तौर पर मैं कुछ छोटी-मोटी बातों आपके सामने रखता हूँ...’’

''वे गौर से मेरे चेहरे पर देख रहे थे। नि:शब्द।’’

''मैंने उनके कहा, 'जैसे कि मैं एक सांसद का बेटा हूँ, तो यह बिल्कुल संभव है कि कल को मैं भी भारतीय संसद का सदस्य बन जाऊँ - वो भी बिना कुछ किये-धरे, आसानी से! पर क्या ऐसी इस देश के हर एक नागरिक के साथ संभव हो सकता है?.... क्या किसी छोटे किसान मन्नू का बेटा पन्न्नू या दिहाड़ी मजदूर हलके का बेटा नेहने... या किसी घसीटा का बेटा खचेरा इस लोकतंत्र में महज़ इस बिनाह पर सांसद बनने की सामथ्र्य रखता है कि वह भी इस देश का नागरिक है? नहीं ना?.... मैं बन सकता हूँ, क्योंकि मेरा बाप सांसद है, मंत्री है; वे नहीं बन सकते, क्योंकि उनके बाप...। जबकि मैं और वे इसी एक ही राष्ट्र के नागरिक हैं! ...तो फिर यह लोकतंत्र नाम की व्यवस्था एक नौटंकी ही हुई ना!’’

''मेरी बात पूरी होने पर प्रौफेसर पाणिग्रही ने मुझे नाम से संबोधित कर कहा, 'देखो रणजीत, बात इतनी सतही नहीं है...!’’

''पर मेरा स्पष्ट मत है सर, लोकतंत्र में हर एक नागरिक को एक समान दर्जा हासिल नहीं होता... कुछ लोग बहुत नीचे रह जाते हैं, कुछ बहुत ऊपर उठ जाते हैं!’’

''नऽ! नऽ!... ऐसी बात नहीं है!’’ वे सिर हिलाकर आँखें बंद किये हुए मेरी बात को नकार रहे थे।

'' 'उस परिप्रेक्ष्य को जीने दीजिए सर,’ मैंने उनकी मुंडी हिलाती नकार के जवाब में कहा था, 'मैं आपसे ही पूछता हूं, कि आप, आप खुद अपने सामने बैठे मुझमें और गली में कचरा-कबाड़ बटोरते झींगुरी कबाडिय़े में कोई फ़र्क करते हैं या नहीं?’

''बिल्कुल नहीं!’’ उन्होंने तुरंत कहा था।

''उसके बाद मैंने कुछ नहीं कहा था। बस, कुछ देर तक उनके उस चेहरे को देखता रहा था जिसकी भंगिमाओं के द्वारा वे अपने कहे 'बिल्कुल नहीं!’ को धाराप्रवाह साबित करने में लगे थे। ... कुछ देर बाद मैं वहां से उठकर चला आया था।

''...तो सर, यही प्रौफेसर पाणिग्रही जब मुझे लगभग पंद्रह सालों के बाद मिले थे, तब...! वह बात आगे!... अभी मैं आपको अपने पिता के बारे में बताता हूँ... मेरे पिता का नाम अखिलजीत बाबू है। राजनीति के हलकों में उन्हें 'अखिलबाबू’ नाम से पुकारा-पहचाना जाता है। उनकी उम्र अब इकहत्तर-बहत्तर के आसपास है। मुझे नहीं पता कि वे बचपन में कैसे लगते थे; और नहीं याद कि जवानी के दिनों में कैसे दिखते थे.... पर जब से मैंने होश सम्हाला है, उन्हें शक्क-सफेद, कलफ़-इस्त्रीशुदा धोती-कुरते या पाजामे-कुरते के लिबास में श्वेतकेशी गरिमा के साथ चेहरे पर हमेशा एक अपाठ्य गंभीरता लिये देखा है। शायद चालीस के आसपास ही उनके सिर के पूरे बाल सफेद हो गये होंगे। चूँकि मेरी उम्र भी अड़तीस हो गई है!... बहरहाल अपने पिता से बावस्ता, अपने बचपन और उनके बाद की कुछ यादें मेरे ज़ेहन में बार-बार झलमलाती है... मेरे दस-ग्यारह साल का होने के बाद; पिता, जिन्हें मैं 'बाबूजी’ कहता था, मुझे अपनी निकटता में और अपने साथ रखना पसंद करने लगे थे। स्कूल जाने, होमवर्क करने, खाने, सोने आदि के अलावा बचे समय में मैं उनके ही पास रहा करूँ- ऐसी हिदायत वे मुझे अक्सर देते थे। मैं उनकी उस हिदायत का पालन करने की कोशिश करता था और बचे समय में प्राय: उनके साथ बैठकख़ाने में ही गुजारता था। वे जब घर से बाहर जाते थे तो फ्री होने पर मुझे भी जीप में अपनी बग़ल की सीट पर बैठाकर ले जाते थे। तब मैं सोचता था उनका इकलौता बेटा होने के कारण वे मुझे बहुत चाहते थे, इसीलिए हमेशा अपने साथ रखना पसंद करते थे। यह तो बाद में समझ में आया था कि बात वैसी नहीं थी जैसी मैं सोचता था। बात दरअसल यह थी कि वे मुझे हमेशा अपने साथ रखकर, व्यावहारिक रूप से, राजनीति सिखा देना चाहते थे ताकि भविष्य में मैं इस क्षेत्र का मँजा हुआ खिलाड़ी साबित हो सकूँ!... वे उस वक़्त सांसद नहीं थे। अलबत्ता राजनीति में थे; और लोगों के बीच ख़ासा रुतबा रखते थे। घर पर प्राय: लोगों की आवाजाही बनी रहती थी। कुछ लोग उनके पास आकर उनसे हाथ मिलाते थे, कुछ उनके पैर छूते थे; कुछ उनके पास बैठते थे, कुछ खड़े रहते थे; कुछ हँसते-खिलते होते थे, कुछ परेशान से दिखाई देते थे और उनके सामने तरह-तरह से विनतियाँ-चिरौरियां करते हुए गिड़गिड़ाते, हाथ जोड़ते, पैरों पड़ते थे! ...ऐसे लोगों पर मुझको दया आती थी। पर मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया था कि उनकी समस्या क्या है!

''बाद में मेरे पिता विधानसभा-सदस्य चुने गये थे। उस समय मैं ग्यारवीं कक्षा में पढ़ता था। विधायक चुने जाने के दिनों में घर पर जश्न-जैसा माहौल रहा था। कई दिनों तक। लोग आते थे, जाते थे; मिठाइयाँ लाते थे, पिता को फूलों के गुलदस्ते देते थे, हँसते थे, ठहाके लगाते थे। पिता भी कभीकभार लोगों के ठहाकों में शामिल हो जाते थे। मैं चुपचाप यह सब देखता था।...

''उसके बाद पिता अपना ज़्यादातर समय राजधानी में बिताते थे। वहाँ से जब घर आते तो लोगों से घिरे रहते। पर तब भी वे मुझे अपने साथ ही रखते।

''तो उन दिनों वे राजधानी से घर आये हुए थे। मैं उनके साथ ही था। रात के नौ-साढ़े नौ बजे का समय रहा होगा। वे बैठकख़ाने में अपने सोफे पर बैठे थे। साथ में एक-दो लोग और थे।... तभी बाहर किसी गाड़ी की आवाज़ हुई और घर्राहट रुकी, तो पांच-छह लोग बैठकखाने के भीतर आये, जिनमें से एक ने पिता के पैरों को छूने के बाद साथ में लाये गये एक लड़के की तरफ़ इशारा कर धीरे-से कहा, 'यही है!’

''सुन कर पिता ने नितांत ठंडी निगाहों से उस लड़के की ओर देखा, जो तक़रीबन मेरी ही उम्र का था और मामूली से पैंट-शर्ट पहने था। बाक़ी लोग उस लड़के को जैसे घेरे खडे थे। मैं मामला समझ नहीं पा रहा था। कमरे में रोशनी मध्यम ही थी, इसलिए मैं लड़के के चेहरे को ठीक से पढ़ नहीं पा रहा था। इसके बावजूद मैं इतना देख समझ पा रहा था कि लड़का डरा-सहमा हुआ हल्के-हल्के कांप रहा था। मैंने उसकी तरफ़ देखते अपने पिता के चेहरे को देखा जो उस समय मुझे अपरिचित जैसा लग रहा था। मैंने लड़के के साथ आये हुए लोगों को देखा जो मुझे उस समय बैठक खाने में मौजूद रहस्यमय और खौफ़नाक पुतलों जैसे लग रहे थे!... और तभी मेरे वे पिता, जिन्हें मैं प्राय: एक अजीब तरह की गंभीरता से लिपटा हुआ देखता आया था, सोफ़े से उठे और उत्तेजना से लडख़ड़ाते हुए से एक कोने की तरफ़ बढ़े और तुरंत वहाँ से बेंत की एक छड़ी लेकर लौटे। उसके बाद उन्होंने उस लड़के की गर्दन को अपने बाँये पंजे से जकड़ लिया और वे उसकी टाँगों, बग़लों, बाहों और पीठ पर छड़ी फटकारने लगे। छड़ी का पहला वार होते ही लड़का ज़ोर से चीख़ा था और फिर मैंने देखा कि उसकी पैंट का सामने वाला हिस्सा भींग गया था। पिता उसे लगातार छड़ी से पीटे जा रहे थे और वह चीखें मारता हुआ रोये और कराहे जा रहा था!...उसके बाद पिता छड़ी को कोने की ओर फेंक कर बदहवासी की-सी हालत में अपने सौफे पर ठीक मेरी बग़ल में आकर बैठ गये थे। और लड़के को लेकर आये लोग, उसे पकड़कर वापस बाहर की ओर ले गये थे।

''मैं उस समय हक्का-बक्का था। मैं वहाँ वह सब होता हुआ देखता भर रहा था। उसके अलावा मैं कुछ कर भी नहीं सकता था!... आज मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि वह सब कुछ होते हुए देखते हुए मेरा चेहरा सफ़ेद फ़क हो गया होगा, मेरी आँखों में डर भर गया होगा; और मेरी अंतरात्मा में हज़ारों की तादाद में पैनी-नुकीली हिंसक किलें चुभती रही होंगीं!.... मैं उस दिन भी, अपनी आँखों के सामने घटित हुई उसे रोंये कँपा देने वाली अमानवीय 'घटना’ का अर्थ नहीं समझा था और बरसों के बाद आज तक भी नहीं समझ पाया हूँ!... पर उस दिन यह हुआ कि उस 'घटना’ के बाद मुझे अपने पिता के चेहरे में हमेशा एक और चेहरा मौजूद नज़र आता था!...

''...बाद में मैं पढ़ाई की ठंडी और अंधेरी दुनिया में खोया हुआ धीरे-धीरे बड़ा होता रहा था... मेरे सामने एक दुनिया, बनती और मिटती रही थी; और मेरा एक मिज़ाज बनता रहा था...

''इसी तरह कुछ और समय गुज़र गया। और मेरे पिता लोकसभा का इलैक्शन जीत कर संसद सदस्य बन गये थे।

''उसके बाद का समय मेरे तईं टुकड़े-टुकड़े होकर मौजूद रहा; और उस समय के वे नुकीले टुकड़े मेरे ज़ेहन में इतने गहरे चुभे हुए हैं कि तमामा कोशिशों मशक्कत के बाद भी बाहर निकलने का नाम नहीं लेते!... उन्हीं में से एक टुकड़ा वह है... उस दिन पिता वैष्णोमाता के दर्शन के लिए निकले थे, कार से। संग में मैं था, माँ थी, बड़ी दीदी थी। सरकार के दिये हुए ड्राइवर और गार्ड तो थे ही। सांसद बनने पर पिता बहुत व्यस्त रहने लगे थे। पर वे धार्मिक आयोजनों और स्थानों पर जाने के लिए समय निकाल ही लेते थे। वैष्णो देवी की यात्रा भी उसी निकाले हुए समय के बीच हो रही थी। जाने के पूर्व पिता ने पंडित बुलवा कर मुहूर्त निकलवाया था और उसके अनुसार सायंकाल छह बजकर पैंतीस मिनट पर उन्होंने रवानगी डाली थी। कार तीन-चार घंटे दौड़ चुकी थी। अब आसपास अँधेरी-स्याह रात थी; और सामने हाइवे की सड़क, जिस पर दौड़ती एयरकंडीशंड कार में सन्नाटे के बीच कभी कभार हममें से किसी के बोलने-बतियाने की कोई आवाज़!... तभी एक झटके के साथ कार को रोकता हुआ ड्राइवर हकलाया था, 'सर, कोई सामने आ गया लगता है...’

''सुन कर पिता हैरत से भर गये थे,’ उनकी आवाज में झुंझलाहट थी।

'' 'जी सर,’ कह कर ड्राइवर ने कार का पल्ला खोला। गार्ड ने मुस्तैदी से गन सम्हालते हुए अपनी तरफ़ का पल्ला खोला। और दोनों कार के बाहर निकले। पिता सहित हम सब कार के भीतर ही बैठे रहे। कुछ ही पलों में ड्राइवर ने कार के भीतर मुँह डाल कर कहा, 'सर, एक आदमी है... न जाने कैसे इतनी स्पीड में सामने आ गया... कोई मजदूर लगता है... कट-फट गया है... पड़ा है... खूनखच्चर हो गया है... सॉरी सर!...’’ ड्राइवर ने बताते हुए अफ़सोस ज़ाहिर किया।

'' 'क्या सॉरी सर?’ पिता ने ड्राइवर को झिड़का, 'उसे तुरंत हटाओ सामने से... सड़क-किनारे एक तरफ फेंको!... और आगे बढ़ो!’’

''सुन कर ड्राइवर ने कहा, 'कराह रहा है सर... मरा नहीं है... साँस चल रही है अभी!’’

'' 'तुम बोलते बहुत हो!’ पिता की आवाज़ में कड़कड़ाहट थी, 'जो कह रहा हूँ, करो और आगे बढ़ो!... समझे कि नहीं!’

ड्राइवर ने 'जी सर’ कहा, और गार्ड के साथ मिलकर वही किया, जो मेरे पिता ने उससे कहा था।

''और फिर कार आगे दौडऩे लगी थी...’’

''नहीं निकलता समय का वह दु:खदाई टुकड़ा मेरे ज़ेहन के भीतर से कभी!... समय का वह टुकड़ा शब्दश: बजता है हमेशा मेरे कोनों में, और आँखों में बनाता है एक दृश्य कि मैं अपने सांसद बाप के साथ उस सरकारी कार में बैठा हूँ जिसके नीचे आ गया है एक आदमी... 'कट-फट गया है’... 'पड़ा है’... 'मजदूर लगता है’ ... 'कराह रहा है’ ... 'मरा नहीं है’ ...'सांस चल रही है अभी’ ...'खूनखच्चर हो गया है’ ...फिर भी एक सरकारी कार दौड़ी जा रही है नेशनल हाईवे पर - एक धार्मिक यात्रा के लिए!...’’